नाम भी आज़म, मिज़ाज भी आज़म, सिद्धांत भी आज़म
जाफ़र रज़ा साहिल
उत्तर प्रदेश की सियासत में जब भी तानाशाही, राजनीतिक प्रतिशोध और व्यवस्था के हंटर का ज़िक्र होता है, तो जनाब मोहम्मद आजम खान साहब का नाम सबसे पहले ज़ेहन में उभर कर आता है, एक ऐसा जननेता जिसने अपनी मेहनत से रामपुर की बंजर और उपेक्षित सरज़मीन पर तालीम की एक अज़ीम मीनार यानी मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी खड़ी की, लेकिन आज उसी शख़्स को सत्ता और तंत्र की चक्की में बेरहमी से पीसा जा रहा, अगर ये कहूँ कि पीस दिया गया तो गलत नहीं होगा। उत्तर प्रदेश की सियासत में उनके साथ जो सुलूक हो रहा है, उसे देखकर हर उस शख़्स का ज़मीर झंझोर उठता है जो संविधान, इंसाफ और इंसानियत में यक़ीन रखता है। जब एक अस्सी साल के बुज़ुर्ग नेता को एक मामले में राहत या ज़मानत मिलती है, और जेल के गेट से बाहर कदम रखते ही प्रवर्तन निदेशालय यानी ई.डी. द्वारा उन्हें फौरन दोबारा गिरफ़्तार कर लिया जाता है, तो यह कानून का राज कम और किसी सुनियोजित राजनीतिक षड्यंत्र का दृश्य ज़्यादा लगता है। यह सिर्फ एक व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला नहीं है, बल्कि उस हर लोकतांत्रिक आवाज़ का गला घोंटने की कोशिश है जो सत्ता के अहंकार के सामने झुकने से इनकार करती है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही मे ई.डी. की गिरफ़्तारी को चुनौती देने वाली मोहम्मद आज़म खान साहब की याचिका को इलाहाबाद हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया है, लेकिन इस पूरी न्यायिक प्रक्रिया और इससे जुड़े अतीत के पन्नों को पलटकर देखना बेहद डरावना और आंखें खोलने वाला है। वहीं इलाहाबाद हाई कोर्ट, जिसमें डबल पैन कार्ड रखने जैसे मामलों में ज़मानत देने मे महीनों यानी पूरे 11 महीने लगा दिए गए थे, जहाँ कभी एक जज साहब ने खुद को सुनवाई से ही अलग कर लिया था और जब मामला दूसरे जज के पास पहुंचा तो सुनवाई शुरू होने से पहले ही अदालत से उठकर चले जाने जैसी अजीबोग़रीब स्थितियाँ पैदा हुईं, वहाँ न्याय की आस लगाना किसी लम्बी और घुटन भरी सुरंग से गुज़रने जैसा लगता है। अब जब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इस याचिका की सुनवाई हाई कोर्ट में होगी, तो तारीख पर तारीख मिलने का अंतहीन सिलसिला फिर से शुरू हो जाएगा, और इस बीच एक उम्रदराज़ शख़्स को जेल की चारदीवारी में घुट-घुटकर जीने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

यह सब देखकर आम जनता के दिल में यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या कानून सचमुच अंधा हो गया है या फिर उसे जानबूझकर एक आंख से देखने के लिए मजबूर किया जा रहा है? जिस यूनिवर्सिटी ने हजारों-हज़ार गरीब और ज़रूरतमंद बच्चों के भविष्य को संवारा, उस इल्मी इदारे को तबाह करने और उसके बानी को मिटा देने के लिए राज्य की हर एक संस्था ने अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है। आलम यह है कि मुकदमों की फेहरिस्त इतनी लम्बी कर दी गई है कि बकरियों, भैंसों और छोटी-मोटी चीजों की चोरी जैसी अजीबोग़रीब और हास्यास्पद धाराएं भी एक यूनिवर्सिटी के संस्थापक, दस बार के विधायक दो बार के सांसद, पूर्व काबीना मंत्री पर मढ़ दी गईं, जिसे सुनकर दुनिया भर के न्यायविदों और बुद्धिजीवियों को भी अपनी आंखों और कानों पर यकीन नहीं होता। ऐसा लगता है कि व्यवस्था ने यह तय कर लिया है कि आज़म खान को चैन की सांस नहीं लेने दी जाएगी और उनकी हर रिहाई को एक नए मुकदमे के जाल में उलझा दिया जाएगा ताकि वे कभी जेल की सलाखों से बाहर न आ सकें।
दूसरी तरफ, समाज के हर वर्ग (चाहे वह हिंदू हों या मुस्लिम) के दिलों में आज़म साहब की सेहत और उनकी लंबी उम्र के लिए दुआएं उठ रहीं हैं, क्योंकि जनता की अदालत में यह बात साफ तौर पर समझी जा रही है कि यह न्याय नहीं बल्कि शुद्ध रूप से राजनीतिक द्वेष और प्रतिशोध की आग है। जब मजहब और सियासत की दीवारों से परे उठकर आम लोग यह महसूस करने लगते हैं कि किसी के साथ नाइंसाफी की सारी हदें पार हो रही हैं, तो यह लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाता है। न्यायपालिका और देश की तमाम बड़ी संस्थाओं को इस संवेदनशील और गंभीर मोड़ पर गहराई से यह सोचना होगा कि क्या एक राजनीतिक हस्ती को झुकाने के लिए कानूनों का इस हद तक दुरुपयोग जायज़ है? बहुत से राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि
सपा को कमज़ोर करने के उद्देश्य से सत्ता पक्ष आज़म साहब से सिद्धांतों से समझौता करने की कई कवायद कर चुकी पर आज़म तो आज़म ठहरे! ज़ुल्म सहने को तैयार हैं पर सिद्धांतों से कोई समझौता करने को तैयार नहीं।
अगर आज एक कद्दावर नेता के साथ ऐसा सुलूक खुलेआम हो रहा है, तो कल किसी भी साधारण नागरिक के अधिकारों की रक्षा की क्या गारंटी बचेगी? यह आलेख सिर्फ आजम खान की दास्तां नहीं है, बल्कि यह इस व्यवस्था के माथे पर एक ऐसा सवालिया निशान है जिसका जवाब इतिहास और आने वाली पीढ़ियां जरूर मांगेंगी, क्योंकि जब-जब जुल्म और राजनीतिक बदले की भावना इंसाफ की कुर्सी पर हावी होगी, तब-तब इंसानियत और लोकतंत्र का विवेक झकझोरे बिना नहीं रहेगा।







