बसंत पंचमी का त्यौहार लगभग पूरे भारत में धूमधाम से मनाया जाता है। बसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा-अर्चना की जाती है क्योंकि इस दिन स्वरस्वती देवी का जन्म हुआ था इसलिए इस दिन सरस्वती पूजा का विधान है। कई लोगों द्वारा इस दिन को प्रेम के देवता काम देव की पूजा करने की परिपाटी भी हैं।
किसानों के लिए इस त्योहार का विशेष महत्व रखता है। बसंत पंचमी के अवसर पर सरसों के खेत लहलहा उठते हैं। चना, जौ, ज्वार और गेहूं की बालियां खेतों में खिलने लगती हैं। इसी दिन से बसंत ऋतु का प्रारंभ काल होता है। गावों में महिलाए पीले वस्त्र पहनकर इस ऋतु का स्वागत करती हैं और गीत संगीत के माध्यम से होली आने की तयारी करती हैं।

वैसे तो हमारे देश मे ऋतुएं छह प्रकार की होती हैं लेकिन बसंत को इन सभी ऋतुओं में से सबसे अधिक महत्व जाता है इसलिए इसे ऋतुओं का राजा भी कहा कहते हैं। हमारे देश मे बसंत ऋतु का मौसम अत्यंत सुहाना होता है और पेड़-पौधों में नए फल-फूल पल्लवित होने लगते हैं। इस दिन को कई लोगों द्वारा पतंगबाजी कर के मनाया जाता है।
हिन्दू पंचांग के अनुसार बसंत पंचमी का त्योहार प्रति वर्ष माघ मास शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के के अनुसार बसंत पंचमी प्रति वर्ष जनवरी या फरवरी माह में पड़ती है।
बसंत पंचमी के दिन बसंत ऋतु का आगमन काल होने से इसे ऋतुराज बसंत भी कहा जाता है इस कारण इसका बड़ा महत्व है। कड़कड़ाती ठंड के बाद बसंत में प्रकृति की छटा देखते ही बनती है। पलाश के लाल फूल, आम के पेड़ों पर आए बौर, चारो ओर हरियाली और गुलाबी ठंड मौसम को बहुत खुशनुमा बना देती है। यह ऋतु मनुष्यो की स्वास्थ्य की दृष्टि कोण से भी बहुत ही उत्तम मानी जाती है। मनुष्यों के साथ पशु-पक्षियों में नई चेतना का संचार होता है। बसंत को प्रेम के देवता कामदेव का मित्र माना जाता है, वहीं, हिंदू मान्यताओ के अनुसार इस दिन देवी सरस्वती का जन्म हुआ था इसलिए हिंदुओं की इस त्योहार में गहरी आस्था होने से इस दिन पवित्र नदियों में स्नाना करने का भी विशेष महत्व होता है। हमारे देश के पवित्र नदियों के तट पर एवं अनेकों तीर्थ स्थानों पर बसंत मेला का आयोजन भी किया जाता है।
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्।।
या देवी मोहे विद्याम देहि।।
सृष्टि की रचना काल मे ब्रह्मा जी ने जीव-जंतुओं एवं मनुष्य योनि की रचना की लेकिन उन्हें ऐसा आभाष हुआ कि इस सृष्टि में अभी कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चहुंओर घोर सन्नाटा छाया हुआ है। ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से एक अंजुल जल निकल कर इस पृथ्वी छिड़का, जिससे चार हाथों वाली एक सुंदर कन्या प्रकट हुईं। उस कन्या के एक हाथ में वीणा और दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। बाकि दोनों हाथों में पुस्तक और माला थी। ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा के तारो को छेड़ा उसकी मधुरनाद से सम्पूर्ण संसार झंकृत हो उठी जिससे समस्त जीव-जंतुओं में वाणी का संचार हुआ।
झरने की जल धारायें भी कोलाहल करने लगी। हवा सरसराहट के आवाज करती हुई बहने लगी। तब ब्रह्मा ने देवी को वाणी की देवी (प्राणियों में स्वर का संचार काने वाली) सरस्वती कहलाई सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणा वादनी एवं वाग्देवी सहित अनेको नामों से पूजा एवं पुकारा जाता है। देवी जो विद्या, बुद्धि और संगीत की देवी हैं। ब्रह्मा ने देवी सरस्वती की उत्पत्ती बसंत पंचमी के दिन ही की थी। इसलिए हर साल बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती का जन्म दिन मनाया जाता है।
- प्रस्तुति: जी के







