डॉ दिलीप अग्निहोत्री
भाजपा संसदीय बोर्ड ने अमित शाह के साथ कार्यकारी अध्यक्ष नामित किया है। यह दूरदर्शिता पूर्ण निर्णय है। पार्टी को दोगुनी गति से आगे बढ़ाना संभव होगा। इसका प्रमुख कारण है कि अमित शाह और जेपी नड्डा की कार्यशैली एक जैसी है। दोनों ने विद्यार्थी जीवन में ही समाजसेवा का मार्ग चुना था। दोनों ने पार्टी को आगे और अपने को पीछे रखकर कार्य किया। दोनों अनवरत मेहनत से कार्य करने में विश्वास रखते है। दिनों राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से पहले अनेक प्रदेशों में चुनाव प्रभारी की भूमिका का निर्वाह कर चुके है। उत्तर प्रदेश में अमित शाह ने सफलता का कीर्तिमान बनाया था। जेपी नड्डा ने इस भूमिका में बेहतर परिणाम दिया। उत्तर प्रदेश में उनकी रणनीति ने सपा बसपा गठबन्धन के मंसूबों पर पानी फेर दिया। गठबन्धन के तीसरे घटक रालोद का खाता भी नहीं खुला। राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस को मात्र एक सीट पर सन्तोष करना पड़ा।वह अमित शाह पार्टी के लिए लक्ष्य का निर्धारण करते है। उसको हासिल करने की दिशा में पूरी क्षमता से प्रयास करते है। प्रभावी योजना का निर्माण करते है। जय पराजय की चिंता की जगह प्रयासों को वरीयता देते है। एक उदाहरण से उनकी कार्यशैली का अनुमान लगाया जा सकता है। गुजरात विधानसभा के चुनाव के बाद कांग्रेस के बड़े नेता विश्राम करने चले गए। जबकि अमित शाह गुजरात विधानसभा चुनाव समाप्त होने के तत्काल बाद वह त्रिपुरा रवाना हो गए। वहां विधानसभा में भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने लगे। इस कार्यशीली के बल पर उन्होंने भाजपा की जड़ें उन क्षेत्रों में मजबूत कर दी, जहां पहले पार्टी कमजोर थी।
भाजपा का संगठन आज पूरे देश में है। पहले इसे हिंदी भाषी राज्यों तक सीमित माना जाता था। कांग्रेस इस बात को लेकर तंज भी करती थी। लेकन अब ऐसा नहीं है। कर्नाटक में भाजपा की पहले भी सरकार रही है। फिलहाल वहां जेडीएस और कांग्रेस की सरकार है। यह सरकार अपनी लोकप्रियता गंवा चुकी है। भाजपा को रोकने के लिए बना गठबन्धन अंतर्विरोधों का शिकार हो चुका है। मुख्यमंत्री कुमारस्वामी कई बार अपना दुखड़ा रो चुके है। कांग्रेस विधायक दल में भी बगावत की सुगबुगाहट सुनाई देती है। अभी संपन्न आम चुनाव में मतदाताओं ने इस गठबन्धन के प्रति अपनी नाराजगी का जबरदस्त इजहार किया है। इसके बाद प्रदेश की सत्ता में बैठे लोग सकते में है।
पश्चिम बंगाल में भाजपा का पहले खास अस्तित्व नहीं था। इसे मुख्य मुकाबले से बाहर समझा जाता था। कम्युनिस्ट, कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस मुख्य किरदार के रूप में मौजूद थे। लेकिन अमित शाह ने यहां योजनाबद्ध रूप से कार्य किया। अब भाजपा केवल मुख्य मुकाबले में आ गई है। स्थानीय निकाय चुनावों में भी उसने चौकाने वाली सफलता दर्ज की है।
कांग्रेस और कम्युनिस्ट मुख्य मुकाबले से बाहर हो चुकी है मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भाजपा के बढ़ते जनाधार से बेहाल है। उनकी बौखलाहट साफ दिखाई देती है। केरल, आंध्र,तेलंगाना आदि प्रदेशों में भाजपा अभी मुख्य मुक़ाबले में नहीं है। लेकिन अमित शाह की सक्रियता और ठोस रणनीति ने इन प्रदेशों में भाजपा का आधार बढा दिया है। यहां भाजपा की अवहेलना नहीं कि जा सकती। पूर्वोत्तर राज्यों में भाजपा ने इन्हीं वर्षों में बुलंदी हासिल की है। यह सन्योग है कि जेपी नड्डा की कार्यशीली भी अमित शाह जैसी है। यह उम्मीद करनी चाहिए कि उनकी कमान में भाजपा का ग्राफ बढ़ेगा।







