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    Home»धर्म

    विजयादशमी: भारत में शौर्य का महापर्व

    By September 29, 2017 धर्म No Comments8 Mins Read
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    पूनम नेगी

    शक्ति सदैव सत्य व मर्यादा का ही वरण करती है; भले ही प्रतिपक्ष कितना ही सुदृढ व शक्ति सम्पन्न क्यों न हो, विजयदशमी का महापर्व भारतीय संस्कृति के इसी दिव्य आध्यात्मिक जीवन मूल्य का बोध कराता है। त्रेतायुग में रावण के राज्य में जब असत्य व्यापक रूप में प्रचारित हो रहा था, दानवता पनप रही थी और मानवता त्राहि-त्राहि कर रही थी। तब व्याकुल मानवता की पुकार पर श्रीराम ने मनुज अवतार लेकर उस आसुरी प्रवृत्ति के आतंक से मुक्ति का संकल्प लिया-” निसिचरहीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।।” उनकी इस विजय यात्रा की पूर्णता का ही नाम है विजयादशमी।

    जीवन संग्राम में श्रीराम की तरह धर्मपरायण व साहसी ही अपने पांव बढ़ा पाते हैं। जिनमें जिन्दगी की चुनौतियों का सामना करने की हिम्मत होती है वही अनीति, अनाचार, अत्याचार और आतंक से लोहा ले पाते हैं और विजयदशमी का रहस्य भी उन्हीं की अन्तर्चेतना में उजागर होता है। आश्विन नवरात्र की साधना की पूर्णाहुति के इस उत्सव का तत्वदर्शन यह है कि नवरात्र के विशिष्ट साधनाकाल में जो भगवती आदिशक्ति की उपासना कर अपनी आत्मशक्ति को जागृत कर इन्द्रियों का नियंत्रण करने में समर्थ होता है; शौर्य का यह महापर्व उनके अस्तित्त्व को आनन्दातिरेक से भर देता है। विजय के साथ संयोजित धर्म के दशम गुण (अहिंसा, क्षमा, सत्य, नम्रता, श्रद्धा, इन्द्रिय संयम, दान, यज्ञ, तप तथा ध्यान) उसकी आत्मचेतना में प्रकाशित होते हैं। शौर्य पर्व के ये सांकेतिक रहस्य वाकई अद्भुत हैं। मर्यादा पुस्र्षोत्तम की जीव चेतना में धर्म के उपरोक्त दसों लक्षण की अपनी सम्पूर्ण आभा के साथ विकसित हुए थे; तभी वह आतंक एवं अत्याचार के स्रोत दशकण्ठ रावण को मृत्युदण्ड देने में समर्थ हुए।  प्रभु श्रीराम की धर्मसाधना में एक ओर तप की प्रखरता थी तो दूसरी ओर हृदय में संवेदना की सजलता। इस पूर्णता का ही प्रभाव था कि जब उन्होंने धर्म युद्ध के लिए अपने पग बढ़ाये तो मां जगदम्बा अपनी समस्त शक्तियों के साथ उनकी सहयोगिनी बनीं और विजयदशमी धर्म विजय का महापर्व बन गयी।

    “रामायण” भगवान राम के आदर्श चरित्र की पावन कथा है जो युगों से एक प्रचण्ड प्रेरक शक्ति के रूप में भारतीय संस्कृति को आदर्शोन्मुख दिशा की ओर प्रवृत्त किये हुए है। आदि कवि महर्षि वाल्मीकि ने देवभाषा में इसका संकलन किया और गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के रूप में इस कथा को जन-जन के बीच लोकप्रिय बनाया। कम्बन रामायण के रूप में इसने दक्षिण भारत में लोकप्रियता पायी। इस तरह नाना भाषाओं में भाषान्तरण के साथ यह पावन गाथा समूचे भारतवर्ष में  लोकप्रिय हो गयी।

    दशहरा, असुरता के प्रतीक रावण के वध, संस्कृति प्रतीक माता सीमा की स्वतंत्रता के साथ अधर्म के नाश व धर्म की स्थापना का उद्घोषक पर्व है। नवरात्र की दुर्गापूजा के बाद इस पर्व की स्थिति इसे और भी विशिष्ट रूप प्रदान करती है। इसे दशविध पाप को हरण करने वाली तिथि माना गया है। दशहरा नाम के अर्थ में यही मर्म निहित है।

