जी के चक्रवर्ती
आखिरकार हमारे देश की सैन्य प्रतिष्ठानों में महिलाओं को स्थाई नियुक्ति (कमीशन) देकर भारतीय थलसेना में पुरुषों के समक्ष महिलाओं को भी बराबरी का हक प्रदान कर दिया गया है। उन्हें स्थायी कमीशन एवं नियंत्रण तैनातियाँ दिये जाने का मार्ग प्रशस्त हो जाने से सैन्य प्रतिष्ठानों में अब से महिलायें भी परुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर काम करने में उन्हें हीन मनोभावना से त्रस्त नहीं होंगी जिससे उनके कार्य क्षमताओं में विकास होने के साथ ही साथ सेना में भी एक एक नये परिपाटी की शुरुआत होगी।
अभी फरवरी 2020 के दिन देश के सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि सेना में उन सभी महिला अफसरों को तीन महीने के भीतर स्थायी कमीशन प्रदान किया जाये जो महिलायें यह विकल्प चुनना चाहती हैं। इसके लिए मार्च 2019 के बाद सेना में काम करने की शुरुआत करने जैसी सरकारी शर्त को भी अदालत ने ख़ारिज कर दिया है। अभी तक सैनिक प्रतिष्ठान में लघु सेवा आयोग (एसएससी) के तहत 14 वर्षों तक की सेवा दे चुके पुरुष सैनिकों को ही स्थायी सेवा का विकल्प मिलता था वहीँ पर महिला सैनिकों को इसके लिए हकदार नहीं माना जाता था। इसके ठीक विपरीत वायुसेना एवं नौसेना जैसे प्रतिष्ठानों में महिला अफसरों को स्थायी सेवा करने का मौका पहले से ही दिया जाता रहा है। इस तरह से दिल्ली उच्च न्यायालय के वर्ष 2010 में दिये गये निर्णय को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है।
सैन्य प्रतिष्ठान में महिला अफसरों को स्थायी कमीशन देने की इजाजत दिल्ली उच्च न्यायालय ने वर्ष 2010 में दिया और उसके बाद 2 सितंबर 2011 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस फैसले पर अपनी मोहर लगा देने के बावजूद केंद्र सरकार ने इस फैसले पर अमल नहीं किया था। हाईकोर्ट से फैसले आने के नौ वर्षों के बाद फरवरी 2019 में सरकार ने सेना के 10 विभागों में महिला अफसरों को स्थायी कमीशन देने की आदेश इस शर्त के साथ जारी किया था कि इसका फायदा केवल मार्च 2019 के बाद से सेवा में नियुक्ति पाये महिला अफसरों को ही मिलेगा। केंद्र सरकार के इस आदेश से स्थायी कमीशन पाने से वंचित रह गये महिलाओं ने इस मसले पर लंबे समय तक कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद उनके हाथ सफलता लगी है।
केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर उसमे ऐसा दलील दी गयी थी कि सेना में ज्यादातर जवान ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं और महिला अधिकारियों को फौजी हुक्म लेना उनके लिए सहज नहीं होगा, इसके साथ यह भी कि महिलाओं की शारीरिक स्थिति और पारिवारिक दायित्व जैसी बहुत सी अन्य बातें उन्हें निर्देशन देने वाले अधिकारी बनने में बाधक हैं कुछ एसे दलीलों को नकारते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महिलाओं को कमांडिंग पद पर न रखने जैसी बातें अतार्किक एवं बराबरी जैसे बातों के विरुद्ध होने से लगता है कि अभी भी हमारे समाज के लोगों महिलाओं के प्रति कुंठाओं से ग्रसित हैं लेकिन यह समय की पुकार है कि हमारी सरकारों को महिलाओं के प्रति अपनी कुंठित मानसिकता को बदल कर सेना में भी महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने जैसी अपनी नीति को लागु कर स्पष्ट करना होगा।
दरअसल हमारे देश के लोगों की मानसिकता को बदलने का परिचय देते हुये महिलाओं को सेना में सम्मिलित तो अवश्य कर लिया लेकिन उन्हें लेकर सेना में नेतृत्व देने पर संकोच अभी भी व्यप्त है और जो अभी तक समाप्त नहीं हो पाई है। महिलाओं ने अपने प्रयास से सेना के दरवाजे अपने लिए खुलवाने के बाद यह साबित कर दिया है कि सारे काम वे पुरुषों की तरह ही कुशलतापूर्वक कर सकती हैं। आज फौजी इस बात को स्वीकार भी कर रहे हैं। उनकी अगली मंजिल लड़ाई (कॉम्बैट) के मैदान में भी नजर आने लगेंगी। उन्हें इस भूमिका में लाने का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने अभी सरकार और सेना पर छोड़ दिया है। हम आशा कर सकते हैं कि हमारे देश की महिलाएं जल्द ही इस भूमिका में भी नजर आएंगी।







