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    ओमान तट पर अमेरिकी हमला और कूटनीतिक आत्मसमर्पण: क्या भारत की रणनीतिक स्वायत्तता एक छलावा मात्र है?

    ShagunBy ShagunJune 14, 2026 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    US attack off the Oman coast and diplomatic surrender: Is India's strategic autonomy merely a facade?
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    (Aalok Bajpai is a senior journalist, columnist and multidisciplinary cultural commentator. He is a research scholar in economics and writes on democracy, political economy, development and environmental issues. His writings have appeared in national and regional publications. The views expressed are personal.)आलोक बाजपेयी

    ओमान की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य में अमेरिकी केंद्रीय कमान (US CENTCOM) द्वारा तीन वाणिज्यिक जहाजों -MT Settebello, MT Mariveks, और MT Jalveer -पर किए गए भीषण हमलों ने वैश्विक राजनीति में भारत के कद और उसकी सुरक्षा चिंताओं की पोल खोल दी है। इस बर्बर सैन्य कार्रवाई में तीन भारतीय नाविकों – चीफ इंजीनियर पटनाला सुरेश, डेक कैडेट आदित्य शर्मा और इंजन फिटर शिवानंद चौरसिया -की दर्दनाक मौत हो गई। एक उभरती हुई महाशक्ति, ‘विश्वगुरु’ और दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की कगार पर खड़े देश के लिए अपने ही नागरिकों की रक्षा न कर पाना और मित्र देश की इस खुली आक्रामकता पर दबी जुबान में बात करना कूटनीतिक और रणनीतिक रूप से अत्यंत शर्मनाक है।

    खोखली रणनीतिक साझेदारी और अमेरिका का दोहरा रवैया

    यह घटनाक्रम विशेष रूप से भारत के लिए विरोधाभासी और अपमानजनक है क्योंकि अमेरिका ‘क्वाड’ (Quad) गुट में भारत का सबसे प्रमुख रणनीतिक सहयोगी होने का दम भरता है। जो देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ‘स्वतंत्र और खुले समुद्र’ (Free and open Indo-Pacific) और अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों की दुहाई देते नहीं थकते, उन्हीं के द्वारा समुद्री मार्गों पर की गई अंधाधुंध सैन्य कार्रवाई में भारतीय नाविकों को निशाना बनाया गया। इस मुद्दे पर देश के जाने-माने भू-रणनीतिज्ञ और रक्षा विशेषज्ञ डॉ. ब्रह्मा चेलानी के तीखे बयानों ने भारत की तथाकथित रणनीतिक स्वायत्तता की कलई खोलकर रख दी है। डॉ. चेलानी ने सीधे शब्दों में रेखांकित किया है कि यह हमला अमेरिका के उस दोहरे रवैये को उजागर करता है, जहाँ वह रणनीतिक साझेदारी के नाम पर भारत को केवल मूर्ख बना रहा है। उनका स्पष्ट मानना है कि वाशिंगटन कभी भी चीन या रूस के नागरिकों या उनके हितों वाले जहाजों पर इस तरह का सीधा और जानलेवा हमला करने की हिम्मत नहीं करता। अमेरिका अच्छी तरह जानता है कि बीजिंग या मॉस्को इसके बदले में किस स्तर की सैन्य, परमाणु या आर्थिक जवाबी कार्रवाई कर सकते हैं। चूंकि भारत हर बड़े संकट पर ‘दब्बू कूटनीति’ (Submissive Foreign Policy) और केवल औपचारिक विरोध दर्ज कराने तक सीमित रहता है, इसलिए अमेरिका बिना किसी परिणाम के डर के भारतीय चालक दल वाले जहाजों पर मिसाइलें दाग देता है।US attack off the Oman coast and diplomatic surrender: Is India's strategic autonomy merely a facade?

    “भारतीयों के जीवन पर चुप्पी”: एक राष्ट्रीय शर्म

    वैश्विक स्तर पर भारत के इस कूटनीतिक आत्मसमर्पण की तुलना अगर पश्चिमी देशों से की जाए, तो एक बड़ा कड़वा सच सामने आता है। जैसा कि ब्रह्मा चेलानी ने अपने विश्लेषण में कहा है: “अगर इस हवाई हमले में तीन अमेरिकी मर्चेंट नेवी के नाविक मारे गए होते, तो संयुक्त राज्य अमेरिका में चौबीसों घंटे का राजनीतिक संकट खड़ा हो जाता।” लेकिन यहाँ अमेरिकी हमले में तीन भारतीयों की मौत पर पूरी दुनिया में कोई सुगबुगाहट तक नहीं है। यहाँ तक कि भारत के शीर्ष नेतृत्व ने भी इस क्रूर हमले पर अब तक कोई कड़ा सार्वजनिक बयान नहीं दिया है, और पूरी ज़िम्मेदारी विदेश मंत्रालय के एक रूटीन औपचारिक कूटनीतिक विरोध और अमेरिकी राजनयिक को तलब करने की औपचारिकता पर छोड़ दी गई है। चेलानी 1999 में बेलग्रेड में चीनी दूतावास पर हुए अमेरिकी हमले का उदाहरण देते हैं कि कैसे चीन अपने नागरिकों की मौत को एक ‘अंतरराष्ट्रीय संकट’ में बदल देता है, जबकि भारत सरकार अपने ही नागरिकों की मौत के महत्व को कम करके आंकने का प्रयास कर रही है ताकि अमेरिका के साथ उसके ‘मधुर संबंध’ खराब न हों।

