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    कानून नहीं, जागरूकता से ही दूर होगा बालश्रम का कलंक

    ShagunBy ShagunJune 12, 2022Updated:June 12, 2022 Hot issue No Comments6 Mins Read
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    (विश्व बालश्रम निषेध दिवस 12 जून पर विशेष)

    स्वाती सिंह

    अभी कुछ दिन पहले स्वाती फांउडेशन के एक जागरूकता कार्यक्रम में प्रयागराज गयी थी। वहां से लौटते वक्त कुंडा (प्रतापगढ़) के पास सड़क किनारे एक बच्चे पर नजर पड़ी। उसके हाथ में जूता पालिस व ब्रश था। बरबस ही हमें गाड़ी रोकवानी पड़ी। मेरा ममत्व कांपने लगा। मैं, उसकी ओर खिंचती चली गयी। आखिर बचपन जो बर्बाद होता दिख रहा था। ऐसे में दिल का धड़कना, भारत के भविष्य की सोच किसी भी जागरूक के दिल को ठेस पहुंचा सकता है। वैसा ही मेरे साथ भी हुआ। मैं बच्चे से पूछी, तुम्हारे पिता जी क्या करते हैं, उसका जवाब था। वे पंचर की दुकान खोले हुए हैं। उसी में टायर-ट्यूब व साइकिल के सामान भी बेचते हैं। मैं, बिना अपना परिचय बताए, ड्राइवर को बोली जरा बच्चे के पिता के पास चलो। पिता के पास जाने पर पता चला कि उनकी आमदनी 20 से 25 हजार रुपये प्रतिमाह तक हो जाती है। इसके बावजूद वे बच्चे को स्कूल नहीं भेजते।

    औपचारिकता के तौर पर स्कूल में प्रवेश करा दिया है, लेकिन वह बच्चा पढ़ाई से ज्यादा समय जूता पालिश करने में लगाता है। मैं पूछी, भइया आप बच्चे को शिक्षा क्यों नहीं देते। उनका जवाब था, बहन शुरू से ही काम की आदत बनी रहेगी तो वह कभी भूखा नहीं रह सकता। पढ़ाई से क्या होगा। पढा़ई तो सिर्फ इसलिए कराता हूं कि शादी-ब्याह में लोग पूछते हैं, बच्चा, पढ़ाई किया है या नहीं। यह देख मैं आश्चर्य में पड़ गयी और पढ़ाई के तमाम फायदे बताकर लखनऊ आ गयी। उसके बाद वह हर दिन स्कूल भेजने व बच्चे को उच्च शिक्षा देने को राजी हो गया।

    यह हकीकत सिर्फ मैं नहीं देखी या पहली बार नहीं देखने को मिला। इस तरह की स्थितियां आम तौर पर देखने को मिल जाती हैं। लोग शिक्षा को सिर्फ औपचारिकता मानते हैं। बच्चों का बालपन जाने-अनजाने में खत्म कर देते हैं। कानून की भी एक सीमा है। वह वहीं मसोस कर अपने दायरे में सिमट कर रह जाती है।

    यह हकीकत बताने का मतलब है कि हम तमाम योजनाएं लाकर, कानून बदलकर बालश्रम को दूर करने में सफल नहीं हो सकते, जब तक हम संस्कृति में बदलाव लाने, लोगों की सोच बदलने का प्रयास नहीं करेंगे। याद करिए, जब दूरदर्शी सोच रखने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुद झाड़ू उठाकर स्वच्छता अभियान की शुरूआत की तो कुछ लोग आश्चर्य भरी निगाह से देख रहे थे, तो कुछ विरोधियों का उनके अभियान में सहज लोकप्रियता का तरीका दिख रहा था। धीरे-धीरे ही सही आज हर व्यक्ति दुकान या रेहणी पर कुछ भी खाने के बाद दोना फेंकने के लिए डस्टबिन की तलाश करता है। सड़क पर गंदगी फेंकने से बचता है। इसके लिए किसी एक व्यक्ति से कहा नहीं गया, सिर्फ जागरूक किया गया। प्रधानमंत्री ने कार्य संस्कृति बदलने की कोशिश की। लोगों को उनके कर्तव्य की याद दिलाई और आज उसकी सफलता सबके सामने है।

