Viral Issue: उत्तर भारतीय राज्यों में मासूमों की आत्महत्या चिन्ताजनक
कहते हैं कि बचपन और किशोरावस्था ऐसा समय होता है जब इस पर बराबर नजर रखने की जरूरत होती है। ठीक है कि ये बच्चे अधिक दुलारे होते हैं किंतु अधिक दुलार में इनके बिगड़ने का खतरा भी अधिक ही होता है। इनको चूंकि जीवन का अनुभव नहीं होता, इसलिए किसी भी नकारात्मक पहलू का समाधान कर नहीं सकते। संधिकाल में होने के कारण किसी बड़े से पूछने में भी झिझक होती है। नतीजन उल्टे-सीधे कदम उठा लेते हैं और माता-पिता केवल पछताने के अलावा कुछ और नहीं कर सकते।
एक रिपोर्ट बताती है कि कभी दक्षिण भारतीय राज्यों तक सीमित रहे छात्र-छात्राओं के आत्महत्या के मामले अब उत्तर भारतीय राज्यों में भी तेजी से बढ़ रहे हैं। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में तीन वर्षों में छात्रों आत्महत्या के मामलों दोगुना बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। इस मामले में यह देश में आठवें स्थान पर है। यह वास्तव में चिन्ताजनक स्थिति है। खासकर इस तथ्य को देखते हुए कि एक से बढ़कर एक प्रतिभावान बच्चे सामने आ रहे हैं।
और स्थानीय स्तर से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक अपनी काबिलियत का लोहा मनवा रहे हैं। अगर गौर किया जाय तो पता लगता है कि घर के बड़े लोगों द्वारा खुद को अत्यधिक व्यस्त कर लेने का यह नतीजा है। यह व्यस्तता परिस्थितिजन्य भी हो सकती है और स्वयं की पैदा की हुई। स्थिति कुछ यह है कि घर में पति और पत्नी दोनों ही नौकरी कर रहे हैं। धनवान घरों की महिलाओं को किटी पार्टी और सोशल ऐक्टिविटीज से फुरसत नहीं है। ऐसे में घर में बच्चे अपने दिल की बात, अपनी समस्या पर चर्चा किससे करें।
आप उनको दिल बहलाव के कितने भी साधन क्यों न दे दीजिए पर यदि उनकी अपनी बात सुनने वाला कोई न होगा तो धीरे-धीरे वे अवसाद की ओर ही जायेंगे जिसकी चरम परिणति आत्महत्या जैसे कदम ही होती है। इसलिए बच्चों से संवाद स्थापित करना भी बेहद जरूरी है।








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