लखनऊ विवि के शिक्षाशास्त्र विभाग में दस दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ
झारखंड, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तराखंड, गुजरात, बिहार सहित कई राज्यों से पहुंचे शोधार्थी
लखनऊ विश्वविद्यालय में ‘शोध विधियां पाठ्यक्रम’ पर दस दिवसीय कार्यशाला मंगलवार को शुरू हुई। शिक्षा संकाय द्वारा आयोजित इस सेमिनार में शोध कार्य की गंभीरता पर विशेष ध्यान देने पर जोर दिया गया। इसके साथ ही इस बात पर भी बल दिया गया कि शोध व्यक्तिगत, शैक्षिक समाज तथा समाज के अन्य व्यक्तियों के लिए लाभदायी होना जरूरी है। इस कार्यशाला में कुल 30 शोधार्थी भाग ले रहे हैं, जिसमें 20 झारखंड, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तराखंड, गुजरात, बिहार आदि राज्यों से आये हैं। कार्यशाला का शुभारंभ करते हुए मुख्य अतिथि शिक्षाशास्त्र विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर एम वर्मा ने कहा कि आज शोध को समाज से जोड़ने की जरूरत है।
मुख्य अतिथि ने कहा कि शोध कार्य को करने के लिए शोध विधियों में प्रवीण होना चाहिए तथा एक शोधार्थी को शोध कार्य बड़े ही गम्भीरतापूर्वक करना चाहिए, जिससे वह व्यक्तिगत, शैक्षिक समाज तथा समाज के अन्य व्यक्तियों को वह लाभदायी हो। उन्होंने कहा कि शोध से कुछ विशेष निकलकर आये, तभी समाज के लिए वह उपयोगी हो सकता है। उन्होंने कहा कि शोध के क्षेत्र में अन्वेषणों पर भी विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
शिक्षाशास्त्र संकाय की संकायाध्यक्ष प्रोफेसर अमिता बाजपेयी ने कार्यशाला के मुख्य अतिथि का पुष्पगुच्छ से स्वागत किया। उन्होंने कार्यशाला में उपस्थित सभी प्रतिभागियों का मार्गदर्शन करते हुए शोध की बारीकियों से अवगत कराया तथा शोध कार्य को समाज से जोड़ने की बात कही। उन्होंने कहा कि हर शोधार्थी को यह ध्यान देना जरूरी है कि उसके शोध से समाज को क्या फायदा हो रहा है। कार्यशाला के संयोजक डॉक्टर अरुण कुमार ने सभी लोगों का स्वागत करते हुए दस दिवसीय कार्यशाला की रूपरेखा प्रस्तुत की।






