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    Home»ज़रा हटके

    देश में दीपावली लेकिन ट्रम्प का बुरा दौर शुरू हो चुका है…

    ShagunBy ShagunNovember 6, 2026 ज़रा हटके No Comments4 Mins Read
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    It is Diwali in the country, but a difficult phase has begun for Trump...
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    दुनिया में दीपावली शुरू हो चुकी है लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का बुरा दौर अब शुरू हो चुका है। ट्रम्प को पहले से ही डर था, डेमोक्रेट्स ट्रम्प को महाभियोग लगाकर हटाने में देरी नहीं करेंगे। मध्यावधि चुनावों में ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी ने मुँह की खायी है। ट्रम्प इस कदर अलोकप्रिय हो गए कि रिपब्लिकन पार्टी अपने कई गढ़ भी हार गई। अमेरिका में महाभियोग के लिए प्रक्रिया पहले संसद के साधारण बहुमत से शुरू की जाती है। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में सीनेट में कार्यवाही होती है। महाभियोग प्रस्ताव को पास कराने के लिए सीनेट में दो-तिहाई सांसदों का उसके पक्ष में मतदान होना आवश्यक है, तभी यह पास हो सकता है। डेमोक्रेट्स के पास साधारण बहुमत तो है, लेकिन दो-तिहाई बहुमत नहीं है। लेकिन ट्रम्प के लिए असली खतरा उनकी पार्टी के भीतर से ही है। दो दर्जन से ज़्यादा रिपब्लिकन सीनेटर ट्रम्प के खिलाफ खड़े हैं। ट्रम्प इसी से काँप रहे हैं। राष्ट्रपति पद जाते ही एपस्टीन फाइल्स और भ्रष्टाचार के कई मुकदमे खुल जाएंगे। ट्रम्प गुहार लगाते फिर रहे हैं, लेकिन अमेरिकी समाज की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि उनके यहाँ रहम की कोई गुंजाइश नहीं होती।

    The Price of His Whims: Trump’s Defeat and America’s Messageट्रंप के सामने सियासी चुनौती: चुनावी झटका, पार्टी में असंतोष और महाभियोग की अटकलें

    अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के नतीजे राष्ट्रपति की राजनीतिक ताकत का इम्तिहान हैं। लेकिन चुनावी हार को तत्काल सत्ता से बेदखली या महाभियोग का संकेत मानना जल्दबाजी होगी।

    अमेरिका की राजनीति में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए मुश्किलें बढ़ने की चर्चा के बीच एक बात समझना जरूरी है कि वहां राष्ट्रपति की ताकत केवल चुनावी जीत से नहीं, बल्कि संसद में समर्थन और अपनी ही पार्टी के भीतर भरोसे से भी तय होती है। मध्यावधि चुनावों में सत्तारूढ़ दल को नुकसान होता है तो राष्ट्रपति की नीतियों, फैसलों और कार्यशैली पर सवाल तेज हो जाते हैं। विपक्ष को संसद में बढ़त मिलने पर जांच, सुनवाई और राजनीतिक जवाबदेही का दबाव भी बढ़ सकता है।

    चुनावी नतीजों ने बदला सत्ता का समीकरण

    3 नवंबर 2026 को हुए मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट—दोनों में बढ़त हासिल कर ली है। शुरुआती नतीजों के अनुसार रिपब्लिकन पार्टी को कई सीटों का नुकसान हुआ और कुछ परंपरागत रिपब्लिकन क्षेत्रों में भी डेमोक्रेट्स ने जीत दर्ज की। इसे ट्रंप की नीतियों और उनके शासन के प्रति मतदाताओं की नाराजगी के रूप में देखा जा रहा है। अब विपक्ष को संसद में प्रशासन से सवाल पूछने, जांच समितियां गठित करने और सरकारी कामकाज की निगरानी करने की अधिक ताकत मिलेगी।

    यह परिणाम ट्रंप के लिए राजनीतिक रूप से बड़ा झटका जरूर है, लेकिन इसे उनकी राष्ट्रपति पद से तत्काल विदाई नहीं माना जा सकता। अमेरिकी व्यवस्था में मध्यावधि चुनाव राष्ट्रपति का कार्यकाल समाप्त नहीं करते। वे सरकार के सामने राजनीतिक और संसदीय चुनौतियां जरूर खड़ी करते हैं।

    महाभियोग की राह आसान नहीं

    महाभियोग को लेकर भी संवैधानिक प्रक्रिया को समझना जरूरी है। अमेरिका में राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग के आरोप प्रतिनिधि सभा में साधारण बहुमत से पारित होते हैं। इसके बाद सीनेट में मुकदमे जैसी कार्यवाही होती है, जिसकी अध्यक्षता राष्ट्रपति के मामले में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश करते हैं। राष्ट्रपति को दोषी ठहराकर पद से हटाने के लिए सीनेट में मौजूद सदस्यों के दो-तिहाई मत जरूरी हैं। इसलिए डेमोक्रेट्स को दोनों सदनों में बहुमत मिलने के बावजूद महाभियोग के जरिए ट्रंप को हटाने के लिए रिपब्लिकन सदस्यों के समर्थन की भी जरूरत होगी।

    इन परिस्थितियों में यह कहना कि दो दर्जन से अधिक रिपब्लिकन सीनेटर ट्रंप के खिलाफ खड़े हो चुके हैं, उपलब्ध विश्वसनीय जानकारी से पुष्ट नहीं होता। इसी तरह राष्ट्रपति पद छोड़ते ही एपस्टीन फाइल्स या भ्रष्टाचार से जुड़े मामले अपने आप खुल जाएंगे, यह दावा भी सही नहीं है। किसी भी जांच या मुकदमे की दिशा संबंधित एजेंसियों, अदालतों और उपलब्ध साक्ष्यों पर निर्भर करती है।

    ट्रंप के लिए असली चुनौती अब भरोसे की है

    लोकतंत्र में चुनाव केवल सरकार बनाने का माध्यम नहीं, बल्कि सत्ता को उसके कामकाज का हिसाब देने के लिए मजबूर करने का अवसर भी हैं। ट्रंप के सामने अब चुनौती केवल विपक्ष के हमलों का जवाब देने की नहीं, बल्कि अपनी पार्टी के भीतर एकजुटता बनाए रखने और उन मतदाताओं का भरोसा वापस पाने की भी है, जिन्होंने मध्यावधि चुनावों में उनसे दूरी बनाई।

    डेमोक्रेट्स के लिए भी यह जीत जिम्मेदारी लेकर आई है। उन्हें केवल ट्रंप विरोध की राजनीति तक सीमित रहने के बजाय महंगाई, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मुद्दों पर ठोस काम दिखाना होगा।

    अब निष्कर्ष यही है कि ट्रंप का राजनीतिक दौर निश्चित रूप से कठिन हुआ है, लेकिन अमेरिकी लोकतंत्र में किसी राष्ट्रपति का भविष्य केवल चुनावी हार या राजनीतिक नाराजगी से तय नहीं होता। वहां संस्थाओं की स्वतंत्रता, संवैधानिक प्रक्रिया और कानून का पालन ही अंतिम कसौटी हैं। यही व्यवस्था किसी भी ताकतवर राष्ट्रपति को जवाबदेह बनाने की क्षमता रखती है।

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