डॉ दिलीप अग्निहोत्री
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की केरल यात्रा अपने अपने अंदाज में चर्चित हुई। नरेंद्र मोदी चुनावी माहौल को पीछे छोड़ आये थे। उनका भाषण आचरण पार्टी लाइन से ऊपर था। जबकि राहुल गाँधी चुनवी अंदाज में ही सराबोर थे। ऐसा लगा कि वह यहां के लोगों का जीत के लिए आभार व्यक्त करने नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी पर प्रहार करने केरल आये थे। जबकि राहुल गांधी अपनी जीत के जश्न में केरल गए थे। नरेंद्र मोदी लोकतंत्र की जीत पर केरल के लोगों को बधाई देने गए थे। उनका कहना था कि पार्टियों की जीत से ज्यादा महत्वपूर्ण संवैधानिक व्यवस्था का जितना है। जिसमें देश अन्य हिस्सों की भांति केरल का भी योगदान है। जाहिर है कि मोदी और राहुल की केरल यात्रा की मूलभावना ही अलग थी। इसलिए मोदी ने सम्पूर्ण देश की बात कही। जबकि राहुल ने मोदी और भाजपा पर हमला बोला।उन्होंने कहा कि मोदी का लोकसभा चुनाव प्रचार झूठ ,जहर और घृणा और देश को बांटने के विचार से भरा था। जबकि कांग्रेस सत्य, प्रेम और अनुराग के साथ खड़ी है। यदि राहुल की इन बात पर विश्वास करें तो यह मानना होगा कि देश की जनता ने जहर ,झूठ और घृणा को पसंद किया, और सत्य, प्रेम आदि को नकार दिया। लेकिन गौरतलब यह कि आमजन मोदी और राहुल के शब्दों, विचारों पर गौर करता है,तो कहानी इसके विपरीत दिखाई देती है।
नरेंद मोदी और राहुल गांधी ने लगभग एक ही समय में केरल की यात्रा पर थे। दोनों ने यहां अलग अलग जनसभा को भी संबोधित किया। लेकिन अवसर के आधार पर दोनों यात्राओं में बड़ा अंतर भी था। केरल ने कांग्रेस को बड़ी चुनावी सौगात दी थी। बीस में से पन्द्रह सीट उंसकी झोली में डाल दी। इतना ही नहीं इस बार केरल के कारण ही राहुल गांधी लोकसभा में पहुंच चुके है। वह देश का मूड भले ही न समझ सके हों, अमेठी पर उनका अनुमान एकदम सही था। इसीलिए उन्होंने केरल के वायनाड से चुनाव लड़ने का निर्णय किया था। अमेठी का गढ़ उनके लिए सुरक्षित नहीं रह गया था।
यहाँ के मतदाताओं ने उन्हें नकार दिया। यही कारण था कि राहुल वायनाड के लोगों का धन्यवाद ज्ञापित करने गए थे। जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के केरल जाने का कारण इसके बिल्कुल विपरीत था। देश के अधिकांश हिस्सों में उनकी लहर चल रही थी, लेकिन केरल इससे अछूता ही रहा। यहां कांग्रेस की लहर थी। भाजपा को यहां से एक भी सीट नहीं मिली। इस कारण मोदी ने केरल जाने का निर्णय लिया था। उनका प्रमुख सन्देश भी यही था कि वह बिना किसी भेदभव के पूरे देश के प्रधानमंत्री है। काशी ने उन्हें विजयी बनाकर लोकसभा में भेजा, केरल में उनकी पार्टी का खाता नहीं खुला, फिर भी मोदी ने कहा कि उन्हें काशी की ही तरह केरल भी प्रिय है।
नरेंद्र मोदी के इस कथन में वस्तुतः सम्पूर्ण देश और यहां के सभी लोगों के प्रति अपनत्व का भाव था। मोदीं चुनावी मोड़ से बाहर आ चुके थे। राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप को उन्होंन तरजीह नहीं दी। उन्होंन देश के एकजुटता का सन्देश केरल से दिया।
यह भी उल्लेखनीय है कि चुनाव जीतने के बाद अपने पहले सार्वजनिक कार्यक्रम के लिए मोदी ने केरल को चुना। यही अंदाज और कार्यशैली भाजपा को एक दिन केरल में भी सफलता दे सकती है। कुछ भी हो मोदीं ने यहां के जनमानस को छुआ है। यह विश्वास दिलाया कि भाजपा की सरकार केरल के विकास में पूरा सहयोग देगी। यहां से उनकी पार्टी का कोई सांसद न होने के बाद भी उन्होंन केरल को चुना क्योंकि यह भी उन्हें उत्तर प्रदेश में अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी जितना ही प्रिय है।