    वही स्थिति प्रदेश में कार्य संस्कृति को बदलने, धर्म रक्षा के लिए आगे बढ़कर चलने वाली संत परंपरा के महान संत योगी आदित्यनाथ ने स्कूल चलो अभियान को एक उत्सव के रूप में पूरे प्रदेश में मनाने की परंपरा की शुरूआत की। यह कार्य संस्कृति बदलने में मिल के पत्थर साबित हो रही है। समाज में इससे शनै-शनै ही सही लोगों की मानसिकता में बदलाव हो रहा है। इससे बालश्रम के उन्मुलन में भी सहायता मिल रही है और घरेलू कार्य संस्कृति में बदलाव के साथ ही अभिभावक बच्चों को उच्च शिक्षा देने के लिए जागरूक हो रहे हैं। आगे और जागरूकता बढ़ेगी।

    यदि बालश्रमिकों की स्थिति देखें तो सबसे अधिक बालश्रमिक अफ्रीका में 7.21 करोड़ हैं। वहीं भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में पांच से 14 साल तक के 25.96 करोड़ बच्चों में से 1.01 करोड़ बच्चे बाल श्रमिक थे और करीब 43 लाख बच्चे बाल मजदूरी करते हुए पाये गये थे। यूनिसेफ के अनुसार यह आंकड़ा दुनिया के बाल मजदूरों का 12 प्रतिशत है।

    सबसे आश्चर्य की बात है कि अमेरिका जैसे विकसित राष्ट्र में भी एक करोड़ बच्चे मजदूरी करते हैं। इससे यह प्रमाणित होता है कि बाल श्रम कानून का डर दिखाकर दूर नहीं किया जा सकता या उच्च लेबल से कम नहीं हो सकता। इसके लिए जागरूकता लाने की आवश्यकता है। जैसे कि दहेज प्रथा को दूर करने के लिए तमाम कानून बने हैं, लेकिन आज भी वह चल रहा है। कानून उसे रोक नहीं सका।

    वैसे ही बालश्रम को रोकने के लिए हमारे संविधान में चार अनुच्छेद में प्राविधान किये गये हैं। अनुच्छेद 15 (3) के तहत बच्चों के लिए अलग से कानून बनाने का अधिकार है।

    वहीं अनुच्छेद 21 में 6 से 14 साल के बच्चों के लिए निशुल्क व अनिवार्य शिक्षा का प्राविधान किया गया है, वहीं अनुच्छेद 23 बच्चों के खरीद-बिक्री पर रोक लगाती है। वहीं अनुच्छेद-24 14 साल के बच्चों को जोखिम भरे काम करने पर प्रतिबंध लगाती है।

    इस तरह के तमाम धारा व अनुच्छेद के बावजूद बालश्रम को रोका नहीं जा सका। इसका कारण है कि पूर्व की सरकारों में कर्तव्यबोध नहीं रहा। सिर्फ कानून बनाकर अपनी औपचारिकता पूरी करते रहे। उनमें कभी देश की तरक्की का ख्याल नहीं आया। वे सिर्फ राज करने के लिए तत्कालिक लुभावने काम करते रहे। लंबे समय की योजना, देशहित में मानसिकता बदलने की सोच कभी उनमें देखने को मिली ही नहीं। यह तो पहली बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समझा कि लोगों को उनके कर्तव्य का बोध कराओ। भारत का हर व्यक्ति हर तरह का काम करने में सक्षम है। विशेषकर बच्चों के प्रति किस मां-बाप का मोह नहीं होगा। कौन मां-बाप नहीं चाहेगा कि हमारा बच्चा उच्च पदों तक जाए।

    आगे बढ़ते भारत में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाए। उसका बालपन उससे दूर न हो जाए और वह अपनी जिंदगी अपने अनुसार जीते हुए समाज कल्याण के लिए काम करे। इस सोच को समझते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आगे बढ़ रहे हैं। देश के हर नागरिक को उसका कर्तव्यबोध करा रहे हैं। अभी तक बहुत कुछ हासिल हो चुका है। जो शेष बचा है, उसमें आगे सफलता निश्चित है। इस बात को जनता भी समझ रही है। विरोधियों की तड़फड़ाहट इसी बात को लेकर है कि जनता समझ चुकी है। अब उसे छला नहीं जा सकता। वे क्षणिक लोभ में नहीं आने वाले। आमजन अब अपने उज्ज्वल भविष्य को देख रहे हैं।
    (लेखक- भाजपा की वरिष्ठ नेता व पूर्व मंत्री है।)

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