- अनुच्छेद 370 से ही अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी
- मोदी-शाह की राजनीतीक इच्छाशक्ति ने दी कश्मीर में खुशियों को संजीवनी
राहुल कुमार गुप्त
पाकिस्तान के नापाक दीमकी इरादों पर भारत ने करारा प्रहार कर विश्व पटल पर एक सकारात्मक जवाब दे दिया है। कश्मीर पर पूरा हक भारत का है वो कश्मीर की समस्या को जो लगातार कई वर्षों से बनी हुई थी उसको सुधारने का एक सख्त- कोमल प्रयोग लेकर आयी है मोदी-शाह की जोड़ी। यह एक प्रबल राजनीतिक इच्छा शक्ति के कारण संभव हो सका है कि अनुच्छेद 370 में बदलाव व 35-A को समाप्त करने का संकल्प पूरा हो सका। कश्मीर के पिछड़ेपन, बेरोजगारी, आतंकी घटनाओं का आम होना व आतंकियों का पाक से आना-जाना, अलगाववादियों द्वारा पाक के गुण गाये जाना तथा केंद्र सरकार को धोखे में रखकर आर्थिक मदद और तमाम सुविधाएं लेने के बावजूद भी वो कश्मीर को दीमक की तरह चट करने में लगे रहे।वहाँ के बच्चे, युवा व बेटियों को अलगाववाद का पाठ पढ़ाने के अलावा भारत से नफ़रत व पाक से मोहब्बत का पाठ ही पढ़ाया जाता रहा। हर बार यहाँ से भेजा गया पैसा वहाँ के सियासतदारों व सरकारों की पेट में गया और केंद्र सरकार इस पर कभी जाँच नहीं करा सकती थी क्योंकि रक्षा, विदेश और संचार के अलावा संसद कोई भी और कानून अपनी मर्जी से नहीं बना सकती थी। कैग भी वहाँ के लिये निष्प्रयोज्य ही था।
केंद्र सरकार द्वारा समय-समय पर जम्मू-कश्मीर के लिये अपने सीमित दायरे पर बनाये गये हर तौर-तरीकों का परिणाम शून्य ही रहा तब ऐसे में कश्मीर वासियों के हित के लिये अनुच्छेद 370 में बदलाव जरूरी समझ में आया। इसी अनुच्छेद के चलते आम काश्मीरी आज तक पिछड़े और परेशान रहे वजह अनुच्छेद 370 की विशेषताओं का लाभ यहाँ की सरकारों और सियासतदारों तक सीमित हो गया था।

वहाँ के आम लोगों में यह भय व्याप्त कर दिया गया था कि अनुच्छेद 370 का लागू रहना ही हमारी आजादी है और यह भ्रम फैलाया गया उन लोगों के द्वारा जो केंद्र सरकार द्वारा भेजी गयी मलाई को हजम करते थे। यह प्रचलन में रहते-रहते ऐसे हो गया की संविधान में उल्लेखित शब्द ‘अस्थाई प्रावधान’ को अन्य सरकारों ने इसलिये देखना उचित नहीं समझा कि कहीं उनका वोट बैंक, उनके सहयोगी दल नाराज न हो जायें। अपने इसी फायदे के चलते पूर्ववर्ती सरकारों ने कश्मीर की आम जनता को उनके वैसे ही हाल में छोड़ दिया। किन्तु मोदी-शाह की इस जोड़ी ने उस लाईलाज दर्द का ऑपरेशन किया। ऑपरेशन में एनाॅथीसिया दिया जाना स्वाभाविक है, कुछ भय भी स्वाभाविक है लेकिन अंततः ऑपरेशन के बाद दर्द से व रोग से छुटकारा मिलता है। कश्मीर के लोगों को समझाना पड़ेगा और उन्हें समझना पड़ेगा कि हाँ! एक गंभीर बीमारी का ऑपरेशन हुआ है, हमारे हितों के लिये एक प्रयोग हुआ है। अतः इस प्रयोग उपरांत के वातावरण में खुली साँस लें और दहशतगर्दों के बहकावे में आना बंद करें। तो धरती का जन्नत पुनः जन्नत के रूप में स्थापित हो पायेगा।