मोदी ने केरल की जनता की प्रशंसा की और यहां के मतदाताओं के योगदान के लिये उनका धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि देश ने देखा है कि चुनाव में जनता जनार्दन होती है।
उन्होंने भगवान कृष्ण के मंदिर में पूजा अर्चना की। अपनी पार्टी को चुनने के लिए उन्होंने मतदाताओं का धन्यवाद दिया। कहा कि राजनीतिक पार्टियां और राजनीतिक पंडित लोगों के मूड को भांप नहीं सके। जनता ने भाजपा को अपना मजबूत जनादेश दे दिया। लोगों ने नकारात्मकता को खारिज किया और सकारात्मकता को स्वीकार किया है। इस भावना के साथ हम सभी मिलकर नये भारत का निर्माण करें। मोदी ने कहा कि यह जीतने वाले की जिम्मेदारी होती है कि वह एक सौ तीस करोड़ लोगों का ध्यान रखे।
जाहिर है कि नरेंद्र मोदी ने केरल में राष्ट्रीय एकता और सौहार्द का विचार व्यक्त किया। उन्होंन कांग्रेस और उसके किसी नेता के प्रति दुर्भावना वाली कोई बात नहीं की। बल्कि जिन्होंने भाजपा को वोट नहीं दिया, उनके प्रति भी सद्भावना दिखाई। क्योंकि पार्टी से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि देश में लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था विजयी हुई है।
दूसरी तरफ राहुल गांधी के भाषण में नरेंद्र मोदी और भाजपा के प्रति नफरत थी। यह माना जा रहा था कि चुनाव में भारी पराजय के बाद वह अपने तौर तरीकों में बदलाव करेंगे, अपने भाषण में नफरत और नकारात्मक विचारों को स्थान नहीं देंगे। इनका कांग्रेस को कोई फायदा भी नहीं मिला। राहुल गांधी की छवि में भी सुधार नहीं हुआ। लेकिन केरल यात्रा से तय हुआ कि राहुल अपने रंग ढंग बदलने को तैयार नहीं है। यह बात उनके भाषण से प्रमाणित हो गई है। राहुल ने कहा कि कांग्रेस पार्टी मजबूत विपक्ष बनकर उभरेगी। वैसे यह नहीं बताया कि की आखिर मजबूत विपक्ष बयँ कर कब उभरेगी। पिछले दो चुनाव में उसे लोकसभा में औपचारिक विपक्षी पार्टी का दर्जा भी नसीब नहीं हुआ। वह केवल अपने भाषणों से हंगामा करते रहे, सरकार को परेशान करने वाला एक भी जनांदोलन कांग्रेस नहीं चला सकी। अब वह कह रहे है कि कांग्रेस गरीबों की आवाज उठाएगी। ये वही गरीब है, जिन्होंने उनके छह हजार रुपये प्रतिमाह देने वाले न्याय को भी ठोकर मारी है।
केरल में सफलता इसलिए मिली क्योकि वहां वामपंथी सरकार की नाकामी का लाभ उठाने के लिए परम्परागत रूप में कांग्रेस ही मौजूद थी। राहुल ने नरेंद्र मोदी और भाजपा के प्रति नफरत का जम कर इजहार किया। कहा कि मोदी के पास अपार धन हो सकता है। जैसे कि कांग्रेस बड़ी गरीब पार्टी है, और राहुल गरीबों के मसीहा है। राहुल अगला जहर व्यक्त करते है कि मोदी के पास मीडिया हो सकता है, उनके साथ अमीर दोस्त हो सकते हैं लेकिन भाजपा द्वारा फैलाई गई असहिष्णुता के खिलाफ कांग्रेस पार्टी लड़ती रहेगी। भाजपा और मोदी की नफरत और असहिष्णुता का जवाब कांग्रेस पार्टी प्यार और स्नेह से देगी।
राहुल को यह भी बताना चाहिए था कि मोदी सरकार ऐसा क्या कर रही है, जिसमें उन्हें नफरत, जहर और असहिष्णुता दिखाई दे रही है। यह भी बताना चाहिए कि उनके भाषण से प्रेम की कौन सी धारा फुट रही है।







