जातिगत राजनीति सपा-बसपा व कांग्रेस को आने वाले चुनाव में पड़ सकता है भारी
उपेंद्र नाथ राय
उत्तर प्रदेश में अभी से सभी दल आने वाले विधान सभा चुनाव की तैयारियों में जुट गये हैं।। इस चुनावी बिसात में सपा और बसपा तो पहले से ही जातिगत समीकरणों को बनाने-बिगाड़ने में लगी रहती है लेकिन इस बार प्रदेश में राजनीतिक रूप से बीमार चल रही कांग्रेस भी ब्राह्मण वोटों को अपने पाले में खींचने की जुगत लगा रही है।
परशुराम की मूर्ति लगाने से छिड़ा राजनीतिक द्वंद बढ़ता जा रहा है। यह परशुराम पर चल रही राजनीति सिर्फ ब्राह्मणों तक सीमित नहीं है इसमें भूमिहार भी शामिल हैं। ये संख्या में कम होते हुए भी सैकड़ा भर से अधिक विधानसभाओं में हराने-जीताने का माद्दा रखते हैं।
बसपा का ब्राह्मण कार्ड को कुंद करने की तैयारी:
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यह दांव अखिलेश यादव के लिए तो महंगा पड़ सकता है, क्योंकि अब तक का इतिहास रहा है कि सपा यादव-मुस्लिम गठजोड़ लेकर चलती है। ब्राह्मणों और भूमिहारों को अपने पाले में करने का उनका मकसद बोनस के रूप में यादव-मुस्लिम के साथ ही इन्हें जोड़कर चलने का था। दूसरा यह कि इससे मायावती का ब्राह्मण कार्ड की धार को कुंद किया जा सके, लेकिन यह धार उल्टा पड़ सकती है। इसका कारण है कि ब्राह्मण उनकी पुरानी कार्य शैली को भूले नहीं हैं। ऊपर से ब्राह्मणों और भूमिहारों को लुभाने के चक्कर में उनके मुस्लिम मतदाताओं के बिदकने का भी खतरा मंडराने लगा है।
सौ से अधिक सीटों पर दबदबा है भूमिहारों का:
यह बता दें कि पूर्वांचल के भूमिहार और पश्चिम के त्यागी राजनीतिक पृष्ठभूमि में काफी दबदबा रखते हैं। इनकी उप जाति भू-ब्राह्मण ही लिखी जाती है। ये लोग भी परशुराम को ही अपना कुल गुरु मानते हैं और बढ़-चढ़कर उनकी जयंती मनाते हैं। ऐसे में अखिलेश यादव ने परशुराम की प्रतिमा लगाने की घोषणा कर एक तीर से दो निशाना साधने की कोशिश की।
किसी देवता को जातिगत आधार देना तुच्छ राजनीति का परिचायक:
इस संबंध में राजनीति विश्लेषक राजीव रंजन सिंह का कहना है कि किसी भी धर्म के देवता को किसी जाति से जोड़कर देखना तुच्छ राजनीति का परिचायक है। ऐसी राजनीति कभी काम नहीं आ सकती। हालांकि अखिलेश यादव ने इसे भुनाने की कोशिश की है लेकिन इसमें कामयाबी हाथ लगना मुश्किल काम है। उनको अपना बेस वोट बैंक को ही दुरूस्त करने पर ध्यान देना ज्यादा बेहतर होगा।
एक से दो जाति को साधने की कोशिश, मगर नहीं होंगे कामयाब:
इस संबंध में वरिष्ठ पत्रकार संतोष कुमार का कहना है कि भूमिहार अयाचक ब्राह्मण होने के कारण शुरू से ही परशुराम की पूजा सर्वाधिक करता है, जबकि ब्राह्मण याचक होने के कारण दूसरे नाराज न हो जाय, इस कारण उसकी अपेक्षा कम जयंती मनाने पर जोर देता है। इस राजनीति में सर्वाधिक प्रभावित करने की कोशिश भूमिहारों को है लेकिन ऐसी राजनीति सफल होने की संभावना कम रहती है। वहीं वरिष्ठ पत्रकार रविशंकर तिवारी का कहना है कि इससे एक साथ दोनों को साधने की कोशिश है। इसमें कितनी सफलता हाथ लगेगी, यह तो आने वाला भविष्य ही बताएगा।
पिछले विधानसभा चुनाव में धाराशायी हो गया था विपक्ष:
यदि 2017 के विधान सभा चुनावों पर नजर दौड़ाएं तो सपा और कांग्रेस का गठबंधन होने के बावजूद सपा ने 47 सीटें जीती, जबकि कांग्रेस को हाथ मात्र सात सीटें लगी। वहीं बसपा को सिर्फ 19 सीट मिलीं। भाजपा ने लंबी छलांग लगाते हुए 311 सीटें हासिल कर ली और सहयोगी अपना दल ने नौ सीटें, जबकि सुहेलदेव ने चार सीटें जीतीं।
विश्लेषकों का मानना था कि दलित वर्ग में भी सिर्फ एक बिरादरी को छोड़कर सब भाजपा के खाते में चला गया। बीएसपी की सीटें कम होते हुए भी सपा से वोट प्रतिशत ज्यादा था। बीजेपी जहां 40.6 प्रतिशत वोट पाई थी, वहीं बीएसपी दूसरे नम्बर पर 22.3 प्रतिशत वोट पाई थी। सपा को 21.7 प्रतिशत वोट मिले थे। वहीं कांग्रेस को मात्र छह प्रतिशत वोट ही मिले थे।