विपक्ष इस फैसले को ‘संवैधानिक हत्या’ बता कर अपनी नाकामयाबियों और अपनी दुर्बल राजनीतिक इच्छाशक्ति को छिपाने का प्रयास कर रहा है। ऊल-जुलूल के तर्कों से सत्य को असत्य करने की ये कोशिशें जनता के समक्ष है। जनता को मालूम है काश्मीरियों को भी मालूम होना चाहिये की इस ऐतिहासिक फैसले के पीछे लोकतंत्र का हित ही है लोकतंत्र की हत्या कहीं नहीं हूई। यह फैसला पूर्ण रूप से संवैधानिक दायरे पर चलकर ही पूर्ण हुआ है।
अनुच्छेद 370 से ही अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किया गया है। हाँ! 370 पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुआ उसका खण्ड 1 आज भी शेष है। खण्ड दो और तीन ही प्रचलन से बाहर किया गया है जिसमें अनु.35A स्वतः खत्म हो गया।
संविधान के भाग-21 में स्पष्ट शब्दों में उल्लेखित है कि अनुच्छेद-370 एक विशेष एवं अस्थायी स्वरूप का है। जो जम्मू-कश्मीर राज्य को अन्य राज्यों की अपेक्षा ज्यादा स्वायत्तता प्रदान करता है।
यही अनु. पाक नागरिकों को भी बड़ी सरलता से कश्मीर की भी नागरिकता देने वाला बना रहा। न जाने कितने पाकिस्तानी यहाँ की बेटियों से शादी कर के कश्मीर की नागरिकता प्राप्त कर ली। दुश्मन देश होने के बावजूद यह कहाँ तक उचित था कि उनके नागरिकों को (उनमें से तमाम गुप्तचर और आतंकी संगठनों से भी ताल्लुकात रखने वाले होंगे) को यहाँ का नागरिक बन चुनाव लड़ने की भी छूट। लेकिन बँटवारे के समय पाकिस्तान से कश्मीर पर बसे जाने वाले हिन्दू-सिख-व कुछ मुस्लिम आज भी वहाँ शरणार्थी हैं। यह षड्यंत्र पूर्ववर्ती सरकारों को सत्ता के लालच में नहीं दिखा और आज भी वोटबैंक के लालच में आँखों पर पट्टी बाँधे हुए हैं। पाकिस्तान इसीलिये बिलबिलाया हुआ है कि नफ़रत के सौदागरों को अब भारत कैसे भेज पायेगा?
उधर विपक्ष भी पाकिस्तान के मंतव्यों को कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं परोक्ष दोनों रूप से मजबूती देने में लगा हुआ है। अपनी नाकामी से परेशान विपक्ष ने हताशा पूर्ण और तथ्यविहीन बयानबाजी करना शुरू भी कर दिया।
कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी का वह अधूरा ज्ञान था या हताशा!
“उन्होंने जम्मू-कश्मीर को पीओके की तरह समझ लिया और गृहमंत्री अमित शाह को ज्ञान दे डाला कि यह आंतरिक मामला नहीं है। उन्होंने अपनी हताशा और अज्ञानता से यह स्पष्ट किया कि जम्मू-कश्मीर पर भी अंतर्राष्ट्रीय विवाद है!”
