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    हमें अन्याय को समाप्त करके न्याय की स्थापना करनी है: वीर सावरकर

    By May 28, 2020 Hot issue No Comments7 Mins Read
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    वीर सावरकर ‘विनायक दामोदर सावरकर’ की जयंती 28 मई के अवसर पर विशेष:

    महान क्रांतिकारी तथा प्रचंड ऊर्जा से ओतप्रोत विनायक दामोदर सावरकर का जन्म महाराष्ट्र के नासिक के निकट भगुर में 28 मई, 1883 को हुआ था। वह अपनी प्रारंभिक बाल्यावस्था से ही भारतीय स्वाधीनता संग्राम की ओर आकर्षित हो गए थे। वह छोटे से गाँव से शिवाजी हाई स्कूल में पढ़ने के लिए नासिक आ गए। आगे उन्होंने अपनी पढ़ाई पुणे के फर्ग्युसन कॉलेज में जारी रखी। वह वर्ष 1906 में कानून की पढ़ाई करने के लिए इंग्लैण्ड गए। वह उच्च शिक्षा प्राप्त करके किसी भी स्थिति में ब्रिटिश सरकार की नौकरी करना नहीं चाहते थे। उनका विश्वव्यापी दृष्टिकोण से ओतप्रोत लक्ष्य एकमात्र देश को गुलामी से मुक्त कराना ही नहीं था वरन् वह कानून की बारीकियों को अपना शक्तिशाली हथियार बनाकर अंग्रेजों के मानव जाति के प्रति अन्यायपूर्ण तथा हिंसकपूर्ण शासन से सारे विश्व को परिचित कराना चाहते थे। वीर सावरकरजी ने ‘‘स्वतंत्रता के लिए लड़ों’’ के उद्घोष से तुर्की, रूस, इटली, आयरलैंड, इजिप्त, फ्रान्स आदि सहित विश्व के गुलाम देशों के क्रांतिकारियों में स्वतंत्रता की धधकती ज्वाला प्रज्जवलित की थी।

    क्रांतिकारी सावरकर छत्रपति शिवाजी को अपना आदर्श मानते थे। शिवाजी की तरह उन्होंने अन्यायी शासकों का मुकाबला करने में साम दाम दण्ड तथा भेद का बड़ी चतुराई से समयानुकूल उपयोग किया। सावरकर जी की क्रांति की विचारधारा बड़ी संगठित, व्यापक तथा योजनाबद्ध थी। सावरकर जी का जीवन भागवत गीता के सार ‘‘न्यायार्थ अपने बन्धु को भी दण्ड देना चाहिए’’ से प्रेरित लगता है। सावरकर कहते हैं कि हमें शांति की स्थापना नहीं करनी है, हमें अन्याय को समाप्त करके न्याय की स्थापना करनी है, शांति शब्द न्याय की तुलना में छोटा है। न्याय स्थापित होते ही शांति स्वयं स्थापित हो जाएगी। अशांति का कोई अस्तित्व नहीं होता है, न्याय का अभाव ही अशान्ति है। वह सदैव कहते थे कि कष्ट ही तो वह प्रेरक शक्ति है, जो मनुष्य को कसौटी पर परखती है और जीवन में आगे बढ़ाती है। कहा जाता है कि ईश्वर के पास देर है अंधेर नहीं। एक समय था जब लगभग विश्व के अनेक देशों में अंग्रेजों का राज था। कहा जाता था कि जहां तक अंग्रेजों के राज था उसमें सूर्य अस्त नहीं होता था। वर्तमान में अंग्रेजी शासन एक छोटे से टापू में सिमट गया है।

    file photo

    धरती में वीर सावरकर जैसे बिरले ही ऐसे बहुमुखी प्रतिभा की धनी व्यक्तियों ने जन्म लिया है जो एक ओजस्वी वक्ता, प्रखर लेखक, कुशल संगठनकर्ता, इतिहासकार, मानवीय कवि, दार्शनिक और सामाजिक कार्यकर्ता भी थे। सावरकर जी का बचपन से लेकर मृत्युपर्यन्त जीवन का एक-एक क्षण राष्ट्रभक्ति और साहित्य सेवा को समर्पित रहा। भारत को गुलामी की बेडियां से मुक्ति दिलाना और आजादी के बाद उसे एक अखंड शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में स्थापित करना ही उनका एकमात्र सपना था। वे हाई स्कूल के दौरान बाल गंगाधर तिलक द्वारा शुरू किए गए ‘शिवाजी उत्सव’ और ‘गणेश उत्सव’ आयोजित किया करते थे। बाल गंगाधर तिलक को वीर सावरकर अपना गुरू मानते थे। पुणे में उन्होंने ‘अभिनव भारत सोसाइटी’ का गठन किया और बाद में स्वदेशी आंदोलन का भी हिस्सा बने। कुछ समय बाद वह तिलक के साथ ‘स्वराज दल’ में शामिल हो गए।

    वे मानते थे कि, “भीख में मिली आजादी की सुविधाओं से मनुष्य समाज भ्रष्टाचारी, आलसी और अवसरवादी बन जाता है। किसी लक्ष्य की पवित्रता सबसे उच्चतम ऊंची चीज है। इस प्रिय कविता की लाइनें में उनके अंदर विश्वात्मा के दर्शन होते है – “प्रीति करो, युवक बंधुओं प्रीति करो। मानव को परमात्मा तक ले जाने में प्रीति की परंपरा ही सक्षम है। अपने कुटुम्ब से प्रीति करो, स्वदेश से प्रीति करो, मानव मात्र से प्रीति करो।” इस कविता में भारतीय संस्कृति के आदर्श ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ तथा मानव मात्र की एकता का भाव समाहित है।

