नीतू सिंह
लखनऊ, उत्तर प्रदेश की राजधानी, अपनी गंगा-जमुनी तहजीब और सांस्कृतिक समृद्धि के लिए जाना जाता है। लेकिन ज्येष्ठ माह (जेठ) के मंगलवारों को यहां की सड़कों पर एक अलग ही रंग नजर आता है। ये है “बड़ा मंगल” या “बुढ़वा मंगल” की परंपरा, जिसमें भगवान बजरंगबली के नाम पर शहर के हर गली-चौराहे पर भंडारे लगते हैं। लाखों श्रद्धालु इस अवसर पर हनुमान जी की पूजा-अर्चना करते हैं और प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि लखनऊ की सामाजिक एकता और सेवा भावना का भी जीवंत उदाहरण है। आइए, इस अनूठी परंपरा के इतिहास, महत्व और विशिष्टता पर एक नजर डालें।
भंडारे की शुरुआत: 400 साल पुरानी परंपरा
लखनऊ में बड़ा मंगल की परंपरा लगभग 400 साल पुरानी मानी जाती है, जो नवाबी दौर से शुरू हुई। इसकी शुरुआत के पीछे कई कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं:
आलिया बेगम की कहानी: एक मान्यता के अनुसार, नवाब शुजाउद्दौला की बेगम और दिल्ली के मुगल खानदान की बेटी आलिया बेगम ने अलीगंज के प्राचीन हनुमान मंदिर का निर्माण करवाया। कहा जाता है कि उनकी कोई संतान नहीं थी। हनुमान जी की कृपा से जब उन्हें संतान प्राप्त हुई, तो उन्होंने भगवान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए भंडारा शुरू करवाया। इस भंडारे में गरीबों को विशेष रूप से प्रसाद वितरित किया गया, और यहीं से यह परंपरा शुरू हुई।
महामारी से मुक्ति की कथा: एक अन्य मान्यता के अनुसार, लखनऊ में किसी समय महामारी का प्रकोप फैला था। लोगों ने हनुमान जी की पूजा शुरू की और एक सपने में संदेश मिला कि अलीगंज में नए हनुमान मंदिर में पूजा करने से संकट दूर होगा। जब मन्नत पूरी हुई, तो भंडारे का आयोजन शुरू हुआ।
केसर व्यापारी की मन्नत: तीसरी कथा एक केसर व्यापारी से जुड़ी है, जिसका माल कैसरबाग की मंडी में नहीं बिका। उसने अलीगंज के हनुमान मंदिर में मन्नत मांगी, और जब उसकी सारी केसर बादशाह ने खरीद ली, तो उसने भंडारा आयोजित किया। यह परंपरा धीरे-धीरे पूरे शहर में फैल गई।
नवाब वाजिद अली शाह का योगदान: इतिहासकार डॉ. योगेश प्रवीण की पुस्तक “लखनऊनामा” के अनुसार, नवाब वाजिद अली शाह और उनकी बेगमों ने अलीगंज के हनुमान मंदिर में भंडारा शुरू करवाया। नवाब इतने बड़े हनुमान भक्त थे कि उनके शासनकाल में बंदरों की हत्या पर भी प्रतिबंध था। मंदिर के शिखर पर लगाया गया चांद आज भी इस इतिहास की गवाही देता है।
ऐतिहासिक साक्ष्यों में गीता प्रेस, गोरखपुर के कल्याण हनुमान अंक (पेज 424-425) में भी लखनऊ के भंडारों का जिक्र मिलता है, जो इस परंपरा की प्राचीनता को दर्शाता है।
कब और कैसे शुरू हुआ बड़ा मंगल?
बड़ा मंगल ज्येष्ठ माह के प्रत्येक मंगलवार को मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस माह में चार या पांच मंगलवार पड़ते हैं, जिन्हें “बड़ा मंगल” या “बुढ़वा मंगल” कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि ज्येष्ठ माह में भगवान राम और हनुमान जी का पहला मिलन हुआ था, इसलिए ये मंगलवार विशेष महत्व रखते हैं।
पहला भंडारा अलीगंज के प्राचीन हनुमान मंदिर से शुरू हुआ, जो आज भी इस परंपरा का केंद्र बिंदु है। शुरुआत में भंडारों में गुड़-धानी, बेसन के लड्डू और शरबत बांटा जाता था, लेकिन समय के साथ अब पूरी-सब्जी, छोले-चावल, कचौड़ी, जलेबी, हलवा और यहाँ तक कि फल और आयुर्वेदिक काढ़े तक वितरित किए जाते हैं।
क्या यह परंपरा सिर्फ लखनऊ तक सीमित है?
