सिंधिया की राजनीतिक महत्वकांक्षा
मध्यप्रदेश में चल रहे सियासी घमासान के बीच एक बार फिर कांग्रेस का दामन छोड़कर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अब भाजपा का दामन थाम लिया है लेकिन एक बात तो निश्चित है कि जैसे आया है वैसे ही जायेगा यही इस राजघराने के किरदारों की लम्बे समय से ऐसी भूमिका रही है।
मालूम हो कि 19 दिसंबर वर्ष 2018 में उन्हें मप्र का सीएम न बनाए जाने के उत्तर में सिंधिया ने कहा था कि “मेरा पद से मोह नहीं था, न आज है और न आगे जिंदगी में रहेगा। ये जो कुर्सी की दौड़ हम नेताओं में होती है, हमें इसे बदलना होगा। जब ऐसी परीक्षा का वक्त आता है तो मैंने हमेशा यही कोशिश की है कि उचित निर्णय लूं, गरिमा के साथ व्यवहार करूं, मेरे पूज्य पिताजी होते तो ऐसा ही करते।”

भारतीय राजनीति में इस परिवार से जुडी कहानी किस्सो में भारतीय राजनीति के उन दांव-पेंचों की झलक वखूबी देखने को मिलती है जो आज के दौर में सत्ता की कुर्सी हथियाने में होने वाले दंगलों में जोर आजमाइश के तौर पर किये जाते हैं। आंकड़े एवं अनुभवों के आधार पर यही कहा जा सकता हैं कि राजमाता से लेकर ज्योतिरादित्य सिंधिया तक के राजनीतिक सत्ता के गलियारों में इस परिवार की महत्वाकांक्षाओं की आघात पार्टीयों पर पड़ती रही है।
18 वर्षों तक लगातार कांग्रेस से जुड़े रहने के बाद ज्याेतिरादित्य सिंधिया द्वारा सोच-समझ के कांग्रेस से इस्तीेफा देकर 11 मार्च 2020 को भाजपा में शामिल होना सिंधिया परिवार की ‘सत्ता-कहानी’ में एक और नया अध्याय जुड़ कर एक पायदान और आगे चढ़ गया है।
देश के आजादी मिलने के बाद देश के रजवाड़ों के विलय हीने के समय राजमाता के पति जीवाजीराव ने आजाद भारत में सिंधिया परिवार के रुतबे को आसमान की बुलंदियों तक पहुँचाया दिया। उस वक्त देश में केवल कांग्रेस ही एक मात्र पार्टी हुआ करती थी, लेकिन वहीँ पर जीवाजी की दिलचस्पी राजनीति से अधिक अपने विरासत को संभालने में होने के कारण वे राजनीति में नहीं आना चाहते थे, लेकिन उस वक्त के कांग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं की अनेको प्रयासों के बाद उन्होंने अपनी पत्नी राजमाता विजयाराजे सोंधिया को राजनीति में शामिल होने की इजाजत दे दी।

अपनी चार बेटियों एवं एकमात्र बेटे माधवराव सिंधिया के मां विजयाराजे के रूप में सर्व प्रथम वर्ष 1957 में मध्य प्रदेश के गुना से कांग्रेस पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़कर जित हासील करने के बाद वहां की जानता के मध्य उनकी राजमाता वाली छवि पहले से कहीं और अधिक बड़ी हो गयी। इस प्रकार कांग्रेस पार्टी में शामिल होकर सिंधिया परिवार ने भारतीय राजनीति में प्रवेश किया। वहीँ यदि सिंधिया परिवार में राजमाता की राजनीतिक कैरियर की बात की जाये तो वे भारत की विभिन्न राजनितिक पार्टियों में रही हैं। पहली बार उन्होंने ही कांग्रेस से इस्तीफा देकर उसे झटका दिया था।
वर्ष 1980 में संजय गांधी की दोस्ती की खातिर माधवराव सिंधिया ने जनता पार्टी का साथ छोड़ कर अपने मां से राजनीतिक रिश्ते तोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया था। इसके बाद वर्ष 1996 में उन्होंने एक दफे कांग्रेस से बगावत कर झटका अवश्य दिया था, लेकिन वे पुनः कांग्रेस में लौट आए और वर्ष 2001 में दुर्घटना के कारण हुये मौत तक कांग्रेस के साथ ही जुड़े रहे और वर्ष 1984 में अटल बिहारी वाजपेयी को ग्वालियर की सीट से हराकर माधवराव सिंधिया के एक बड़ी जीत हासिल कर लेने से उनका राजनीतिक कद पहले से और भी अधिक ऊंचा हो गया था।
उस वक्त माधवराव सिंधिया और अब पोते ज्योतिरादित्य ने भी ऐसा ही करके अपने परिवार की राजनितिक विरासत को बादस्तूर जारी रखते हुये अपने परिवार के पदचिन्हों पर आगे बढ़ते हुये उन्हें विरासत में मिली राजनीतिक चरित्र के इतिहास को दोहराया है।
- प्रस्तुति: जी के चक्रवर्ती







