एक वाक्ये को याद करते हुए कैंची निवासी परिपूर्णानंद तिवारी कहते हैं- एक दिन बाबा मेरा हाथ पकड़े आश्रम के बाहर आए। हम दोनों जीप में बैठे और भूमियाधार आ गए। इस आश्रम की व्यवस्था ब्रह्मचारीजी देखते थे, वह नहीं थे। आश्रम में ताला बंद था। बाबा आदेश से ताला तोड़ा गया। बाबा ने अन्दर के कमरों के ताले तोड़ने के भी आदेश दिए। तभी चाबियों का गुच्छा मिल गया। अंदर के कमरे खोले गए। बाबा ने अपना आसन बरामदे में जमा दिया और मुझे चाय बनाने का आदेश दिया। बाबा चाय पीते नहीं थे, इसलिए इस आदेश पर मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने समझा, जरूर कोई भक्त आ रहा है जिसे बाबा दर्शन देना चाहते हैं। आग जलाकर उस पर पानी रख दिया।
इसी बीच एक पंजाबी दम्पति की कार आकर आश्रम के बाहर रुकी। वे कार से उतरे और बाबा का चरणस्पर्श कर रोने लगे। उम्र से वे पचास- पचपन के लग रहे थे। उन्हें रोते देख बाबा ने कहा, “चुप हो । रो मत, हमने कह दिया, लड़का हो जाएगा।” मैं चाय बना कर ले आया। मेरे मन में आया कि बाबा को क्या पागलपन सूझा है, बूढ़ों को सन्तति का वरदान दे रहे हैं। फिर सोचने लगा कि ऐसा कह कर सम्भवतः बाबा इन्हें टाल रहे हैं। जब चाय पीकर वे लोग चले गए तो बाबा ने तीव्र स्वर में कहा, “क्या हम झूठे हैं?” यह प्रश्न उन्होंने बार-बार दुहराया। इससे मुझे बेहद ग्लानि हुई। मैंने कान पकड़ कर माफी माँगते हुए कहा, “सरकार, आप कदापि झूठे नहीं हो सकते।” इसी बीच ब्रह्मचारीजी आ गए। बाबा ने उन्हें काफी फटकार लगाई और कैंची लौट आए।
इस घटना के पंद्रह महीने बाद महाराज जी मुझे लेकर भूमियाधार गए। इस बार ब्रह्मचारीजी आश्रम में ही थे। महाराजजी ने वहीं सड़क के पास अपना आसन लगवाया और बैठ गए। थोड़ी देर में वही दम्पति आ गए। इस बार वे एक डिब्बा घी और कुछ रुपए लेकर आए । औरत की गोद में एक बच्चा था। मुझे पिछले साल की सारी घटना याद आ गई और मैं यह दृश्य देखकर चकित रह गया ।
जय श्री राम, जय हनुमान, जय जय नीब करौरी बाबा