हालांकि बड़ा मंगल की परंपरा की जड़ें लखनऊ में हैं और यह शहर इस उत्सव की विशिष्ट पहचान के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन यह अब अवध क्षेत्र और उत्तर प्रदेश के अन्य शहरों जैसे गोरखपुर, वाराणसी, और कानपुर तक फैल चुकी है। फिर भी, लखनऊ में इसकी भव्यता और व्यापकता बेजोड़ है। शहर के हर कोने में भंडारे लगते हैं, और हिंदू-मुस्लिम समुदाय मिलकर इसमें हिस्सा लेते हैं, जो लखनऊ की गंगा-जमुनी तहजीब को दर्शाता है।
लखनऊ के बाहर भी हनुमान जी की पूजा और भंडारे आयोजित होते हैं, लेकिन ज्येष्ठ माह के प्रत्येक मंगलवार को इतने बड़े पैमाने पर भंडारे और सामुदायिक उत्सव शायद ही कहीं देखने को मिलते हैं। यह परंपरा लखनऊ की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है।
भंडारे की विशेषताएँ और महत्व
सामाजिक एकता का प्रतीक: बड़ा मंगल केवल धार्मिक आयोजन नहीं है। इसमें हर जाति, धर्म और वर्ग के लोग हिस्सा लेते हैं। मुस्लिम समुदाय भी भंडारों में योगदान देता है, और नवाबी दौर में भी इस हिंदू परंपरा को प्रोत्साहन मिला था।
सेवा और परोपकार: भंडारों का मुख्य उद्देश्य है कि कोई भूखा न रहे। लोग अपने घरों में खाना नहीं बनाते और भंडारों से प्रसाद ग्रहण करते हैं। कई जगहों पर पानी, शरबत और फल भी बांटे जाते हैं, जो ज्येष्ठ की भीषण गर्मी में राहत प्रदान करते हैं।
आध्यात्मिक महत्व: मान्यता है कि बजरंगबली की पूजा और भंडारा आयोजित करने से हर मनोकामना पूरी होती है। हनुमान जी को संकटमोचन माना जाता है, और उनकी कृपा से भक्तों के कष्ट दूर होते हैं।
पशुओं के लिए भी भंडारा: हाल के वर्षों में लखनऊ में एक अनूठी पहल शुरू हुई है, जिसमें निराश्रित पशुओं के लिए भी भंडारे लगाए जाते हैं। फल, सब्जियाँ, भूसा, और रोटी जैसी चीजें जानवरों के लिए रखी जाती हैं, जो पर्यावरण और जीव दया के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाता है।
सार्वजनिक भागीदारी: भंडारों में आम लोग, कारोबारी, राजनेता, और सामाजिक संगठन सभी हिस्सा लेते हैं। उदाहरण के लिए, 2025 में लखनऊ के विभिन्न हिस्सों में सैकड़ों भंडारे आयोजित हुए, जिनमें उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और मंत्री एके शर्मा जैसे नेता भी शामिल हुए।
आज के दौर में भंडारे का स्वरूप
समय के साथ भंडारों का स्वरूप बदला है। पहले साधारण गुड़-धानी और शरबत से शुरू हुई यह परंपरा अब भव्य आयोजनों में बदल चुकी है। अब भंडारों में:
- विविध व्यंजन: पूरी-सब्जी, छोले-चावल, कचौड़ी, जलेबी, हलवा, और यहाँ तक कि आइसक्रीम तक बांटी जाती है।
- प्याऊ और जल सेवा: ज्येष्ठ की गर्मी में ठंडा पानी और शरबत बांटना पुण्यकारी माना जाता है।
- सुरक्षा और व्यवस्था: प्रशासन भंडारों के लिए विशेष इंतजाम करता है, जैसे ट्रैफिक व्यवस्था और सुरक्षा।
लखनऊ की आत्मा: बड़ा मंगल
बड़ा मंगल सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि लखनऊ की आत्मा है। यह शहर की सांस्कृत patricks-day परंपरा को जीवंत करता है। हर गली-चौराहे पर लगने वाले भंडारे, मंदिरों में उमड़ती भक्तों की भीड़, और सेवा भाव से भरा यह उत्सव लखनऊ की सांस्कृतिक धरोहर को दर्शाता है। जैसा कि एक स्थानीय निवासी ध्रुव ने कहा, “हम बस भंडारे का प्रसाद ही ग्रहण करते हैं। ये परंपरा मेरे पिताजी भी निभाते थे और अब मैं भी इसे आगे बढ़ा रहा हूँ।”
उत्साह से कहता हूं कि लखनऊ का बड़ा मंगल एक ऐसा उत्सव है जो आस्था, सेवा, और सामुदायिक एकता का अनूठा संगम है। 400 साल पुरानी इस परंपरा की शुरुआत भले ही अलीगंज के हनुमान मंदिर से हुई हो, लेकिन आज यह पूरे शहर और अवध क्षेत्र की पहचान बन चुकी है। ज्येष्ठ माह के मंगलवारों को लखनऊ की सड़कें भक्ति और सेवा की बयार से सराबोर हो जाती हैं, और यह परंपरा न केवल धार्मिक, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी लखनऊ को विशिष्ट बनाती है।
जय बजरंग बली!







