आमार दीदी, तोमार दीदी, इंदिरा दीदी!

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दयानन्द पांडेय
हालांकि अटल बिहारी वाजपेयी बताते नहीं थकते थे कि उन्हों ने कभी भी इंदिरा गांधी को दुर्गा नहीं कहा । अटल जी कहते थे कि यह भ्रम रोमिला थापर ने लिख कर फैलाया है । वह यह भी कहते थे कि उन्हों ने रोमिला थापर से पूछा कि आख़िर कब और कहां मैं ने इंदिरा जी को दुर्गा कहा तो वह चुप रह गईं । अटल जी ने भले कभी नहीं कहा कि इंदिरा दुर्गा हैं लेकिन जन मानस में यह बात आज भी अंकित है कि अटल जी ने कहा था कि इंदिरा जी दुर्गा हैं । तो शायद इस लिए कि उन्हों ने सचमुच दुर्गा जैसा काम किया था । पाकिस्तान को भारतीय फ़ौज के बूटों तले कुचल कर दुनिया का भूगोल बदल दिया था । बांग्लादेश को जन्म दिया था । यह 1971 का साल था । 16 दिसंबर , 1971 का वह दिन भुला पाना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं है । मैं उस समय 13 बरस का था । स्कूल में था ।
गोरखपुर के सारे स्कूलों , कालजों ने उस 16 दिसंबर को रैली निकाली थी । उस हाड़ कंपाती ठंड में भी हम झूम कर गा रहे थे , सोलह दिसंबर आया ले के जवानी सोलह साल की ! बाद के दिनों में एक कवि सम्मेलन में पंडित रूप नारायण त्रिपाठी का एक गीत भी सुना जिसे उन्हों ने बांग्लादेश से लौट कर लिखा था , आमार दीदी, तोमार दीदी , इंदिरा दीदी ज़िंदाबाद ! तब हम इस गीत को भी खूब गाते थे । आज भी जब-तब गुनगुनाते रहते हैं : आमार दीदी , तोमार दीदी , इंदिरा दीदी ज़िंदाबाद ! जिस इंदिरा के पिता नेहरु ने चीन से , हिंदी-चीनी , भाई-भाई नारे के बीच पीठ में चीन का छुरा सहा था , उसी इंदिरा ने न सिर्फ़ चीन बल्कि पाकिस्तान समेत अमरीका को भी उस की औकात में रखा । इसी लिए वह आयरन लेडी भी कहलाईं । इंदिरा गांधी की विदेश नीति ने भारत का मस्तक सर्वदा ऊपर रखा । कांग्रेस के तमाम चाणक्य लोगों को भी उन्हों ने खूब पानी पिलाया था । चाहे वह कामराज हों या द्वारिका प्रसाद मिश्र या कोई और । उन की हत्या के बाद दिल्ली में जब खौफ़नाक दंगे हुए तब के समय भी मैं दिल्ली में था । उस दंगे और दंगों के कारण की तफ़सील फिर कभी । लेकिन नफ़रत के अलावा इंदिरा गांधी से मुहब्बत की एक इबारत भी थी वह ।
एक इमरजेंसी के तानाशाही के दाग को अगर छोड़ दें तो इंदिरा गांधी ने देश को बहुत कुछ दिया है । बैंकों का राष्ट्रीयकरण , खदानों का राष्ट्रीयकरण , प्रीवीपर्स खत्म करने जैसे कठोर फ़ैसले आसान नहीं थे । हरित क्रांति, आपरेशन फ्लड, पोखरण परमाणु परीक्षण , सिक्किम का भारत मे विलय, कश्मीर से सदरे रियासत और वजीरे आज़म के व्यवस्था की समाप्ति – ये सारे क़दम भी इंदिरा गांधी के खाते मे दर्ज हैं । 