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    Home»धर्म

    श्री राम कथा का विश्वव्यापी प्रभाव

    By July 1, 2018 धर्म No Comments6 Mins Read
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    Post Views: 1,075
    हेमंत कुमार/जी.के.चक्रवर्ती
     
    महर्षि वाल्मीकि को आदि कवि माना जाता है। उनके द्वारा लिखी गई श्रीमद् वाल्मीकि रामायण संस्कृत भाषा का अनुपम महाकाव्य है। जिसमें सात काण्ड और 24000 श्लोक है। राम संबंधी कथानक ने बहुत से कवियों को प्रभावित किया है। श्री भागवत नन्द गुरू ने संस्कृत में भी श्री राघवेंद्र चारित्रम की रचना की है। जिसमें दास कांड और 3000 श्लोक हैं। महर्षि वेदव्यास जी ने महाभारत के वनपर्व, द्रोण पर्व,और शांति पर्व में रामकथा की चर्चा की है। बौद्ध धर्म के साहित्य में भी राम कथा का वर्णन किया गया है। बौद्ध साहित्त्य में दशरथ जातक,दशरथ कथानक तथा अनामक जातक के नाम से तीन जातक कथायें लिखी गई है।
    जैन धर्म में भी राम कथा को बहुत महत्व दिया गया है। और राम कथा से संबंधित बहुत से ग्रंथ लिखे गए हैं। प्राकृत भाषा में ‘पउमचरिउ नाम से रामकथा विमल सूरी ने लिखी है। स्वयंभू महाराज ने अपभ्रंश भाषा में पउमचरिउ लिखा है। संस्कृत भाषा मे आचार्य रविषेण ने पद्यम पुराण, रामचंद्र चरित्र पुराण तथा आचार्य गुणभद्र ने उत्तर कुमार की रचना की है। जैन परंपरा में रामचंद्र जी का एक नाम पद्यम बताया गया है। और जैन लोग रामचंद्र जी को अपनी परंपरा में मानते हैं। जैन तीर्थंकर भी सूर्यवंशी थे तथा अयोध्या के राजा रहे हैं जो राजपाठ त्याग कर तप करने चले गये थे और बाद में तीर्थंकर हो गये। भृतहरि शतक के रचयिता राजा भरथरी या भृतहरि इनके ही भाई थे।
    संस्कृत के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं में भी विद्वानों ने राम कथा लिखी है। गुजराती, तमिल, मराठी, कन्नड, बांग्ला, असमीया, उर्दू, अरबी और फारसी भाषाओं में भी रामायण लिखी गई है। महाकवि कालिदास, भट्ट प्रवर सेन, भास, क्षेमेन्द्र, भवभूति, राजशेखर, कुमारदास, सोमदेव, विश्वनाथ ने भी राम कथा लिखी है।
    गुरुगोविंद सिंह, समर्थ गुरु रामदास संत तुकोजी महाराज ने भी राम चरित का लिखा है गुरु गोविंद सिंह संत गुरु रविदास संत तुकोजी महाराज ने भी राम कथा को अपने काव्य का कथानक बनाया है। तमिल में महर्षि कम्बन ने कम्बन कंबन रामायण लिखी है। उनके समय में राम सेतु भग्नावस्था में मौजूद था। इस बात की चर्चा उन्होंने अपनी रामायण में की है। बांग्ला श्रीजी महाराज करपात्री जी महाराज ने रामायण की मीमांसा की रचना की है और रामकथा का वैज्ञानिक विवेचन किया है।
    वर्तमान में प्रचलित रामकथानकों के नाम इस प्रकार है- आदि रामायण,अद्भुत रामायण,कृतिवास रामायण, कम्ब रामायण,उत्तर रामचरितम,मैथिल  रामायण, स्वार थरामायण रामायण रामायण ने रामायण मीमांसा की रचना की है और और रामकथा का वैज्ञानिक विवेचन किया वर्तमान में प्रचलित रामकथा कथानकों के नाम इस प्रकार है आधी रामायण अद्भुत रामायण मनका रामायण रामायण कृतिवास रामायण रामजी भाषा में कृतिवासा ऋषि ने कृतिवास रामायणइस लिखी है। लक्ष्मण रेखा प्रसंग का पूरा वर्णन रचना में विस्तार से दिया गया है।