धन्य हैं ऐसे नेता। इनसे देशहित के लिये क्या उम्मीद की जाये? खैर सोनिया जी की फटकार पर माफी माँग ली और अपनी अज्ञानता जाहिर की।
26 जनवरी 1957 को जम्मू-कश्मीर का संविधान जम्मू-कश्मीर पर लागू हुआ, जिसमें इसे भारत का अभिन्न अंग बताया गया साथ ही पीओके को भी वहाँ के संविधान के साथ भारत के संविधान में भी भारत का अंग बताया गया। पीओके पर ही 1947 से विवाद है और यह मसला यूएन के पास तब से है जिस पर आज तक कोई फैसला नहीं आ सका।
जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में 111 सीटें रखी गयीं थी जिनमें से 87 सदस्यों के लिये चुनाव होना शुरू हो गया और 24 सीटें पीओके के सदस्यों के लिये खाली रख दी गयीं।
वहीं कांग्रेस के युवराज राहुल गाँधी ने भी हताशापूर्ण दिया बयान:
उन्होंने कहा,” देश जमीन के टुकड़ों से नहीं बनता, लोगों से बनता है।”
शायद वो यूपी बोर्ड में हिंदी में पढ़ाये जा रहे वासुदेव शरण अग्रवाल जी का ‘राष्ट्र का स्वरूप’ निबंध पढ़े होते या अन्य विदेशी लेखक जो राष्ट्र के बारे में लिखे हैं तो शायद उन्हें मालूम होता कि राष्ट्र के निर्माण का पहला और प्रमुख तत्व ही जमीन है दूसरा लोग और तीसरी संस्कृति है।
3- वहीं सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव भी हताशा में बीरबल और अकबर की बैंगन वाली कहानी तक अटके रहे बस उसी तथ्यविहीन कहानी से समझाने का प्रयास करते रहे की राजा की खुशी के लिये सब हो रहा है।
राज्यपाल ने राजा की खुशी के लिये अनु.-370 खत्म करने की अनुशंसा भेजी।
आखिर राजा की इसमें कौन सी व्यक्तिगत खुशी है 70 सालों से चली आ रही एक बड़ी बीमारी को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है क्योंकि अन्य सरकारों ने बहुत से तौर-तरीकों को आजमा कर देख लिया पर परिणाम जस का तस रहा।
केवल मुस्लिम तुष्टीकरण को लेकर बैठने वाले यह भी तो देखें की आज काश्मीरी भाईयों एवं बहनों के लिये समस्त भारत के साथ यहाँ का मुस्लिम भी इस फैसले से बेहद खुश है।
सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, महिलाओं को समानता का अधिकार व कैग आदि सभी ऐसे कानून जिनसे एक राज्य प्रबल होता है वहाँ के लोग सही मायने में लोकतंत्र का फायदा ले सकते हैं। मूल अधिकारों से अपने जीवन और खुशी का हक ले सकते हैं अब जम्मू-कश्मीर में वो लागू होने जा रहा है कि कश्मीर का जर्रा-जर्रा खुली और भयमुक्त साँस ले सकेगा।
अनुच्छेद 371 कुछ विशेष राज्यों के लिये कुछ विशेष प्रावधान रखते हैं जिसमें वहाँ की संस्कृति और सभ्यता संरक्षित रहने के साथ और भी कई स्थानीय मसलों को वरीयता दी जाती है।
देश के गृहमंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि जम्मू-कश्मीर पर अनुच्छेद-371 लागू होगा।
यह अनु. लागू कर हिल्स काऊंसिलस् ( स्थानीय परिषदों) को पाॅवर देना सरकार की सही नियति को प्रबल करती है। यह सरकार वास्तव में काश्मीरियों की समस्याओं को समाप्त करने के लिये प्रतिबद्ध है।
सरकार का अगला चरण यह भी रहेगा की सभी राज्यों की सरकारी नौकरियों में यहाँ के लोगों को विशेष आरक्षण और विशेष अवसरों का प्रावधान भी हो।
प्रक्रिया पूरी तरह से संवैधानिक और लोकतांत्रिक रही:
अनुच्छेद-370 के उपखंड (3) के अनुसार इस अनुच्छेद के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, राष्ट्रपति लोक अधिनियम द्वारा यह घोषणा कर सकता है कि, यह अनुच्छेद प्रवर्तन में नहीं रहेगा, जिसे वह विनिर्दिष्ट करे। परन्तु यह अधिसूचना राज्य की संविधान सभा की अनुशंसा के पश्चात ही जारी की जा सकेगी।
