विद्यांत हिन्दू पीजी कॉलेज में सुभाष जयंती पर राष्ट्रभक्ति नाटक का मंचन किया गया। इसमें विद्यर्थियो के साथ शिक्षकों ने भी अभिनय किया। प्रबंधक शिवाशीष घोष ने आगंतुकों का स्वागत किया। प्रो रिपु सूदन सिंह,डॉ गोपाल चक्रवर्ती,अरुप सान्याल,डॉ बृजेन्द्र पांडेय,जस्टिस अरुण कुमार गुप्त,प्रो वाईपी सिंह ने सुभाष जी पर व्याख्यान प्रस्तुत किया। विद्यांत हिंदी कांग्रेस के तत्वावधान में हुए इस नाटक के निर्माता,निर्देशक पटकथा व संवाद लेखक डॉ बृजेश कुमार थे। सहायक निर्देशक डॉ श्रवण कुमार गुप्त,रंगमंच संचालक डॉ नीतू सिंह,सहसंचालक डॉ अमित वर्धन,डॉ ध्रुव कुमार,डॉ दिनेश मौर्य,डॉ अभिषेक वर्मा और डॉ प्रियंका अवस्थी ने किया। विमल कुमार,मनोहर,अब्दुल ने व्यवस्था में सहयोग दिया।
समापन भाषण डॉ आरके मिश्र और धन्यवाद ज्ञापन डॉ सुरभि शुक्ला ने किया। इस अवसर पर लुआकटा अध्य्क्ष डॉ मनोज पांडेय,महामंत्री डॉ अंशु केडिया, डॉ मधु चौहान सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे। समारोह में नेता जी नाटक में सुभाष चन्द्र बोस सम्पूर्ण ऐतिहासिक वांग्मय पर आधारित बीस दृश्यों का मंचन किया गया। इसमें उनके छात्र जीवन सुभाष गांधी संवाद,सुभाष हिटलर संवाद,आजाद हिंद फौज की स्थापना,जापानी राजदूतों का पत्र समर्पण,आदि दृश्य समाहित थे। जवाहर लाल नेहरू की भूमिका में डॉ राजीव शुक्ला,और हिटलर की भूमिका में डॉ दीप किशोर श्रीवास्तव ने अभिनय किया। विद्यार्थी सुभाष चन्द्र बोस के रोल में आशुतोष शर्मा,महात्मा गांधी के रोल में शिवम यादव सरदार पटेल के रोल में पूजा शर्मा के अलावा शितिज अग्निहोत्री कृष्ण कुमार, आदर्श तिवारी, आंनद, आशुतोष त्रिपाठी, प्रमोद कुमार गुप्ता,नीलेश सोनकर, गणेश, हरीश ने भी सराहनीय प्रस्तुति दी। निरंतर संवाद चलता है। संवाद अपने साथ भी होता है,समाज और राष्ट्र के साथ भी होता है। इसी संवाद से विचार का मार्ग निकलता है। नेता जी सुभाष चन्द्र बोस पर भी निरंतर संवाद चलता है। फिर भी उनके व्यक्तितव का पूरा आकलन करना मुश्किल हो जाता है। नेता जी ऐसे महारथी है, जिनकी बराबरी संभव नहीं, लेकिन उनसे प्रेरणा अवश्य ली जा सकती है।

नेता के विचार सदैव जीवित रहेंगे। सदैव प्रासंगिक रहेंगे। उनके पास कभी कोई राज्याश्रय नहीं मिला। इसके प्रति उनकी कोई आसक्ति नही थी। वह तो वैभव और सुविधाओं का त्याग करने वाले थे। उन्होंने अपना लाभ कभी देखा नहीं, अपने लिए वह कोई उपलब्धि चाहते भी नही थे। उनका समर्पण तो राष्ट्र और समाज के लिए था। देश को अंग्रेजों के चंगुल से बाहर निकालना उनका एक मात्र उद्देश्य था। इसके लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया।
धर्म धारण किया जाता है। यह गीता का दर्शन है। गीता और राम चरित मानस का अध्ययन सभी को करना चाहिए। इसमें कहा गया की जिधर धर्म है उधर ही जय है। इससे धर्म मार्ग पर चलने की प्रेरणा है। पांडव धर्म के मार्ग पर थे,उनके सारथी स्वयं प्रभु कृष्ण है। रावण महाज्ञानी था,लेकिन वह अधर्म के मार्ग पर थे,श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम थे। वह तो धर्म मार्ग पर चलने का ही सन्देश देते है। इसलिए पांडव भी विजयी हुए,श्रीराम की सेना भी विजयी हुई। स्वतंत्रता संग्राम के हमारे सेनानी भी धर्म मार्ग पर चलते है। महात्मा गांधी तो नियमित धर्म प्रार्थना सभा करते है। वह रामराज्य की कल्पना करते है। सुभाष चन्द्र बोस नियमित साधना करते है। वह मां काली के परम उपासक है। वह भारत माता के साकार रूप की कल्पना करते है। उन्हें ब्रिटिश बेड़ियों में जकड़ा हुआ देखते है। भारत माता को बेड़ियों से मुक्त कराने में अपना जीवन लगा देते है।

सुभाष चन्द्र बोस पर जितना भी विचार करें,वह कम है। महापुरुषों की जयंती मनाना शिक्षण संस्थान का कर्तव्य है। विद्यर्थियो व शिक्षकों को ऐसे महापुरुषों से प्रेरणा लेना और उनका प्रचार प्रसार करना चाहिए। देश और समाज की समस्याओं और प्रश्नों को समझना चाहिए। उनका ऊत्तर तलाशना चाहिए। नेता जी ने दर्शन परिषद बनाई थी। उस समय वह विद्यार्थी थी। इसमें वह विद्यर्थियो के साथ विचार विमर्श करते थे। आज भी महापुरुषों की जन्म जयंती पर विद्यर्थियो को प्रेरणा लेनी चाहिए। नेता जी युवकों के चरित्र बल पर बहुत जोर देते थे। इसके अभाव में वह राष्ट्र और समाज के लिए कोई योगदान नहीं दे सकते। आज हम जिस वैचारिक परिवेश में है, उनपर गम्भीरता से विचार करना होगा।
नेता जी पर रामकृष्ण परमहंस,स्वामी विवेकानन्द,महर्षि अरविंद, रविन्द्र नाथ टैगोर के विचारों से प्रभावित थे। भारतीय पुनर्जागरण के गूढ़ रहस्य को वह समझते है। वह शंकर के वेदांत का अध्ययन करते है। इस पर उनका राष्ट्रधर्म आधारित था। रामकृष्ण परमहंस के वैचारिक आधार पर भी उनका आकलन किया जा सकता है। जो प्रश्न इन संतों ने देखे,नेता जी उनपर भी विचार करते है। वह संकीर्ण राष्ट्रवाद के समर्थक नहीं थे, वह सम्यक राष्ट्रवाद का समर्थन करते है। इसमें किसी के प्रति नफरत नहीं थी। वह भारतीयों को हीन भावना से उबरना चाहते थे। भारतीयों को राष्ट्रीय गौरव और स्वाभिमान से प्रेरित होना चाहिए।
समारोह के अंत में विद्यांत हिन्दू पीजी के इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ एके सिंह के निधन पर दो मिनट का मौन रखा गया।
- डॉ दिलीप अग्निहोत्री