    आज के सामाजिक जीवन में सभी आपाधापी में परेशान हैं। सबको स्वार्थ और अहंता की कारा घेरे हुए है। हमने अपने पूर्वजों द्वारा बतायी गयी पर्वों की पुण्य प्रेरणाओं को पूरी तरह भुला दिया हैं। पर्वों में समायी सांस्कृतिक संवेदना हमारी मानसिक जड़ता के कुटिल व्यूह में फंसकर मुरझा गयी है। सत्य को जानने, समझने और अपनाने का साहस और संकल्प शायद हम सभी में चुकता जा रहा है। ऐसे में सांस्कृतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय महत्त्व के बिन्दुओं पर सोचने का जोखिम कौन उठाए; यह हमारा राष्ट्रीय और सांस्कृतिक प्रमाद ही है। जबकि विजयादशमी इसी साहस और संकल्प का महापर्व है। यह पर्व अंतस में प्रसुप्त शक्तियों को जाग्रत करने और उन्हें सही दिशा में नियोजित करने की महान प्रेरणा देता है। विजयादशमी के साथ जितनी भी पुरा कथाएं व लोक परम्पराएं जुड़ी हैं, सबका सार यही है। इस पर्व से जुड़ी हुई सबसे पुरातन कथा मर्यादा पुस्र्षोत्तम भगवान श्रीराम के जीवन की है जो महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के साथ विभिन्न पुराणों तथा क्षेत्रीय, प्रान्तीय भाषाओं के विभिन्न महाकाव्यों में अनेक तरह से कही गयी है। अलग-अलग महाकवियों ने अपने-अपने ढंग से इसके माध्यम से प्रभु श्री राम को विजय संकल्प को शब्दांकित किया है।

    कुछ लोक कथाओं एवं लोक काव्यों में दिए गए विवरण भी प्रेरणाप्रद शिक्षण देते हैं। भगवती महिषमर्दिनी ने इसी पुण्यतिथि को महिषासुर के आसुरी दर्प का दलन किया था। जगदम्बा ने अपनी विभिन्न शक्तियों के साथ शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों तक शुम्भ-निशुम्भ की आसुरी सेना के साथ युद्ध किया और अन्त में नवें-दसवें दिन क्रमशः निशुम्भ और शुम्भ का वध करके देवशक्तियों का त्राण किया। विजयादशमी माता आदिशक्ति की उसी विजय गाथा की प्रतीक है। जिन्हें केवल ग्रन्थों की छानबीन एवं ऐतिहासिक आंकड़ों से मतलब हो; हो सकता है कि उन्हें लोक काव्यों के ये प्रसंग सत्य न लगें पर जिन्हें जीवन के भाव-सत्य से प्यार है, वे इन प्रसंगों से प्रेरणा लेकर अपनी भक्ति एवं शक्ति की अभिवृद्धि की बात जरूर सोचेंगे।

    ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि पुरातन काल में शक्ति के उपासक क्षत्रियों में इस पर्व को धूम-धाम से मनाने का प्रचलन था। देश का मध्ययुगीन इतिहास भी इसके छुट-पुट प्रमाण देता है। महाप्रतापी राणाप्रताप के साहस, संकल्प, शौर्य, तेज एवं तप के पीछे विजयादशमी के महापर्व की ही प्रेरणा थी। वह घास की रोटी खाकर, राजा होते हुए फकीरों की सी जिन्दगी जीकर अपने अकेले दम पर साम्राज्यवाद की बर्बरता से जीवनपर्यन्त लोहा लेते रहे। वे न कभी डरे, न कभी झुके और न ही कभी अपने संकल्प से डिगे। महावीर शिवाजी के समर्थ सद्गुरु स्वामी रामदास ने भी अपने प्रिय शिष्य को इसी महापर्व से प्रेरित होने का पाठ पढ़ाया था। विजयादशमी को अपराजेय वीर छत्रपति शिवाजी हमेशा ही साहस और संकल्प के महापर्व के रूप में मनाते थे। पुराने समय में विजयादशमी के दिन राजा, महाराजा अपने राज्य की सीमा लांघ कर युद्ध करने निकलते थे। इस परमपरा को “सीमोल्लंघन” कहते थे। “सीमोल्लंघन” का अर्थ अपनी मर्यादा तोडना नहीं  वरन अपने व्यक्तित्त्व को सीमित न रखते हुए क्षमताओं का असीम विकास करना है। क्या हम विजयादशमी के पर्व पर अपनी इस क्षमता का विकास करने का संकल्प कर सकते हैं? क्या हम हमारे समाज को संगठित कर विजयी सीमोल्लंघन करने निकलेंगे!

