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    राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रीय सहमति

    By July 10, 2018Updated:July 11, 2018 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    प्रतीकात्मक चित्र
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    अमेरिका यूरोप के विकसित प्रजातांत्रिक देशों में जमकर राजनीति होती है। यहां तक कि एक दूसरे पर निजी हमलों से भी परहेज नहीं किया जाता। लेकिन जब राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न आता है, तब राजनीतिक और पार्टी लाइन समाप्त हो जाती है। यह उनके लिए राष्ट्रीय सहमति का विषय होता है, जिसका किसी भी दशा में उल्लंघन नहीं किया जाता। आतंकवाद के खिलाफ होने वाली प्रत्येक कार्रवाई का विपक्ष भी समर्थन करता है। कभी कोई आपत्ति होती है, तब सरकार की भले ही आलोचना हो, लेकिन सेना के सम्मान का सदैव ध्यान रखा जाता है। वह जानते है कि निर्णय सरकार करती है लेकिन जवान बेहद कठिन परिस्थियों में कार्य करते है। वह देश की सुरक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगा देते है। सामान्य जन से लेकर नेता तक उनका सम्मान तो कर ही सकते है। राष्ट्रीय कर्तव्य की भांति इस परंपरा का पालन किया जाता है।
    ऐसा नहीं की यह केवल अमेरिका और यूरोपीय देशों की परंपरा है। भारतीय प्रजातन्त्र में भी यही होता था। कांग्रेस शासन के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा का कोई मसला आता था, तब उसके कट्टर विरोधी भी समर्थन और सहयोग की भूमिका में आ जाते थे। लेकिन जब से कांग्रेस राहुल गांधी की हुई है, तब से बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। अब राष्ट्रीय सुरक्षा के विषय पर भी राजनीति करने में कोई संकोच नहीं रह गया है। अब किसी केंद्रीय विश्विद्यालय आतंकियों के समर्थन में नारे लगते है तो कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी के शीर्ष नेता वहां पहुंच जाते है। वह यह देखने का इंतजार भी नहीं करते कि वहां किस प्रकार का आयोजन किया जा रहा है।
    जिन आतंकियों के खिलाफ सुरक्षा बल कार्रवाई करते है, उनके प्रति किसी भी प्रकार की हमदर्दी को उचित नहीं कहा जाता। डोकलांम में जब चीन और भारत के सैनिक आमने सामने थे, तब राहुल गांधी चीन के राजदूत से मिलते है। इस मुलाकात को छिपाने का प्रयास किया गया। लेकिन सच्चाई सामने आ गई । तब भी देश को यह नहीं बताया गया कि दोनों में क्या बात हुई। जबकि ऐसे संकट के अवसर पर विपक्ष के नेता को केवल यह कहना चाहिए था कि वह अपनी सरकार के साथ है और चीन को डोकलांम से सैनिक हटाने चाहिए।
    यदि राहुल यह कहते तो फिर कुछ भी छिपाना नहीं पड़ता। लेकिन बात कुछ और रही होगी। इसके पहले कांग्रेस के एक दिग्गज पाकिस्तान में गुजारिश करने गए थे कि आप मोदी को हटाइये। ऐसे कार्य जवानों की अवमानना करते है। सीमाओं की रक्षा करने वाले जवानों को लगना चाहिए कि देश उनके साथ है। इसी प्रकार कानूनी प्रक्रिया के तहत आतंकियों को मिलने वाली सजा पर भी हमारे यहां राजनीति होने लगी है।
