सरनेम में रखा क्या है?
पिछले दिनों हरियाणा के जींद जिले की खेड़ा खाप ने फैसला किया कि नाम के साथ उपनाम (सरनेम) का इस्तेमाल न किया जाए। बुशला गांव में जुटी खाप पंचायत में गहन विमर्श के बाद घोषणा की गई कि खाप से जुड़े लोग अब से नाम के साथ गोत्र/जाति दर्शाने वाले उपनाम नहीं लिखेंगे। अलबत्ता, चाहें तो अपने नाम के साथ गांव का नाम लगा सकते हैं।
दरअसल, अरसे से खाप नेता महसूस कर रहे थे कि उपनाम लिखने से जातिगत भेदभाव को बढ़ावा मिलता है। समाज का ताना बाना छिन्न-भिन्न हो जाता है। जातिवादी बनने के बजाय राष्ट्रीय गौरव को सोच का हिस्सा बनाकर ही हम जातिगत भेदभाव को कुचल सकते हैं। हमारे भीतर हमेशा भाव रहे कि व्यक्ति जन्म से नहीं कर्म से महान होता है।
खाप का फैसला सराहनीय है। हालांकि खाप पंचायतें अपने अजीबोगरीब फैसलों के लिए बदनाम रही हैं, लेकिन यह फैसला सकारात्मक है। हरियाणा में तो और भी जहां इन दिनों राजनीतिक पटल पर 35 बनाम एक नाम से राजनीतिक संघर्ष जारी है। छत्तीस बिरादरियों का भाईचारा इस लड़ाई में पस्त हुए जा रहा है। एक ओर राज्य की राजनीति में शुरू से ही दबदबा बनाए रखने वाली बिरादरी है, तो दूसरी तरफ उनके सामने बाकी बिरादरियों की मोर्चाबंदी कर दी गई है। वोटों की फसल काटने के लिए घिनौना खेल खेला जा रहा है।
राजनीतिक दलों को इस बात से मतलब नहीं रह गया है कि इससे विभिन्न समाजों के बीच भाईचारे का क्या होगा? यहां एक और पहलू भी है जिसे नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए। किसी नाम के साथ उपनाम देखते ही ज्यादातर मामलों में उस व्यक्ति की योग्यता के आकलन की जरूरत नहीं समझी जाती।
पूर्वाग्रह या दुराग्रहवश मान लिया जाता है कि अमुक जाति से है तो अपराधी प्रवृत्ति का होगा। कामचोर, लालची, लड़ने-झगड़ने वाला होगा या अच्छा ही होगा। कहते हैं कि पांचों उंगलियां बराबर नहीं होतीं। जातीय आधार पर किसी का आकलन तंग सोच का द्योतक है, प्रतिभाशाली लोगों के योगदान से वंचित करता है। इस मायने में खाप पंचायत का फैसला विवेकपूर्ण है।
- तेजा चौधरी से साभार