    आज का संघर्ष नए रूप में हमारे सामने हैं। आतंकवाद असुर जैसा रूप धारण कर मासूम लोगों की जान ले रहा है। भूमंडलीकरण के बाद कई चीजें मायावी रूप धारण कर हमारे सामने आ रही हैं। क्या हम इन नए आक्रमणों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं? विजयादशमी के पर्व पर इस दिशा में हमें सोचना होगा। विश्व में जीवन की प्रगति के जो मार्ग चुने गए थे वे पराजित, ध्वस्त हैं। ऐसे में विश्व को एक नये वैचारिक मार्गदर्शन की जरूरत है। दुनिया को चिरविजयी विचार देने की क्षमता केवल भारतीय जीवनदर्शन में है। विश्व की मानवता को पावन करने की क्षमता हम ही विश्व को दे सकते हैं। यही विजयादशमी का संदेश है।

    इस प्रेरणादायी महापर्व की परम्परा के कुछ संस्मरण महान क्रान्तिकारी वीर रामप्रसाद बिस्मिल एवं चन्द्रशेखर आजाद से भी जुड़े हैं। क्रान्तिवीर इस पर्व को बड़े ही उत्साहपूर्वक मनाया करते थे। चन्द्रशेखर आजाद का कहना था कि हमारे सभी पर्व-त्योहारों में जितनी ओजस्विता एवं प्रखरता दशहरा में है, उतनी किसी अन्य पर्व में दिखाई नहीं देती। वह कहा करते थे कि यह तो देशभक्त दीवानों का पर्व है। पं. रामप्रसाद बिस्मिल का कहना था कि विजयादशमी साहस और संकल्प का महापर्व है परन्तु ध्यान रखना चाहिए कि साहस का प्रयोग आतंकवादी बर्बरता के प्रति हो, अपनों के प्रति नहीं तथा शौर्य का संकल्प देश के लिए मर मिटने का होना चाहिए, अहंता के उन्माद के लिए नहीं। क्रान्तिवीर बिस्मिल की ये बातें आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी आजादी की लड़ाई के दौरान थीं।

    आज हमारा साहस और संकल्प दोनों सही दिशा से भटक गये हैं। व्यक्ति, परिवार एवं समाज में असुर प्रवृत्तियों की वृद्धि अनर्थ ही पैदा करती है। इन्हीं आसुरी वृतियों पर विजय की प्रेरणा देता है यह पर्व। इसमें असत्य व अन्याय के विनाश और सत्य व न्याय की प्रतिष्ठा का भाव सन्निहित है। यह पर्व प्रेरित करता है कि हम सत्य के सन्निकट पहुंचने का प्रयास करें और संगठित होकर समाज को हानि पहुंचाने वाली आसुरी शक्तियों से मोर्चा लेने को संकल्पित हों। हम साहसी तो हैं पर नवनिर्माण के लिए नहीं, बल्कि तोड़-फोड़ के लिए। हम अपने संकल्पों की शक्ति को अहंता का उन्माद फैलाने तथा साम्प्रदायिक दुर्भाव को बढ़ाने में लगा रहे हैं और देश की समरसता एवं सौहार्द में विष घोलने का काम कर रहे हैं। जबकि समय व राष्ट्र की मांग यह है कि हम अपने साहस और संकल्प की ऊर्जा को उस आतंकवादी बर्बरता के गढ़ को विध्वंस करने में नियोजित करना चाहिए जो देश की अखण्डता को नष्ट करने में तुले हैं। तो आइए इस शौर्य के इस विजय पर्व को हम सब मिल-जुलकर दुष्प्रवृत्तियों के रावण दहन के संकल्प के साथ मनाएं। संकल्प लें अपनी निज की और सामूहिक रूप से समाज की दुष्प्रवृत्तियों को मिटाने का, अनीति और कुरीति के विस्र्द्ध संघर्ष तथा आतंक और अलगाव के विरुद्ध जूझने का। हमारे इस संकल्प में ही इस महापर्व की सार्थकता निहित है।

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