कश्मीर के विलय की नहीं थी कोई शर्त

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री
नरेंद्र मोदी सरकार ने अपनी दूसरी पारी की जोरदार शुरुआत की है। सावन के पहले सोमवार को चंद्रयान, दूसरे सोमवार को तीन तलाक की समाप्ति और तीसरे सोमवार को जम्मू कश्मीर पर साहसिक फैसला आ गया। अब जम्मू कश्मीर में उप राज्यपाल होंगे, विधानसभा कायम रहेगी, लेकिन केंद्र शाषित प्रदेश की तरह, पुलिस बल केंद्र के अधीन होगा, भारतीय नागरिक जम्मू कश्मीर में ज़मीन ले सकेगा, वहां निवेश होगा, उद्योग लगाने का रास्ता साफ होगा, जम्मू कश्मीर राज्य के विशेषाधिकार समाप्त हो जाएंगे, लद्दाख में विधायिका नहीं होगी, जम्मू कश्मीर राज्य का पुनर्गठन होगा। पुनर्गठन में जम्मू कश्मीर और लद्दाख का नए सिरे से पुनर्गठन किया जाएगा, अब जम्मू-कश्मीर में अलग संविधान नहीं होगा। जम्मू-कश्मीर में अलग झंडा नहीं रहेगा। भारत का तिरंगा वहां का भी ध्वज होगा। अब जम्मू-कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल छह वर्ष की जगह पांच वर्ष होगा।
पाकिस्तान, कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी आदि मुगालते में रहे, इन्हें यह विश्वास था कि अनुच्छेद तीन सौ सत्तर को हटाने की बात दूर , इसे कोई छूने की कोशिश भी नहीं करेगा। लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार को समझने में इन्होंने एक बार फिर भूल की है। कश्मीर केंद्र शासित होगा, लद्दाख अलग राज्य बनेगा और जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा भी समाप्त होगा। इस विशेष दर्जे के कारण ही घाटी के तीन परिवारों और अलगाववादियों का मनोबल बढ़ा हुआ था।
अनुच्छेद तीन सौ सत्तर को हटाने की बात करना ही देश मे गुनाह हो गया था। जो इसे हटाने की बात करता था उसे साम्प्रदायिक और संविधान विरोधी करार दिया जाता था।
कुछ समय पहले तक भाजपा पर तंज किया जाता था। कहा जाता था कि उसने सत्ता के लिए तीन सौ सत्तर के मुद्दे छोड़ दिया है। भाजपा सरकार ने जब इसे हटा दिया तो कहा जा रहा है कि संविधान की हत्या कर दी गई है। क्या संविधान इसी अनुच्छेद के कारण जिंदा था। अस्थाई अनुछेद के लिए इतनी बेकरारी हैरान करने वाली थी। इसका लाभ भले ही तीन परिवार और हुर्रियत नेता उठा रहे थे, लेकिन आमजन को इसका नुकसान ही हो रहा था। यहाँ कोई निवेश नहीं होता था। रोजगार के अवसर नहीं थे। अब इन्हीं चंद लोगों को परेशानी होगी। आमजन के लिए यह अच्छा निर्णय साबित होगा। पाकिस्तान के करीब होने के कारण इस प्रदेश का केंद्र शासित होना अपरिहार्य था। पाकिस्तान के अलावा भारत के पाकिस्तान परस्त नेताओं को समझना चाहिए था कि अनुच्छेद तीन सौ सत्तर संविधान का अस्थायी उपबन्ध है। इसे अस्थाई अध्याय में शामिल किया गया है। संविधान की संघीय व समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बनाने की संसद की शक्तियों को जम्मू कश्मीर के संदर्भ में सीमित किया गया है।
इसी प्रकार अनुच्छेद पैंतीस ए जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने के लिए है। इसके तहत जम्मू कश्मीर को अपने राज्य की नागरिकता निर्धारित करने का अधिकार दिया गया है। जम्मू कश्मीर में उन लोगों को स्थाई निवासी माना गया है जो चौदह मई उन्नीस सौ चौवनके पहले कश्मीर में बसे थे। इन्हीं लोगों को जम्मू कश्मीर में जमीन खरीदने, नौकरी और सरकारी योजनाओं में विशेष अधिकार मिले हैं। देश के किसी दूसरे राज्य का निवासी जम्मू-कश्मीर का स्थाई निवासी नहीं हो सकता। उसे यहां स्थायी निर्माण करने, जमीन खरीदने का अधिकार नहीं है। यह भी व्यवस्था है कि यहां की महिला भारत के किसी व्यक्ति से शादी करती है तो उसके विशेष अधिकार इस राज्य में समाप्त हो जाते हैं। राज्य सरकार की नौकरी अन्य प्रदेश के लोगों को नहीं मिल सकती।
