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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    फेसबुक, कवि और कविता

    ShagunBy ShagunDecember 15, 2020 Current Issues 1 Comment4 Mins Read
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    Post Views: 677

    व्यंग्य: अंशुमाली रस्तोगी

    उस रोज फेसबुक के इनबॉक्स में एक लिंक मिला। एक कवि मित्र द्वारा भेजा गया था। आग्रह था कि लिंक को खोलकर कविताएं पढ़ी जाएं और प्रतिक्रिया ‘अवश्य’ दी जाए। ‘अवश्य’ के टर्म ने मुझे थोड़ा असहज-सा कर दिया। अमूमन मैं कविताएं नहीं पढ़ता। या कहूं, मुझसे पढ़ी ही नहीं जातीं। कविताओं के मामले में मेरा ज्ञान ‘शून्य’ है। कवियों से मैं निश्चित दूरी बनाकर रखता हूं। जहां कविता होती है, वहां जाने से बचता हूं। खुद को कविता का रोग नहीं लगाना चाहता।

    फिर भी, हिम्मत जुटाकर कविताएं पढ़ीं। पसंद न आने पर कवि मित्र को लिख दिया- ‘इन पर अभी और मेहनत की दरकार है। कमजोर हैं सभी।’ मेरा स्पष्ट कहना मित्र को गवारा न गुजरा तो प्रतिउत्तर में उसने कह दिया कि ‘मुझे कविताओं की धेले भर अक्ल नहीं। अतः अपना ज्ञान अपने पास रखें। एक ऊंचे कवि ने इन्हीं कविताओं को श्रेष्ठ बताया था।’

    कवि मित्र के कहे का मैंने कतई बुरा नहीं माना। यह पहला वाकया नहीं था, अक्सर मुझे कोई भी इनबॉक्स में आकर गरिया जाता है। अब मैं भी कब तक और किस-किस से लड़ता फिरूंगा। बहरहाल, बात आई-गई हो गई। मित्र आज भी फेसबुक पर दबाकर कविताएं खींच रहे हैं।

    लेकिन फेसबुक पर कविताओं की हालत बहुत पतली है। कविताएं थोक के भाव में लिखी जा रही हैं। हर लिखने वाला खुद को शमशेर और मुक्तिबोध से कम दर्जे का कवि नहीं समझता। कवि अपनी कविताएं फेसबुक पर तो सजाता ही है, साथ में इनबॉक्स भी कर देता है ताकि कमेंट तुरंत मिले। मेरे पास भी अक्सर कविताओं के लिंक आते रहते हैं। पर ज्यादातर से बचकर निकल जाता हूं। कविताएं पढ़ना धैर्य का कार्य है और यह मेरे कने नहीं। फेसबुक ने कविताओं को बेहद आसान बना दिया है। यहां कोई भी कैसी भी कविता लिख खुद को कवि कहलवा सकता है।

    सुना है, कोरोना काल में सबसे अधिक कविताएं फेसबुक पर ही खींची गईं। जाने कितने ही ‘लाइव’ आयोजन हुए। मजदूरों पर कविताओं की बाढ़-सी आ गई। कोरोना पर कवियों के कविता संग्रह भी खूब आए। मैं इस बात पर हैरान हूं कि इतने कठिन समय में कवियों ने कविताएं लिख कैसे लीं? जब हर तरफ मौत और बेबसी का मंजर हो, सरकार निस्तेज पड़ी हो, समूचा विश्व भयंकर बीमारी से जूझ रहा हो मगर कवि कविताएं लिखने में व्यस्त था। लाइव आ-आकर कविताएं सुना रहा था। कवियों को देखकर पहली बार मुझे लगा कि इनकी जनपक्षधरता मिट्टी में मिल चुकी है। इनके पास कोई सामाजिक चिंता ही नहीं बची है। जो है वो बस अपनी कविताएं हैं। वाह-वाह और बधाई है। साथ में एक जिद भी है कि हमारी कविताएं पढ़ो।

    कभी-कभी सोचता हूं, अच्छा हुआ जो मैं कवि न हुआ। वैसे व्यंग्यकार होकर भी मैंने कौन-से झंडे गाड़ लिए हैं। अगर कवि हो जाता तो रात-दिन अपनी उलटी-सीधी और बकवास कविताएं फेसबुक पर डालकर आत्ममुग्ध होता रहता। वैसे, इन दिनों कविता और व्यंग्य दोनों का हाल एक समान है। जैसे हर गली में कवि मिलने लगा है, वैसे ही व्यंग्यकार भी। दोनों जमकर अपने-अपने संकलन ला रहे हैं। प्रकाशक भी मस्त होकर छाप रहे हैं।
    अपने निजी अनुभव के आधार पर कह रहा हूं, कवि बड़ा ‘आत्ममुग्ध’ प्राणी है। बल्कि फेसबुक ने उसे और ज्यादा आत्ममुग्ध बना दिया है। जिन्हें कविता का ‘ककहरा’ तक नहीं आता, आज वे भी फेसबुक पर बड़े कवि बने हुए हैं। उनकी विकट ‘फ्रेंड फॉलोइंग’ है। जगह-जगह वे ‘कोट’ किए जाते हैं। कितने ही कविता संग्रह उनके आ चुके हैं। उनके सामने तो मुक्तिबोध की कविताएं भी कुछ नहीं! ऐसा उनका मानना है। उन्हें तो रात में सपने भी कविताओं के ही आते हैं। कविता के प्रति प्रतिबद्ध हैं।

    कहना न होगा, आज के दौर का हर कवि महान है। वक़्त उस पर मेहरबान है। वो सिर्फ अपनी कहता है दूसरे की नहीं सुनता। कविता से इतर खुद को रखना व परखना नहीं चाहता। उसे बस तारीफों की दरकार है। आधुनिकता का बोध उसमें कूट-कूटकर भरा है। वो फेसबुक का ‘डिजिटल कवि’ है। कविता कितनी बदल चुकी है न।

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    1 Comment

    1. Carina Pacifico on December 16, 2020 12:18 pm

      flawless post

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