पंकज चतुर्वेदी
प्रणब दा की बेटी शर्मिष्ठा की आशंकाएं सही साबित हो रही हैं। खेल शुरु हो चुका है. भाई लोग संघ प्रमुख के राषट्रवाद और प्रणब दा के राष्ट्रवाद को एक ही बता रहे हैं। कह रहे हैं कि दोनों ने एक ही बात बोली।
उतना वक्त नहीं है मेरे पास अभी लेकिन अगर दोनों के भाषण का छिद्रान्वेषण कर दूं तो काफी अंतर दिखेगा आपको. संघ की अपनी सोच है और प्रणब मुखर्जी की अपनी सोच, संघ एक संगठन है और प्रणब दा एक व्यक्ति. संघ की नींव आजादी के पहले पड़ गई, जिसे कई लोगों ने अपनी-अपनी विचारधाराओं से सींचा और आगे बढ़ाया। प्रणब मुखर्जी एक व्यक्ति विशेष हैं, जिन्होंने लम्बी राजनीतिक पारी खेली और अपनी एक व्यक्तिगत राय बनाई. संघ ने प्रणब दा की राय सुनने के लिए उन्हें अपना मंच दिया, ये नहीं कहा कि हमारी बात बोलिए या फिर आपकी बात को हम मानेंगे।
हां, संघ प्रमुख मोहन भागवत ने ये जरूर कहा कि हम अलग-अलग विभूतियों के ये मंच देते हैं, उनकी बात सुनते हैं और आवश्यकतानुसार मनन करके अगर वो उपयोगी हो, तो उसे अपनाते भी हैं।
सो कल संघ प्रमुख भागवत जी और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब दा के भाषण बिल्कुल अलग थे. पूरी सोच अलग थी। हां, ये दोनों ने कहा कि सबको साथ लेकर चलना है, यही भारतीयता है पर संघ की एक अपनी पुरातन सोच रही है, एक अपना मंथन रहा है. उसे प्रणब मुखर्जी की सोच से मिलाना ठीक नहीं।

इसलिए जो लोग संघ प्रमुख और प्रणब मुखर्जी का भाषण एक बता रहे हैं और दोनों की सोच एक बता रहे हैं, वे जाने-अनजाने संघ की पीठ पर ही छुरा घोंप रहे हैं. ये हो नहीं सकता कि कोई बाहरी प्रणब एक दिन में संघ की पूरी सोच को अपना ले और ये भी नहीं हो सकता कि संघ, प्रणब दा की बात सुनकर अपनी मूल फिलॉसफी में रातोंरात बदलाव कर दे।
परिवर्तन संसार का नियम है लेकिन ये अचानक नहीं हो जाता. इसमें समय लगता है। कल को प्रणब दा नहीं रहेंगे पर संघ रहेगा। इसलिए संघ और किसी बाहरी व्यक्ति की विचारधाराओं का घालमेल ना करें। दोनों एक-दूसरे को सुन रहे हैं, एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यही बहुत है। वरना कांग्रेस ने कोई कसर नहीं छोड़ी कि प्रणब दा संघ के मंच पर ना जाएं। और संघ ने भी प्रणब दा को बुलाकर रिस्क लिया, बड़ा दिल दिखाया।
क्या ही अच्छा हो कि कल कांग्रेस, संघ प्रमुख को अपने किसी कार्यक्रम में बुलाए और उनसे संवाद करे, और वो भी क्या दिन हो, जब संघ कांग्रेस की सोनिया गांधी को अपने कार्यक्रम में बुलाए और उन्हें बोलने का अवसर दे।
लेकिन आज जब कांग्रेस की पूरी राजनीति ही संघ के विरोध पर आ टिकी है और संघ के राजनीतिक प्लेटफॉर्म बीजेपी ने कांग्रेस मुक्त भारत का सपना देख लिया है, तो संवाद की जगह फिर कहां रह जाती है ??!!
पर एक बात तय है। इस देश में अशोक और महात्मा गांधी वही बन पाएगा, जो हिंसा का त्याग करके अहिंसा को अपना ले और कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति के बारे में सोचे, अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता में कतार के इंसानों से भेदभाव ना करे। जो ऐसा करेगा, वो इतिहास में भुला दिया जाएगा। सूरज बनना है तो हर जगह अपनी धूप डालनी होगी। अंटार्टिका के बर्फ पर भी और सहारा के रेगिस्तान पर भी और अमेजन के जंगलों पर भी। तभी आपको लोग दुनिया को रोशनी देने वाला बोलेंगे। कमरे का बल्ब बनेंगे तो एक समय बाद फ्यूज होकर कूड़े में फेंक दिए जाएंगे।