1977 में कांग्रेस के घनघोर पतन के बाद भी ढाई साल में ही 1979 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी भी आसान नहीं था । इंदिरा गांधी का राजनीतिक कमाल ही था । उन्हीं दिनों का रघु राय का एक फ़ोटो नहीं भूलता । जिस में एक सफाई कर्मी झाड़ू लगा रहा है , उस के झाड़ू में इंदिरा गांधी की फ़ोटो वाला पोस्टर कूड़ेदान में जाता दीखता है । मतलब इंदिरा गांधी कूड़ा हो चली थीं । खैर ,1977 में दिल्ली के रामलीला मैदान में जब जनता पार्टी मोरारजी देसाई के नेतृत्व में विजय दिवस मना रही थी तो उस में जय प्रकाश नारायण नहीं गए । ठीक उसी समय वह इंदिरा गांधी के घर गए । इंदिरा गांधी को बेटी मान कर । इंदिरा गांधी का हालचाल लेने ।
जय प्रकाश नारायण को चिंता थी कि इंदिरा का काम काज अब कैसे चलेगा ? इंदिरा ने उन से कहा कि खर्च की चिंता उन्हें नहीं है । पापू की किताबों की रायल्टी इतनी आती है कि खर्च तो चल जाएगा । उन की चिंता है कि ख़ाली समय वह कैसे बिताएंगी । जय प्रकाश नारायण ने उन्हें दिलासा देते हुए कहा कि , तुम फिर से जनता के बीच जाओ । जनता से मिलो , जुलो । जनता के बीच काम करो । इंदिरा गांधी ने जय प्रकाश नारायण की बात को मान कर जनता के बीच जाना शुरू कर दिया । मुझे याद है कि 1977 कि 1978 का ही बरसात का कोई महीना था । गोरखपुर के एक पिछड़े मुहल्ले इलाहीबाग में पांच-सात लोगों के साथ इंदिरा गांधी को घर-घर घूमते , लोगों का हालचाल लेते देखा था । मुहल्ले के लड़के उन के पीछे-पीछे घूमते फिरे थे । हम भी थे । आज़मगढ़ से रामनरेश यादव तब सांसद थे लेकिन उत्तर प्रदेश का मुख्य मंत्री बन जाने के कारण उन की संसदीय सीट ख़ाली होने के कारण हुए उपचुनाव में इंदिरा गांधी की मेहनत ने कमाल दिखाया । कांग्रेस की मोहसिना किदवई उप चुनाव जीत गई थीं ।
लेकिन यह दूसरा दौर उन के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण साबित हुआ । हवाई दुर्घटना में संजय गांधी की मृत्यु ने उन्हें तोड़ दिया । पंजाब में खालिस्तान की मांग और आतंकवाद ने उन्हें मुश्किल में डाल दिया । लेकिन फौजी बूटों तले जिस तरह इंदिरा गांधी ने पंजाब के आतंकवाद को ब्लू स्टार आपरेशन कर कुचल कर नेस्तनाबूद कर दिया था , वह आसान नहीं था । वह भले शहीद हो गईं लेकिन पंजाब को आतंक से मुक्त कर गईं । कि आज कश्मीर की तबाही देख कर उन की बहुत याद आती है । कश्मीर को शांत करने के लिए इंदिरा गांधी जैसा कड़ा फ़ैसला लेने वाले की ही ज़रूरत है । कृपया मुझे यह भी कहने दीजिए कि अभी तक के सभी प्रधान मंत्रियों में इंदिरा गांधी सब से शक्तिशाली और समर्थ प्रधान मंत्री साबित हुई हैं । यह मेरा सौभाग्य है कि इंदिरा गांधी से व्यक्तिगत रूप से मिलने और उन की प्रेस कांफ्रेंस कवर करने का अवसर मिला है । उन के साथ जुड़ी बहुत सी स्मृतियां हैं । आज उन के जन्म-दिन पर उन्हें शत-शत नमन !
सरोकारनामा से साभार

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