सो जाता है फुटपाथ पर अख़बार बिछाकर,
मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाता
देश-दुनिया कोरोना वायरस और मज़दूरों की भूख से लड़ने में लगी है। कोरोना फाइटर मजदूरों की रोटी के इंतज़ाम के लिए भी लड़ रहे हैं,किंतु ये बात शायद ही कोई महसूस कर रहा हो कि मजदूरों की बेबसी से लड़ने वाला श्रमजीवी पत्रकार वर्ग खुद भी मज़दूर वर्ग मे आता है। इसीलिए ही मीडियाकर्मी भी एक मई मज़दूर दिवस को पूरे जोश-ओ-ख़रोश के साथ मनाता रहा है। पत्रकारों द्वारा मजदूर दिवस मनाये जाने की रवायत काफी पुरानी है।
जिसकी वजह यही है कि अखबारकर्मी या मीडियाकर्मी मजदूर वर्ग मे ही आता है। अस्सी प्रतिशत मीडियाकर्मियों का वेतन मजदूरी की मजदूरी के स्केल के लगभग बराबर यानी दस से पच्चीस हजार प्रतिमाह तक है। मीडियाकर्मियों के ड्यूटी आवर्स भी मजदूरों की भांति नौ से ग्यारह घंटे के क़रीब है। मजदूरों की तरह ही मीडियाकर्मी भी असंगठित और असुरक्षित नौकरी पर ही निर्भर हैं।
कोविड 19 के क़हर के बीच मजदूरों की समस्याओं को लेकर देश की सरकारें और नागरिक गण चिंचित हैं। कोई मजदूर भूखा ना रहे इस कोशिश में सरकार युद्ध स्तर पर अपनी जिम्मेदारी निभा रही है।
लॉकडाउन के बाद मजदूरों का काम नहीं छिने। बेरोजगारी की आंधी ना आये। इस आशंका के खतरों को देखते हुए ही प्रधानमंत्री ने कहा था कि कोई किसी को नौकरी से ना निकाले।
इस तमाम बातों के मद्देनजर ही मैंने कुछ लेख लिखे थे। मंदी के दौर में मीडिया की संभावित आशंकाओं पर बिंदुवार चर्चा का वीडियो जारी किया था। श्रमजीवी पत्रकार/मीडियाकर्मीं मजदूर वर्ग मे आता है इसलिए मजदूरों की चिंताओं में इस वर्ग को भी शामिल किया जाये। मीडिया हाउसों में छट्नी के खतरों को गंभीरता से लेते हुए श्रमजीवी पत्रकारों की ट्रेड यूनियन्स/ IFWJ, पत्रकार संगठनों, और पत्रकार नेताओं से आग्रह किया था कि वो कोविड 19 और इससे उत्पन्न वैश्विक मंदी के दौर में मीडियाकर्मीं को किसी हद तक राहत दिलाने के प्रयास के लिए सक्रिय हों। मेरे इस आग्रह के बाद सभी ने सक्रियता दिखाई।
यूपी के श्रम मंत्री ने कोरोना काल में किसी मीडियाकर्मीं को नौकरी से ना निकाले जाने की ताकीद की। सूचना विभाग ने सभी सूचीबद्ध दैनिक अखबारो़ को विज्ञापन जारी कर एक सहारा दिया।
ifwj की तरह से छट्नी के खतरों जैसी गंभीर फिक्र पर पत्र जारी कर दिए गये। लखनऊ के पत्रकार संगठनों ने भी इस कठिन वक्त में मीडियाकर्मियों की रोजी रोटी की जरुरतों के लिए सरकार के समक्ष कुछ मांगे रखीं।
आने वाले वक्त में मीडियाकर्मीं एक मई यानी मजदूर दिवस है। वर्षों से परंपरा है कि तमाम मजदूर वर्ग के साथ इस दिन मीडियाकर्मीं भी आयोजन करते रहे है। जो इस बार लॉकडाउन के होते बिल्कुल भी संभव नहीं है। इसलिए मीडियाकर्मीं/ पत्रकार नेता/ श्रमजीवी पत्रकार ट्रेड यूनियन्स अपने-अपने घरों से ही मीडियाकर्मियों की पेशेवर जरुरतों से जुड़ा वीडियो जारी करें तो बेहतर होगा। बतायें कि इस संकट की घड़ी में कोरोना सेनानी की भूमिका में मीडिया किस तरह से जान पर खेल कर अपने कर्तव्यों का निर्वाहन कर रहा है। वरिष्ठ पत्रकार और पत्रकार संगठन मजदूर दिवस के अवसर पर युवा पत्रकारों को इस कठिन समय में देशहित-समाजहित के लिए पत्रकारिता को राष्ट्रभक्ति के रूप में स्वीकार करने का आह्वान भी कर सकते हैं।
इस अतिरिक्त मई दिवस पर अपने वीडियो संदेश में अपनी पेशेवर समस्याओं और योगदान के जिक्र के साथ वरिष्ठ पत्रकार फील्ड में सक्रिय युवा पत्रकारो़(कोरोना फाइटर) से कोरोना से लड़ाई के लिए सरकारी गाइड लाइन को जन-जन तक पंहुचाने की हिदायत भी दे सकते हैं।
क्योंकि अपनी समस्याओं की मांग के साथ मजदूर (श्रमजीवी पत्रकार) संकट के समय में अपना फर्ज और जिम्मेदारी बखूबी निभाना जानता है।
- नवेद शिकोह







