डॉ दिलीप अग्निहोत्री
कल्याण सिंह का अतीत राम मंदिर आंदोलन के नायक और वर्तमान राजस्थान के संवैधानिक प्रमुख का है। जीवन के इन पड़ावों के बाद उनका किसी जातिवादी सम्मेलन में भागीदारी अजीब लगती है। दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ ने पद की गरिमा के अनुरूप अपना नजरिया व्यापक किया है। इसमें बेशक राम जन्म भूमि पर भव्य मंदिर निर्माण के प्रति आस्था है।इसी के साथ सबका साथ सबका विकास का जज्बा भी है। यही कारण है कि वह अयोध्या में सन्त समागम में शामिल होते है, इसके साथ ही अयोध्या के विकास को भी प्राथमिकता देते है। यह संयोग था कि पच्चीस जून को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अयोध्या में थे, यहां वह संतों के एक कार्यक्रम में शामिल हुए। दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह लगभग इसी समय लखनऊ के एक कार्यक्रम में शामिल हुए। कहने को यह पिछड़ा वर्ग सम्मेलन था, लेकिन इसमें उनके स्वजातीय लोगों का ही जमावड़ा था। बेहतर तो यही था कि बतौर राज्यपाल कल्याण सिंह ऐसे कार्यक्रमों में शामिल होने से बचते। यह कार्य उन्हें अपने पुत्र और पौत्र को सौप देना चाहिए। उनके पुत्र भाजपा के सांसद और पौत्र प्रदेश में राज्य मंत्री है। कल्याण सिंह के लिए यदि इस सम्मेलन में शामिल होना अत्यंत आवश्यक था, तब भी उन्हें संविधान की सीमा में रहकर ही बात करनी चाहिए थी। किन्तु यहां कही गई दो बातों पर आपत्ति की जा सकती है। इसमें आरक्षण समाप्ति की गलतबयानी और झापड़ मारकर आरक्षण छीन लेने का मुद्दा शामिल है।
पहली बात यह कि आरक्षण समाप्त करने की बात बेमानी है। यह झूठ कुछ वीरोधी पार्टियों ने केंद्र की भाजपा सरकार को बदनाम करने के लिए यह शिगूफा छोड़ा था। इनमें वह पार्टियां शामिल रही है जो अपनी सत्ता के दौरान एक जाति विशेष को ही तरजीह देती रही है। आरक्षण को विकृत करने का कार्य ऐसे ही लोगों ने किया। यही कारण है कि आज अति पिछड़ा और अति दलित वर्ग अलग दिखाई देने लगा है। इनको न्याय दिलाने की बात होनी चाहिए। लेकिन यह मांग करना भी जोखिम से कम नहीं है। सुधार की बात होते ही आरक्षण को समाप्त करने का अरोप जड़ जाता है। मतलब आरक्षण का लाभ अब तक वंचित लोगों तक पहुंचाने में जानबूझ कर बाधा पैदा की जा रही है।
कल्याण सिंह ने कहा कि आरक्षण पिछड़ा वर्ग का हक है। अगर कोई इस हक को छीनने की कोशिश करे तो मुट्ठी बांधकर खड़े हो जाना और कोई इस हक को छीन ले तो फिर थप्पड़ मारकर इसे वापस ले लेना। राज्यपाल कल्याण सिंह ने कहा कि मैं संवैधानिक पद पर हूं, इसलिए कोई राजनैतिक बात नहीं करूंगा, लेकिन आप इन शब्दों में राजनीति तलाश लें। मतलब उनके कथन में राजनीति थी। कभी हिंदुओं के लिए गर्जना करने वाले कल्याण सिंह लोध समाज से संघठित होने का आह्वान कर रहे थे। कहा कि लोध समाज के लोगों को राजनीति में सक्रिय रहना चाहिए। टिकट के लिए परेशान नहीं होना, बल्कि अपने हक के लिए आवाज उठाना। अगर आपने इच्छा शक्ति होगी तो कोई भी पार्टी आपके सामने झुक जाएगी।
कल्याण सिंह दो बात साफ करनी चाहिए। उन्हें कुछ अन्य विपक्षी पार्टियों की तरह यह कैसे लगा कि आरक्षण छीना जा रहा है । दूसरा यह कि क्या संविधान थप्पड़ मार कर कोई अधिकार हासिल करने की इजाजत देता है। कल्याण सिंह को ऐसे बयानों से पहले यह ध्यान देना चाहिए था कि वह संवैधानिक पद पर है। राजस्थान में संविधान के पालन को सुनिश्चित करना उनका दायित्व है। लेकिन जब वही हिंसा या थप्पड़ मारने की बात करेंगे तो कैसे काम चलेगा।
दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ के विचार उनको व्यापक भूमिका में ले आये है। अयोध्या में उन्हें संतों से बहुत कुछ सुनना पड़ा। ऐसा लग रहा था जैसे राम मंदिर निर्माण न होने के लिए योगी ही दोषी है। योगी ने शांतभाव से सबकी बात सुनी। संतों का कहना था कि अब तो मेयर से लेकर राष्ट्रपति सब एक ही विचार परिवार के है , तब भी मंदिर निर्माण नहीं हो रहा है।
वैसे यह बात सुनने में अच्छी लगती है कि ऊपर से नीचे तक तक भाजपा की सत्ता है। ऐसे में मंदिर निर्माण शुरू हो जाना चाहिए। लेकिन यहां ध्यान रखना होगा कि फिलहाल केंद्र या राज्य सरकार मंदिर निर्माण का फैसला नहीं ले सकती। यह विषय सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है। दूसरी बात यह कि भाजपा चार वर्ष बाद राज्यसभा में सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। लेकिन आज भी उसका राज्यसभा में बहुमत नहीं है।
योगी आदित्यनाथ महंत नृत्य गोपाल दास के जन्मोत्सव के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए अयोध्या पहुंचे थे। योगी ने संतों को इस मुद्दे पर कुछ समय और धैर्य रखने को कहा। इस संदर्भ में न्यायपालिका का उल्लेख किया। संतों की भावना देश के बहुसंख्य लोगों की भी भावना है। लेकिन मर्यादा का ध्यान रखना है। आज राम जन्मभूमि की बात वह लोग कर रहे हैं, जिन्होंने राम भक्तों पर गोलियां चलवायीं थी। भगवान राम की जन्म भूमि की पिछली सरकारों में जो उपेक्षा हुई है,
जबकि एक साल में अयोध्या को वैश्विक पहचान दिलाने का काम किया गया। इस प्रकार योगी आदित्यनाथ ने व्यापक दृष्टिकोण का परिचय दिया। वह एक सन्त भी है। इस रूप में सन्त समाज और आस्था के विषयों से उनका गहरा जुड़ाव है। वह संवैधानिक पद पर भी है। इस रूप में अपनी सीमा जानते है। इसीलिए वह जहाँ एक ओर सन्त समाज को आश्वस्त करते है , वाहीन दूसरी तरफ अयोध्या के विकास का विश्वास दिलाते है। इस प्रकार योगी एक बड़ी और व्यापक जिम्मेदारी का बखूबी निर्वाह कर रहे है।







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