    अमेरिका में हवाई अड्डे पर विदेशियों की तलाशी से लेकर बंदी आतंकियों से पूंछताछ के तरीके पर बाहर तो सवाल उठते है। लेकिन अमेरिका और यूरोपीय देशों में इस पर कोई चर्चा नहीं होती। यदि कोई सैन्य अधिकारी जीप के बोनट पर पत्थरबाज को बांध कर अपनी टुकड़ी को सुरक्षित निकलता है तो उसके बुद्धि कौशल की प्रशंसा होनी चाहिए। लेकिन हमारे देश में यह भी राजनीति का मुद्दा हो गया। सेना प्रमुख आतंकियों के खिलाफ बोलते है, तब कांग्रेस के दिग्गज उनकी आलोचना करते है। सर्जिकल स्ट्राइक पर प्रश्न उठाये जाते है। कांग्रेस अध्यक्ष इसे खून की दलाली का नाम देते है। इसी के साथ वोटबैंक की सियासत शुरू हो जाती है। अनेक सेक्युलर नेता इस में कूद जाते है।
    कुछ ने तो सर्जिकल स्ट्राइक पर ही प्रश्न उठा दिया था। वातानुकूलित कक्ष में बैठे हुए उन्हें सैनिकों के पराक्रम का अहसास नहीं हुआ होगा। ऐसे ही लोगों के लिए सेना को सर्जिकल स्ट्राइक का वीडियो जारी करना पड़ा। पहले इस पर विश्वास नहीं था । जब प्रमाण दिया गया तो उस पर राजनीति होने लगी।
     कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर राजनीतिक फायदे के लिए वीडियो जारी करने का आरोप लगाया है। भारतीय सेना ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में घुसकर आतंकियों के ठिकानों को नष्ट कर दिया। भारतीय सेना ने खुद इसकी घोषणा करते हुए इसे सर्जिकल स्ट्राइक नाम दिया और बताया कि उसमें पाकिस्तान में स्थित आतंकियों के लांचिंग पैड ध्वस्त कर दिए गए और उन्हें भारी हानि उठानी पड़ी। सेना द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक पर तब सरकार विरोधी राजनीतिक दलों ने कई सवाल खड़े किए थे। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने उस वक्त केंद्र सरकार पर ‘खून की दलाली’ करने तक का आरोप लगाया था।
    दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल, कांग्रेस नेता संजय निरुपम  ने तो सर्जिकल स्ट्राइक की वास्तविकता पर ही प्रश्न उठाया था। केजरीवाल ने इस सैन्य कार्रवाई का प्रमाण मांगा था। प्रमाण दिया गया तो उस पर भी राजनीति की गई। कांग्रेस ने कहा है कि मोदी सरकार वोट बटोरने के उद्देश्य से सर्जिकल स्ट्राइक के वीडियो दिखा सैन्य बलों एवं सीमाओं की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर रही है। कांग्रेस  प्रवक्ता ने कहा कि पार्टी ने आतंकियों के खिलाफ किये गये सर्जिकल स्ट्राइक और देश के खिलाफ आतंकी मसूबों को ध्वस्त करने के लिए देश की सेना को धन्यवाद दिया था। देशहित में कूटनीतिक और सामरिक निर्णय राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए खामोशी से लिए जाते हैं, छाती पीटने के लिए नहीं। जाहिर है कि कांग्रेस की प्रतिक्रिया को मर्यादा के अनुकूल नहीं कहा जा सकता।
    आज वह सेना को सर्जिकल स्ट्राइक के लिए धन्यवाद देने की बात कर रही है। लेकिन राहुल गांधी, संजय निरुपम के बयान में धन्यवाद जैसा कुछ नहीं था। पार्टी के प्रवक्ता सरकार को सिखा रहे है कि कूटनीतिक व सामरिक निर्णय छुपाए जाते है, छाती नहीं पीटी जाती। बात सही है। सर्जिकल स्ट्राइक की तो किसी को भनक भी नहीं लगी थी। लेकिन उसकी सफलता के बाद जवानों का उत्साहवर्धन होना चाहिए। इस लिए उसकी जानकारी दी गई। कांग्रेस, आप, कम्युनिस्ट आदि पार्टियां इस राष्ट्रीय जिम्मेदारी का पालन करती तो प्रमाण देने की आवश्यकता ही नहीं थी। इस प्रकार विपक्ष ने अपना ही स्तर गिराया है।

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