    करपात्री जी महाराज ने रामायण मीमांसा की रचना की है और राम कथा का वैज्ञानिक विवेचन किया है। वर्तमान में प्रचलित राम कथानांकों के नाम इस प्रकार है- आदि रामायण, अद्भुत रामायण बिलंका रामायण, कम्ब रामायण, कृतिवास रामायण, उत्तरराम चरितम मैथिली रामायण, सर्वाथ रामायण, तत्वार्थ रामायण, भुशुण्डि रामायण, मंत्र रामायण, प्रेमरामायण, अध्यात्म रामायण, रघुवंशम्, प्रतिमानाटकम्, योग वशिष्ठ रामायण, आनंद रामायण, अभिषेक नाटकम्, हनुमान नाटकम्,, जानकी हरणम, राधेश्याम रामायण,चम्पू रामायण आदि।
    विदेशों में तिब्बती रामायण इंडोनेशिया में ककबिन रामायण,जावा का सेरतराय,रामकेलिंग, पातानी रामकथा, पूर्वी तुर्किस्तान सैरिराम, रामकेलिंग, पतानी उजाला का शेष राम श्री राम राम की राम कथा पूर्वी तुर्किस्तान की खेतानी रामायण, इंडोचाइना की रामकीर्ति, खमैर रामायण म्यांमार की भूतो रामायण, थाईलैंड की रामकियेन,आदि में रामकथा का गायन किया गया है। इसके अतिरिक्त बहुत विद्वानों का मानना है कि ग्रीस के कवि होमर के काव्य इलियड तथा रोम के कवि नोनस की रचना अयनोशिया की कथा रामकथा के साथ एक अद्भुत साम्य रखती है।
    इस प्रकार से हम देखते हैं कि महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण ने भारत तथा भारत के बाहर के देशों के साहित्य पर बहुत गहरा और व्यापक प्रभाव छोड़ा है।
    बाल्मीकि रामायण के बाद दूसरी महत्वपूर्ण पुस्तक गोस्वामी तुलसी दास कृत ‘रामचरित मानस’ है। पहले गोस्वामी तुलसीदास जी संस्कृत में ही अपनी रामकथा लिखना चाहते थे। किन्तु अकबर के दरबार के नवरत्न अब्दुलरहीम ‘खानखाना’ ने उनको परामर्श दिया कि अगर आप संस्कृत में अपना ग्रंथ लिखेंगे तो यह केवल पंडित और संस्कृत के जानकार लोग लोगों तक ही सीमित रह जायेगा इसलिए आप अपनी रचना हिंदी तथा अवध क्षेत्र की सामान्य जनों द्वारा बोली जाने वाली अवधि में लिखें। इससे आपकी रचना जन-जन के घरों तक पहुंचेगी और आप अमर हो जायेंगे। तुलसी दास जी ने उनके सुझाव को मानकर अवधी भाषा मे रामचरित मानस की रचना की जो प्रत्येक हिन्दू के घर में सम्मानजनक स्थान रखती है। तुलसी दास जी ने काशी में रहकर अपनी रचना पूर्ण की। बाद में वह चित्रकूट चले गये और वहां पर वह अपनी रामकथा का वाचन करते रहे करते थे। अपने अंतिम समय में रहीम जी भी चित्रकूट आकर रहने लगे थे। वह भी राम कथा सुना करते थे। उन्होंने लिखा है –
    ” चित्रकूट में रमि रहे, रहिमन अवध नरेश।
    जेहि पर विपदा परत है, सो आवत यही देश।।”
    रामचरितमानस का विशेष का उत्तर भारत की जनता पर बहुत व्यापक प्रभाव पड़ा और हिंदी में बहुत से कवियों ने राम कथा लिखी रीतिकालीन कवि केशवदास की रामचंद्रिका की रचना की नेपाल रमेश के दरबारी कवि राधेश्याम साहू जी ने अपनी राधेश्याम रामायण लिखी करपात्री जी ने रामायण मीमांसा गुरु गोविंद सिंह ने भी राम चर्चा की है राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त पंचवटी तथा साकेत की रचना की है मुगल सम्राट अकबर ने फारसी भाषा में रामायण का अनुवाद कराया था जिसकी एक प्रति जयपुर के संग्रहालय में सुरक्षित है।
    मुसलमान जनता को भी राम कथा ने काफी प्रभावित किया। इसलिए राम कथा का उर्दू में भी अनुवाद किया गया। अवध के नवाबी दरवार में लगभग तीन सौ हिन्दू शायर रहे। अरबी और उर्दू भाषा मे उनके योगदान को भुलाया नही जा सकता। डॉo नरेंद्र बहादुर श्रीवास्तव ने इस पर अपनी पुस्तक लिखी है। उनमें से खूशतर जी ने कुशतर रामायण फरहत जी ने फरहत रामायण तथा उफक जी ने उफक रामायण पर हर समाज सेवक जी ने आक्रमण उर्दू में लिखी थी। जिसमें एक ही काफिये पर दस हजार शेर लिखे है। जिसको यक काफिया रामायण भी कहते हैं।

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