अंशुमाली रस्तोगी, चिकोटी ब्लॉग से
सोशल मीडिया के खेल निराले हैं। यहां अक्सर कुछ न कुछ ‘हास्यास्पद’ चलता ही रहता है। यह भी दो धड़ों में विभक्त हो गया है। एक धड़े में ‘ट्विटरजीवी हैं तो दूसरे धड़े में ‘कूजीवी’। सत्ता के साथ तालमेल बैठाई सहमत आवाजें धीरे-धीरे ‘कू’ पर अपना अड्डा जमा रही हैं। मगर असहमत आवाजें अब भी ट्विटर पर बनी हुई हैं। भिन्न-भिन्न मुद्दों पर सरकार को जब-तब घेरती रहती हैं। सरकार भी ट्विटर से उसके ‘एकतरफा स्टैंड’ पर सवाल-जवाब कर रही है। रस्साकशी फिलहाल बनी हुई है।
सोशल मीडिया दरअसल एक अखाड़ा है। यहां हर वक़्त किसी न किसी मुद्दे पर जंग छिड़ी ही रहती है। कमाल बात यह है कि यहां कोई किसी को सुनना नहीं चाहता, सब अपनी-अपनी कहना चाहते हैं। जरा-सी आलोचना से बने-बनाए रिश्ते बिगड़ जाते हैं। असहमति का यहां कोई मोल नहीं। असहमत आवाजों को यहां तुरंत ‘वामपंथी’ करार दिया जाता है। विचार क्या होता है यह सोशल मीडिया के वीर नहीं जानते। सबके हाथों में मोबाइल हैं और मोबाइल पर सबकी अपनी-अपनी ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटीयां’ खुली हुई हैं। सारा ज्ञान जब वहां से आ रहा है फिर कोई किताबों और तर्क का सहारा क्यों ले।
‘ट्विटर’ के जवाब में नया हथियार ‘कू’ खड़ा किया गया है। जिसे देखो वो ‘कूजीवी’ बनने को बेकरार हुआ जा रहा है। कितने ही ट्विटरजीवियों ने अपने कूजीवी बनने की घोषणा कर दी है। हालांकि मैं अभी उस दुनिया में गया नहीं हूं पर लोग बताते हैं कि वहां ‘तू मेरी, मैं तेरी पीठ खुजाऊं’ टाइप विचारधारा का बड़ा बोलवाला है। यथास्थितिवादियों की बड़ी जमात वहां मौजूद है।
अब किसको क्या कहिएगा सबके अपने खेल निराले हैं। जिसकी गोटी जहां फिट हो जाए उसी की जय-जय है।
देख रहा हूं इन दिनों ‘जीवी’ टाइप लोग बहुत जोर मार रहे हैं। कहीं बुद्धिजीवी की चर्चा है तो कहीं आंदोलनजीवी की। कुछ अतीतजीवी अपने अतीत में डूबे रहकर ही खुश हैं। दूसरी तरफ व्यंग्यकारजीवी हैं, जो व्यंग्य न लिखकर सबकुछ लिख रहे हैं। राजनीतिक व्यंग्य परिदृश्य से गायब हो चुके हैं। बाजार के असर ने व्यंग्य और व्यंग्यकार को ‘बाजारूजीवी’ बना दिया है। तो, फेसबुकजीवी कविता का कचूमर निकलने में तुले हैं।
जिधर नजर उठाकर देखता हूं ड्रामा ही ड्रामा नजर आता है। महीनों से आंदोलनरत किसानों को ‘आंदोलनजीवी’ होने का तमगा दे दिया गया है। किसानों के मुद्दे पर ट्विटरजीवियों और कूजीवियों में जमकर बहस चल रही है। बहस में तर्क कम कुतर्क अधिक नजर आ रहे हैं। बीच में किसी को टोकने का सवाल ही पैदा नहीं होता। क्योंकि सोशल मीडिया पर टोका-टाकी ‘गुनाह’ की श्रेणी में आती है। इसीलिए मैं सबकुछ अपनी आंखों के समक्ष घटते हुए देख रहा हूं। न किसी से तर्क कर रहा हूं न कुतर्क। फिलहाल, ‘मूकजीवी’ बना हुआ हूं।
ट्विटरजीवियों और कूजीवियों के बीच यह तनातनी अभी थमने वाली नहीं। यह जारी रहेगी। सरकारें आएंगी-जाएंगी मगर जो दीवार एक बार खींच गई है, इसका टूट पाना फिलहाल मुश्किल लग रहा है। मुझ जैसा दलविहीनजीवी इस पसोपेश में है कि कहां जाए। कूजीवी मैं हो नहीं सकता, सोच रहा हूं कि ट्विटरजीवी ही बना रहूं। लेकिन अपने तर्क अपने तरकश में ही रखूंगा। इन्हें बाहर निकलना फिजूल है। सोशल मीडिया पर तर्क और तर्कशील व्यक्ति की कोई ‘औकात’ नहीं।