अब चूँकि जम्मू-कश्मीर में संविधान सभा अस्तित्व में नहीं है तो उसकी अनुशंसा के बगैर अनुच्छेद-370 का हटना अभी तक असंभव सा लगता रहा और विपक्ष इसी बात को लेकर हो हल्ला मचा रहा है कि यह फैसला असंवैधानिक है।
ऐसे में संविधानविदों ने अपने-अपने तर्क दिये। कुछ का मत रहा की अब अनु. 370 कभी नहीं हट सकता किन्तु कई संविधानविदों ने यह बताया की वहाँ की संविधान सभा का आधुनिक रूप विधानमंडल है जैसे की भारत की संविधान सभा का आधुनिक रूप संसद है। वहाँ की संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव 1951 में हुआ और अनुच्छेद -370 को अस्थायी उपबंध के रूप में तत्कालीन संविधान सभा ने 17 नवंबर 1952 को स्वीकार कर लिया। संविधान सभा विधानमंडल का दायित्व भी निभा रही थी।
ऐसे में विधानमंडल के दिशा-निर्देश में यह कार्य उचित होता किन्तु विधानसभा भंग है और विधानसभा-विधानमंडल का पूरा दायित्व वहाँ के राज्यपाल पर आता है ऐसे में राज्यपाल द्वारा की अनुशंसा से ही ने राष्ट्रपति लोक अधिनियम द्वारा अनु.-370 को निष्प्रभावी कर दिया गया। और अनु.-370 के खत्म होने के बाद जम्मू-कश्मीर भारत का एक सामान्य राज्य हो गया जिस पर संसद कोई भी कानून बना सकती थी। फिर इसके बाद ही 5 अगस्त को राज्यसभा में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक 2019 पेश किया गया जो की बहुमत के साथ पारित भी हो गया छह अगस्त को यह विधेयक लोकसभा से भी पारित हो गया। नुच्छेद-370 संसद नहीं समाप्त कर सकती थी राष्ट्रपति ही लोक अधिनियम के द्वारा इसे समाप्त कर सकते थे।
पुनर्गठन विधेयक पर अब राष्ट्रपति के हस्ताक्षर बाकी हैं, जैसे ही इस विधेयक पर हस्ताक्षर होते हैं वैसे ही जम्मू-कश्मीर तथा उसी से टूटा लद्दाख दो केंद्रशासित प्रदेश बन जायेंगे। जम्मू-कश्मीर में दिल्ली और पुदुचेरी जैसी विधानसभा की व्यवस्था के साथ उपराज्यपाल होंगे और लद्दाख में अन्य केंद्र शासित प्रदेशों की तरह उपराज्यपाल शासन करेंगे।
चुनौतियाँ भी कम नहीं:
अभी तक केवल वहाँ के अलगाववादी देश के लिये गंभीर चुनौती थे किन्तु अब वहाँ के मलाई खाने वाले सियासतदार भी आमजन को भड़काने का प्रयास करेंगे। चीन और पाकिस्तान की सीमाओं में पहले से कई गुना ज्यादा चौकसी की जरूरत पड़ेगी। नफ़रत फैलाने वालों पर सख्ती से पेश आना होगा। वहाँ के आमजन के साथ अच्छा हुआ है यह हर तरह से विश्वास दिलाना सरकार का प्राथमिक कार्य होना चाहिये।
अनुच्छेद-371 में मिले उनके विशेष प्रावधानों का जल्द से जल्द उल्लेख कर हिल्स काउंसिल की पाॅवर का भी उल्लेख कर उन्हें बताना होगा कि सबकुछ पहले से बेहतर होने वाला है बस आपके नेताओं पर गाज गिरी है आपको तो मुक्ति मिली है, आप विस्तृत हो चुके हो पूरे भारत वर्ष में! अब बेरोजगारी और पिछड़ापन आतंकियों का भय, सेनाओं और पुलिस का भय स्वतः खत्म हो जायेगा। क्योंकि अब तक इनके द्वारा किये कुकृत्य भी जनता और विश्व पटल देख नहीं पाता था किन्तु जब सभी भारतीयों का आना-जाना और अपनापन होगा तो तब किसी आतातायी की हिम्मत न होगी की आपके साथ कोई अत्याचार कर सके।
धरती के जन्नत पर फिर जन्नत की रौनक नज़र आये।
यहाँ भय और आतंक का अब मंजर न नज़र आये।।
– राहुल कुमार गुप्त








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धरती के जन्नत कश्मीर का दर्द http://dhunt.in/3Ro6K?ss=wsp&s=pa