- आईसीआर-केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान ने विकसित की बेल की दो उत्तम प्रजातियां, देगा अधिक फायदा
- ग्राफ्टेड पौधों की बढ़ी मांग को देखते हुए संस्थान के वैज्ञानिकों ने विकसित की इन प्रजातियों को, कम दिनों में ही देने लगेगा फल
अब आठ-दस साल बाद बेल का फल मिलने की बात भूल जाइए। अब यह फल पौधरोपण के बाद चार से पांच सालों में ही मिलने लगेगा। वह भी उच्च उपज के साथ ही आपको ज्यादा फायदा देने वाला है।
यह विशेष दाे किस्मों सीआईएसएच-बी-1 और सीआईएसएच-बी-2 को विकसित किया है आईसीआर-केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान ने। किसानों में इसकी मांग काफी बढ़ी है।
संस्थान के निदेशक शैलेंद्र राजन ने बताया कि आईसीआर-केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लखनऊ ने बहुत से फलों के सुंदर भविष्य का आंकलन करते हुए उनकी विविधता को बचाने हेतु कदम उठाए हैं। संस्थान ने बेल की दो किस्मों, CISH-B-1 और CISH-B-2 का विकास किया, जो प्रसंस्करण और अधिक उपज के लिए उपयुक्तता के कारण देश के विभिन्न हिस्सों में लोकप्रिय हो रहे हैं। बेल के ग्राफ्टेड पौधों की मांग बढ़ रही है।
उन्होंने कहा कि संस्थान की नर्सरी काफी कलमी संख्या में पौधों का उत्पादन कर रही है और उनमें से अधिकांश संस्थान में विकसित किस्मों के हैं। संस्थान किसानों को बेल की खेती के विभिन्न पहलुओं की जानकारी भी प्रदान करता है। रोग और कीट नियंत्रण और मूल्य संवर्धन की तकनीक की जानकारी किसान प्राप्त करते हैं। आईसीएआर-सीआईएसयच ने बेल की उन्नत क़िस्मों के मातृ ब्लॉकों को विकसित करने के लिए विभिन्न नर्सरी, केवीके, विश्वविद्यालयों और राज्य बागवानी विभागों को उच्च उपज देने वाली किस्मों की प्रमाणित रोपण सामग्री प्रदान करके किसानों के बीच बेल जैसे फल को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
उन्होंने कहा कि बेलपत्र और फलों के बिना शिव मंदिरों में पूजा की कोई कल्पना नहीं कर सकता है। आमतौर पर बेलपत्र चढ़ाते समय इस बात का ध्यान नहीं रखा जाता है कि बेल का फल कितना बड़ा है और बेलपत्र किस प्रकार के फल देने वाले पेड़ का है। कुछ दशक पहले, छोटे फल वाले बेल के पौधों की भरमार थी, क्योंकि इनका मुख्य उद्देश्य पूजा के लिए बेलपत्र का उपयोग ही था। आज बेल को व्यवसायिक स्तर प्राप्त हो गया है और बेलपत्र के अतिरिक्त फलों के औषधीय महत्व के कारण इसकी खेती के प्रति किसान उत्साहित हैं। बाजार में अच्छा दाम मिल रहा है और धीरे-धीरे फलों की भी मांग भी बढ़ती जा रही है वर्तमान में अच्छे आकार के, अधिक गूदे वाले, कम बीज और श्लेष्मा वाले फलों की अधिक मांग है।
उन्होंने कहा कि ग्राफ्टिंग की तकनीकी के विकसित हो जाने के कारण इसकी अच्छी-अच्छी किस्मों को संरक्षित करने के अतिरिक्त अधिक से अधिक क्षेत्र में लगाना संभव हो सका है। ग्राफ्टिंग के कारण यह सुनिश्चित हो जाता है कि कलमी पौधा अपने मात्र वृक्ष की तरह ही मात्र मातृ भक्त की तरह ही अच्छे गुणवत्ता वाले फल प्रदान करेगा। बीजू पौधों में फल आने के लिए कई वर्षों का इंतजार करना पड़ता था और अधिकतर 8 से 10 साल बाद पता चलता था की फल बहुत छोटे आकार के हैं। फल आने का इंतजार काफी लंबा होता था और इस इंतजार में बेलपत्र के उपयोग के कारण कई पौधे समाप्त होने से बच जाते हैं।
नियमित रूप से बेलपत्र का उपयोग करके लोग पौधों को महत्वपूर्ण बना देते हैं। अब कलमी पौधों में पांच साल में ही फल आने लगता है इसीलिए लोगों ने इसको व्यवसायिक से फसल के रूप में गाना शुरू कर दिया है। पहले बेल के बाग मिलना शायद मुश्किल था लेकिन अब ब्लॉक काफी संख्या में पौधे लगाकर आम अमरूद की तरह ही बाग विकसित कर रहे हैं।







