लखनऊ : नोयडा-ग्रेटर नोयडा में न्यूनतम मजदूरी वृद्धि, ओवरटाइम का दोगुना भुगतान, समय पर बोनस और अन्य मजदूर हितों की मांगों को लेकर चले आंदोलन पर राज्य सरकार के दमन के खिलाफ केंद्रीय श्रम संगठनों की संयुक्त बैठक आज सीटू के राज्य कार्यालय में हुई। बैठक के बाद जारी विज्ञप्ति में संगठनों ने सरकार की कार्रवाई की कड़ी निंदा की और सभी गिरफ्तार मजदूरों-कार्यकर्ताओं की बिना शर्त रिहाई की मांग की।
मजदूरों की मुख्य मांगें
- न्यूनतम वेतन में वृद्धि (प्रदेश में 2014 के बाद रिवीजन नहीं हुआ, 2019 में होना था)।
- ओवरटाइम का दोगुना भुगतान।
- बोनस का 30 नवंबर तक भुगतान।
- 8 घंटे काम, साप्ताहिक अवकाश, ESI, PF, नौकरी सुरक्षा।
- ठेका मजदूरों के साथ समान व्यवहार और ठेका प्रथा का उन्मूलन।
- न्यूनतम 26 हजार रुपये मासिक वेतन की मांग।
संगठनों ने आरोप लगाया कि ठेका मजदूरों को 10-13 घंटे काम पर मात्र 10-12 हजार रुपये वेतन दिया जा रहा है और उन्हें कई सुविधाओं से वंचित रखा गया है।
सरकार पर आरोप और दमन की निंदा : बैठक में कहा गया कि नोयडा में 40-50 हजार मजदूरों का यह संघर्ष वर्ग संघर्ष की अभिव्यक्ति है, लेकिन राज्य मशीनरी कारपोरेट हितों की रक्षा में मजदूर अधिकारों को कुचल रही है।
- 350 से ज्यादा मजदूरों की गिरफ्तारी।
- महिला मजदूरों पर हमले।
- कानूनी सहायता प्रदाताओं को निशाना बनाना।
- श्रमिक नेताओं को हाउस अरेस्ट कर अन्य जिलों (गाजीपुर, वाराणसी, मेरठ आदि) में एकजुटता रोकना।
- आंदोलन को ‘बाहरी’ और ‘राष्ट्र विरोधी’ बताकर बदनाम करना।
संगठनों ने श्रम मंत्री के ‘पाकिस्तान का हाथ’ वाले बयान की भी तीखी निंदा की।
संगठनों की मांगें
- सभी गिरफ्तार मजदूरों और कार्यकर्ताओं की तत्काल रिहाई।
- झूठे मुकदमों की वापसी।
- दमन बंद कर त्रिपक्षीय वार्ता।
- न्यूनतम वेतन बोर्ड का गठन।
- कार्यस्थल सुरक्षा और ठेका प्रथा समाप्ति।
बैठक में उपस्थित प्रमुख नेता
बैठक की अध्यक्षता डॉ. वी.के. सिंह (एचएमएस) ने की।
उपस्थित थे: दिलीप श्रीवास्तव और सुधीर श्रीवास्तव (इंटक), चंद्रशेखर (एटक), उमाशंकर मिश्रा, अविनाश पांडे (एचएमएस), प्रेम नाथ राय (सीटू), बालेन्द्र कटियार (एआईयूटीयूसी) सहित अन्य।
बता दें कि यह आंदोलन 9 अप्रैल से शुरू हुआ था और हिंसा की घटनाओं के बाद पुलिस ने सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया। सरकार ने हाल ही में न्यूनतम मजदूरी में अंतरिम वृद्धि की घोषणा भी की है, लेकिन श्रम संगठन इसे पर्याप्त नहीं मान रहे हैं।