इसमें कोई संदेह नहीं कि भारतीय संविधान की यह व्यवस्था भेदभाव को बढ़ावा देने वाली है। फिर भी महत्वपूर्ण यह है कि इसे अस्थाई व्यवस्था के रूप में संविधान का हिस्सा बनाया गया। अनुच्छेद पैंतीस ए तो अदृश्य है। इतने वर्षों बाद संविधान के इस अस्थाई उपबन्ध पर विचार तो किया जा सकता है। भाजपा ने कहा है कि भारत के कुछ विपक्षी नेताओं ने भी पाकिस्तान को ऐसे बयान देने का मौका दिया है। यहां कुछ पार्टियां अपने चुनावी घोषणा पत्र में लिखती हैं कि अनुच्छेद तीन सौ सत्तर को हटने नहीं देंगे।
कोई कहता है कि यह अनुच्छेद हटा तो जम्मू कश्मीर में तिरंगा उठाने वाला नहीं मिलेगा। कोई कहता है कि अनुच्छेद तीन सौ सत्तर के कारण ही कश्मीर भारत का हिस्सा है। यह अनुच्छेद हटा तो दिल्ली से राज्य का सम्पर्क टूट जाएगा। ऐसे ही नेता भारत द्वारा आतंकी ठिकानों पर सर्जिकल और एयर स्ट्राइक के सबूत मांगते हैं। इन्हें अपने सैनिकों पर ही विश्वास नहीं है।
गृहमंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद तीन सौ सत्तर हटाने का संकल्प पेश किया था। उन्होंने ठीक कहा कि इस अनुच्छेद  के कई खंड लागू नहीं होंगे। सिर्फ खंड एक बचा रहेगा। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर को मिला विशेष राज्य का दर्जा खत्म हो गया है। इसके अलावा  जम्मू-कश्मीर अलग केंद्र शासित प्रदेश बनेगा।  लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाएगा।
जम्मू-कश्मीर विधानसभा के साथ केंद्र शासित प्रदेश बनेगा। अमित शाह ने कहा कि अनुच्छेद तीन सौ सत्तर  का सहारा लेकर तीन परिवारों ने सालों तक जम्मू-कश्मीर को लूटा है। नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद यह कहना गलत है कि अनुच्छेद तीन सौ सत्तर जम्मू-कश्मीर को भारत से जोड़ता है। महाराज हरि सिंह ने सत्ताईस अक्टूबर को उन्नीस सौ सैंतालीस को भारत के साथ विलय पर दस्तखत किए थे। जबकि अनुच्छेद तीन सौ सत्तर को उन्नीस सौ चौवन में लाया गया था।
इस मुद्दे पर कांग्रेस कश्मीर घाटी के तीन परिवारों के साथ खड़ी दिखाई दी, जिन्हें अमित शाह ने तीन सौ सत्तर के सहारा लेकर लूटने वाला बताया है। कांग्रेस इसके लिए तैयार ही नहीं थी। वह सोच भी नहीं सकती थी कि मोदी सरकार इस अनुच्छेद को हटा देगी। कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद का बयान पार्टी की बौखलाहट व्यक्त करने वाला था। उन्होंने कहा कि वह दो तीन सांसदों का संविधान की कॉपी फाड़ने के फैसले की निंदा करते हैं। हम भारत के संविधान के साथ खड़े हैं।
हम हिंदुस्तान की रक्षा के लिए जान की बाजी लगा देंगे। लेकिन आज बीजेपी ने संविधान की हत्या कर दी है। बहुजन समाज पार्टी, आम आदमी पार्टी, बीजू जनता दल, अन्ना द्रमुक आदि ने सरकार को समर्थन दिया। ज बीएसपी के राज्यसभा सांसद सतीश चंद्र मिश्रा ने कहा, उनकी पार्टी अनुच्छेद तीन सौ सत्तर हटाने का पूरा समर्थन करती है।हम चाहते हैं कि जम्मू-कश्मीर से जुड़े बिल पास हों।
कांग्रेस, पीडीपी,नेशनल कांफ्रेंस आदि पार्टियों की तरह पाकिस्तान में भी परेशानी महसूस की गई। अमित शाह जिस वक्त सदन में राज्य के पुनर्गठन का प्रस्ताव रख रहे थे,उस समय पाकिस्‍तान के शेयर बाजार में वर्ष की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई। पाकिस्तानी शेयर बाजार बेचमार्क इंडेक्स केएस ई सौ लुढ़कर इकतीस हजार सौ के  स्तर पर आ गया। पिछले दो वर्षों में पाकिस्तान शेयर मार्केट का ये सबसे खराब प्रदर्शन है। पुलवामा हमले के समय में शेयर मार्केट में तीन दिन में दो हजार अंक की गिरावट देखी गई थी।
कश्मीर का विशेष दर्जा हटाने का संकल्प राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद अनुच्छेद तीन सौ सत्तर कश्मीर से निष्प्रभावी हो गया है। जम्मू-कश्मीर के लोगों को विशेषाधिकार देने वाला अनुच्छेद पैंतीस -ए भी अनुच्छेद तीन सौ सत्तर के अधीन ही आता है।
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