    वीर सावरकर एक जन्मजात क्रांतिकारी थे। ब्रिटिश कोर्ट में दो जन्म अंडमान के काला पानी की सजा सुनने के बाद पूरे साहस के साथ जोरदार ठहाके लगाने वाले वीर सावरकर सारे विश्व के क्रांतिकारियों के लिए गुरू समान थे। उस वक्त के लोगों में काला पानी की सजा का नाम सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते थे। वीर सावरकर ने अंडमान की सेल्युलर जेल की दीवारों को देशभक्ति की कविताओं से पाट दिया था। सेल्युलर जेल से लगभग 14 साल के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। वहां पर उन्होंने कील और कोयले से कविताएं लिखीं और उनको याद कर लिया था। दस हजार पंक्तियों की कविता को जेल से छूटने के बाद उन्होंने दोबारा लिखा।

    वीर सावरकर 1857 की पहली जंग ए आजादी विषय पर प्रसिद्ध पुस्तक लिखने वाले एक महान दूरदर्शी लेखक थे। उन्होंने जहां लंदन में भारत की आजादी का बिगुल फूंका वहीं भारत में रहकर भी उन्होंने अंग्रेजों से जमकर लोहा लिया। स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में उनका अद्वितीय स्थान है। वीर सावरकर का जीवन विवादों से घिरा रहा लेकिन सम्मान की कभी चाह या अपमान की कभी परवाह नहीं की। उन्होंने विश्व भर के हिन्दुओं को संगठित करने और हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों को मिटाने का पूरा सफल प्रयास किया। साथ ही वीर सावरकर ने एक सशक्त भारत का सपना देखा और उसे वास्तविकता बनाने के लिए जीवन पर्यंत जुटे रहे।

    वीर सावरकर ने 82 वर्ष की आयु में अपने रोगग्रस्त स्थूल शरीर से मुक्ति पाने के उद्देश्य से 1 फरवरी 1966 को मृत्युपर्यन्त यानि जब तक मौत ना हो जाए तब तक उपवास करने का प्रण लिया। जाहिर है कोई आम इंसान इस निर्णय पर टिका नहीं रह पाता लेकिन एक सिद्ध योगी के सामान सावरकर अपने प्रण पर टिके रहे और 26 फरवरी, 1966 को स्थूल शरीर छोड़कर परलोक सिधार गए। स्थूल शरीर में मनुष्य की शक्ति की एक सीमा है लेकिन स्थूल शरीर छोड़ने के बाद उनकी सूक्ष्म आत्मा धरती में निवास करने वाली शरीरधारी पवित्र आत्माओं को अपना माध्यम बनाकर और भी व्यापक रूप से मानव कल्याण का कार्य जारी रखती है। आत्मा अजर अमर अविनाशी है। सावरकर जी की विश्वात्मा सूक्ष्म रूप से युगों-युगों तक अपने कल्याणकारी विचारों से सारी मानव जाति का सदैव मार्गदर्शन करती रहेंगी।

    अब प्रत्येक देशवासी को वीर सावरकर के बलिदान से प्रेरणा लेकर पक्षपातपूर्ण पांच वीटो पॉवर तथा घातक शस्त्रों की होड़ से सारे विश्व को मुक्त कराना है। वीर सावरकर जैसे अनेक क्रान्तिकारियों ने अपनी कुर्बानियाँ देकर ब्रिटिश शासन की गुलामी से 15 अगस्त 1947 को अपने देश को मुक्त कराया था। आजादी मिलने के बाद उन्होंने कहा था कि अब राष्ट्र का निर्माण बुलेट (गोली) नहीं बैलेट (मतपत्र) से ही अपेक्षित है। भारत के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपने देश की आजादी के लिए एक लम्बी और कठिन यात्रा तय की थी। देश को अन्यायपूर्ण अंग्रेजी साम्राज्य की गुलामी से आजाद कराने में अपने प्राणों की बाजी लगाने वाले लाखों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बलिदान तथा त्याग का मूल्य किसी भी कीमत पर नहीं चुकाया जा सकता।

    देश की आजादी के समय दो विचारधाराओं के बीच लड़ाई थी। एक ओर अंग्रेजों की संस्कृति भारत सहित अनेक देशों पर शासन करके अपनी आमदनी बढ़ाने की थी तो दूसरी ओर भारत के सावरकर जी जैसे विचारशील लोग थे जो विश्व के अनेक देशों पर राज करने वाले अन्यायी अंग्रेजों से मुक्त कराने में जान की बाजी लगाकर संलग्न थे। भारत की आज़ादी के लिए अनेक शूरवीरों ने हँसते-हँसते अपने प्राण त्याग दिये। इन शूरवीरों ने जो आवाज़ उठाई थी, वह महज़ अंग्रेजां के खिलाफ़ नहीं बल्कि सारी मानव जाति के शोषण के विरूद्ध थी। भारत की आजादी से प्रेरणा लेकर 54 देशों ने अपने को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कर लिया।

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