जिंदा रहते हुए भी ना जिंदा हूं।
आज बिना पंख का परिंदा हूं।
इस पंख को काट दिया है समाज ने,
खारा पानी वाला आज बन गया भटिंडा हूं।
देखो ना, आज बेटी की लूट गयी अस्मत,
फिर भी कैसे मैं यहां जिंदा हूं।
बच्चे को नहीं दे पाये संस्कृति की शिक्षा,
इस कारण आज मैं बहुत शर्मिंदा हूं।
- उपेंद्र नाथ राय ‘घुमंतू’