    दसियों हज़ार किलोमीटर दूर ‘वैश्विक थानेदार’ की साम्राज्यवादी जागीर

    यह घटना अमेरिका की ‘वैश्विक थानेदार’ वाली उसी दंभपूर्ण और साम्राज्यवादी मानसिकता को दर्शाती है, जिसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों की कोई परवाह नहीं है। संयुक्त राज्य अमेरिका अपनी भौगोलिक सीमाओं से 12,000 किलोमीटर दूर मध्य-पूर्व और ओमान के समुद्र तट पर जाकर अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र को अपनी निजी जागीर समझने की भूल कर रहा है। सवाल यह उठता है कि संप्रभु राष्ट्रों के समुद्री क्षेत्रों और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मार्गों पर इस तरह की एकतरफा सैन्य नाकेबंदी (Blockade) और मर्चेंट नेवी के निहत्थे जहाजों पर जानलेवा हमले करने का कानूनी या नैतिक अधिकार अमेरिका को आखिर किसने दिया? बिना किसी अंतरराष्ट्रीय जनादेश (UN Mandate) के किया गया यह हमला सीधे तौर पर वैश्विक संप्रभुता का खुला उल्लंघन है। अमेरिका की यह गुंडागर्दी दर्शाती है कि वह आज भी खुद को हर कानून से ऊपर समझता है।

    देश के पिछवाड़े में ही अपमान

    वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला (Energy Supply Chain) में भारतीय नाविकों की रीढ़ की हड्डी के समान भूमिका है। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे तनावपूर्ण इलाकों में हज़ारों भारतीय नाविक अपनी जान जोखिम में डालकर काम कर रहे हैं। यह घटनाक्रम इसलिए भी शर्मनाक है क्योंकि अमेरिकी नौसेना ने भारत के समुद्री पड़ोस (Immediate Neighborhood) को ही युद्ध क्षेत्र में बदल दिया है, जिससे हमारे अपने ही प्रभाव क्षेत्र में भारत की संप्रभुता और धाक पर सवाल खड़े हो गए हैं. जब अमेरिकी प्रतिबंधों और नाकेबंदी (Blockade) की बात आती है, तो अमेरिका भारतीय नागरिकों को महज़ ‘कौलेटरल डैमेज’ यानी युद्ध की अनिवार्य क्षति मानकर उड़ा देता है। विदेशी सेनाओं द्वारा वाणिज्यिक जहाजों पर सीधी गोलीबारी की इस घटना पर भारत का यह मौन यह संदेश देता है कि अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति के दबाव के आगे भारतीय जीवन और राष्ट्रीय सम्मान की कीमत बेहद सस्ती है।

    कागजी स्वायत्तता से आगे बढ़ने का समय

    एक उभरती हुई महाशक्ति के लिए इससे ज़्यादा आत्मघाती और क्या हो सकता है कि उसके परम-मित्र होने का दावा करने वाला देश उसके नागरिकों को मार गिराए और भारत सरकार केवल कागज़ी विरोध की औपचारिकता पूरी कर ले। सांत्वना, वित्तीय मुआवज़ा या अमेरिकी प्रशासन का एक हल्का सा खेद जताना इस कूटनीतिक विफलता को नहीं छुपा सकता। जैसा कि ब्रह्मा चेलानी और अन्य रणनीतिक विश्लेषकों की चेतावनियों से साफ है कि यदि भारत अब भी खुलकर अमेरिका की इस साम्राज्यवादी गुंडागर्दी के खिलाफ सख्त और दंडात्मक कदम नहीं उठाता, तो यह मान लिया जाएगा कि भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ केवल भाषणों, चुनावी रैलियों और कागजों तक ही सीमित है। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में किसी भी देश की सैन्य कार्रवाई में भारतीय नागरिकों को ढाल न बनाया जाए, अन्यथा वैश्विक मंच पर भारत का महाशक्ति बनने का दावा महज़ एक कूटनीतिक मज़ाक बनकर रह जाएगा।

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