नदियां : कब तक सहेंगी ये जंजीरें?
कल्पना कीजिए… एक नदी, जो सदियों से बह रही है। वो चुपचाप लोगों के पाप धोती जाती है, कूड़ा-कचरा सहती जाती है, खेतों को हरा-भरा करती है, प्यास बुझाती है… लेकिन उसके मन में एक ही सवाल सालता रहता है—
“मेरी बहनें कहाँ हैं? मैं उनसे मिल क्यों नहीं पाती?”हाँ, मैं बात कर रही हूँ उन नदियों की, जो भारत की धमनियाँ हैं। गंगा, यमुना, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी… और सैकड़ों छोटी-बड़ी बहनें। वो एक-दूसरे से मिलना चाहती हैं, जैसे हम भाई-बहन मिलते हैं—होली पर, रक्षाबंधन पर, ईद मिलन पर। लेकिन उनके रास्ते में क्या-क्या आड़े आते हैं?
- ऊँचे-ऊँचे पहाड़
- कठोर तटबंध
- बाँधों की दीवारें
- और सबसे बड़ी—मानव की लालच और लापरवाही
“देश आज़ाद है, पक्षी आज़ाद हैं, हवा आज़ाद है… फिर मैं क्यों कैद हूँ?”
वो कहती हैं—
“मैं तो बस बहना चाहती हूँ, अपनी बहनों से गले मिलना चाहती हूँ। पूछना चाहती हूँ—तुम भी मेरी तरह प्रदूषण की मार झेल रही हो? सूख रही हो? या बाढ़ में तबाह हो रही हो?”
2026 की हकीकत क्या है?
- केन-बेतवा लिंक परियोजना की आधारशिला 2024 में रखी गई थी, अब काम जोरों पर है। 2026 में कई हिस्से पूरे होने की उम्मीद है—बुंदेलखंड को पानी मिलेगा, लाखों हेक्टेयर में सिंचाई होगी।
- राष्ट्रीय नदी जोड़ो परियोजना में कुल 30 लिंक हैं 26 की व्यवहार्यता रिपोर्ट तैयार, 13 की DPR पूरी। लेकिन अभी भी ज्यादातर सिर्फ कागजों पर हैं।
- “अगले साल तक नदियों को जोड़ देंगे” का वादा दशकों से सुन रही हैं ये नदियाँ। वो हँसती हैं “अगला साल कब आएगा?”
प्रदूषण की मार अभी भी जारी
- यमुना दिल्ली में जहरीली हो चुकी है (बीओडी 80-100+ mg/L)
- मिथी नदी महाराष्ट्र में 200+ mg/L पर—जैसे जहर बह रहा हो
- गंगा, गोदावरी, कृष्णा… हजारों करोड़ खर्च हुए, फिर भी 296+ प्रदूषित खंड बाकी हैं।
बाढ़ और सूखा : दोनों चेहरे
- मानसून में बाढ़ से लाखों बेघर
- सूखे में नदियाँ कंकाल बन जाती हैं , रेत खनन, अतिक्रमण, गाद भरने से बहाव रुक गया।
नदियों का गुस्सा अब फूटने वाला है
“सब्र की भी सीमा होती है। मैंने मानव से सीखा है, संघ में शक्ति है। सरकारी कर्मचारी हड़ताल करते हैं, ट्रेड यूनियन बनाते हैं… तो मैं क्यों नहीं?”
नदियों का स्लोगन तैयार है—
“जोड़ सके न वे अब तक नदियों को नदियों से…
क्यों सुनती रहूँ निरा भाषण नेताओं के सदियों से?”
लेकिन अंतिम मौका दे रही हैं नदियाँ
“अभी भी वक्त है। एक बार जोड़कर तो देखो। बहनों से मिलाकर तो देखो।
फिर मैं जिद नहीं करूँगी। सब एक साथ बहेंगी—न सूखा आएगा, न बाढ़ का कहर। धरती सुखी होगी, हरियाली लौट आएगी।”
वरना…
“मुझे भी तूफान लाना आता है। थोड़ा गुस्सा ही काफी है: सब उलट-पुलट हो जाता है।
और मानव जाति को दाद देनी होगी—कितनी ढीठ है ये!”सवाल आपसे है
कब तक हम नदियों के पाप धुलवाते रहेंगे… और उनकी व्यथा अनसुनी करते रहेंगे?
अब वक्त है बदलाव का।
नदियों को बहने दो—आज़ाद, जुड़ी हुई, स्वच्छ। हर हर गंगे!
नदियों की पुकार सुनो… वरना पुकार सुनाई नहीं देगी। – प्रस्तुति : देवेश पांडेय







