अंशुमाली रस्तोगी
गधों का कोई मजाक उड़ाए, यह मुझे पसंद नहीं। गधे मेरी जिंदगी में अहम मुकाम रखते हैं। उन्हीं से मैंने नौकरी, घर-परिवार व समाज का बोझ ढोना सीखा है। एक वे ही हैं जो मुझे निरंतर ‘इंसपायर’ करते रहते हैं, संघर्ष करने के लिए। मैं आज जो कुछ भी लिख पा रहा हूं, यह सिर्फ गधों की वजह से ही है। अगर गधे मेरी जिंदगी में न आते तो आज मैं स्वयं गधा होता। वैसे, मैंने खुद को गधा मनाने से कभी इंकार नहीं किया।
गधे का रोल हर जगह है। गाली देने में। लताड़ने में। बोझा ढोने में। प्रेरणा लेने में। ज्ञान देने व लेने में। अभी कहीं पढ़ा कि ‘गधे की लीद’ से मसाले भी बनाए जा रहे हैं। मुझे यह पढ़कर अत्यंत खुशी मिली। यकीन मानिए, ऐसा अजूबा सिर्फ भारत में ही घट सकता है। जब यहां गो-मूत्र से कोरोना की दवा बनाने का दावा किया जा सकता है। जब भाभी जी पापड़ खाकर कोरोना को भगाया जा सकता है। जब यहां गणेश जी मूर्ति दूध पी सकती है। जब यहां सड़क किनारे कहीं भी मंदिर स्थापित किया जा सकता है। तो, गधे की लीद से मसाले क्यों नहीं बनाए जा सकते। बिल्कुल बनाए जा सकते हैं।
मेरा दावा है, गधे की लीद से तैयार मसाले अन्य मसालों से उन्नीस नहीं बैठेंगे। सोचिए जरा, जब आपकी दाल या सब्जी में ये मसाले पड़ेंगे तो आपको कितनी ‘पवित्रता’ का अहसास होगा। उन मसालों को खाकर आपका जीवन संवर जाएगा। मत भूलिए, हमारे देश में हर पशु की बराबर इज्जत है। चाहे गाय हो या बंदर या गधा-घोड़ा सबको यहां प्यार-दुलार मिलता है।
मैं हैरान हूं, कुछ लोग गधे की लीद से तैयार मसालों की आलोचना कर रहे हैं। दरअसल, वे नादान लोग हैं। उन्हें न गधे की महानता के बारे में कुछ पता है न लीद के बारे में। बस आलोचना करने से मतलब। ऐसे ही पिछड़े लोग तो भारत को ‘विश्व गुरु’ नहीं बनने दे रहे। ऐसे ही कमअक्ल लोग भारत के विकास में बाधक हैं। ऐसे ही राष्ट्र-विरोधी लोग तो किसानों को भड़का रहे हैं। उधर मोदी जी भारत को ‘न्यू इंडिया’ व ‘डिजिटल इंडिया’ बनाने में 18-18 घण्टे खर्च कर दे रहे हैं। और इधर मुट्ठीभर लोग भारत को पीछे ले जाने पर उतारू हैं।
सौभाग्य है आपका जो यहां गधे की लीद से मसाले बनाने वाले वैज्ञानिक मौजूद हैं। ये न होते तो भारत का वो नाम नहीं होता जो आज है। गांठ बांध लें मेरी बात- जितना मिलावटी खाएंगे उतना ही स्वस्थ रहेंगे। मिलावट को भोजन का आधार बना लीजिए। शरीर भी अब शुद्ध चीजों व भोजन से परहेज करने लगा है।
गधे की लीद से तैयार मसाले अगर कामयाब हो जाते हैं तो अपने मुल्क का कितना नाम होगा। यह भी हमारे वास्ते किसी ‘उपलब्धि’ से कम नहीं होगा। हो सकता है, कल को हमें इस विधि का पेटेंट करवाना पड़े। कुछ नहीं कह सकते, कब कौन-सी चीज रातों-रात हिट हो जाए। मैं तो उस बंदे का हाथ चूमना लेना चाहता हूं, जिसने इस विधि का ईजाद किया। कितना-कितना टेलेंट भरा पड़ा है इस देश में। यों ही मेरा देश महान नहीं है। जब इस देश की धरती सोना उगल सकती है तो गधे के गोबर से मसाले क्यों नहीं तैयार हो सकते!
ज्यादा नहीं थोड़ा-बहुत ही सही गधे भी भारतीय अर्थव्यवस्था में जोर लगते रहे हैं। वे केवल अपने लिए ही बोझा नहीं ढोते, देश के लिए भी ढोते हैं। उनकी सहनशीलता और सहनशक्ति का जवाब नहीं। वे किसी के लिए भी प्रेरणा बन सकते हैं। मेरे लिए तो वे साक्षात प्रेरणा ही हैं। गधे अगर कोई रोल नहीं निभा रहे होते तो किशन चन्दर को ‘एक गधे की आत्मकथा’ नहीं लिखनी पड़ती। उस आत्मकथा में मैं अत्यंत प्रभावित हूं।
मैं पुनः कह रहा हूं, गधों के बारे में अपनी सोच व विचार बदलिए। उन्हें अपनाइए। अपने जीवन में जगह दीजिए। उनसे सीखिए। आज अगर गधे की लीद से मसाले बने हैं, हो सकता है, कल को दवा भी बन जाए। क्योंकि गधे हैं सदा के लिए।







