जी क़े चक्रवर्ती
गुरुपूर्णिमा कारगिल सहीद दिवस के बाद आइये पुनः लौटते है देश में होने वाली आगामी चुनावी हलचलों के हरकतों की ओर वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए, मौजूदा समय मे देश की सबसे बड़ी दो राजनीतिक पार्टियों की चुनावी रणनीतियां धीरे-धीरे निकल कर सामने आने लगी है। इसमे एक बात तो बिलकुल स्पष्ट है कि आगामी चुनाव देश के दो राष्ट्रीय पहचान वाले व्यक्तित्वों के मध्य लड़ा जाने वाला है। एक ओर जहां देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी होंगे, तो दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी होंगे।अभी कुछ ही दिनों पहले कांग्रेस पार्टी ने घोषणा की थी कि उनकी ओर से राहुल गांधी ही देश के आगामी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे, लेकिन बहुत जल्दी ही देश के अन्य दो पार्टियों एक ममता बनर्जी की कांग्रेस आई (I) और दूसरी पार्टी बसपा की मायावती बहुत शीघ्र मोदी से मुकाबले के लिए चुनावी मैदान में कमर कसते दिखेंगी। कांग्रेस पार्टी की इस तरह की घोषणा से जहां विपक्षी दलों में बनी एकजुटता की सहमति खत्म हो गई कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का फैसला चुनाव होने के पश्यचात किया जाएगा। मौजूदा समय मे पीएम पद की दावेदारी के लिए राहुल को समर्थन नही मिलता देख कांग्रेस पार्टी अब अपने कदम पीछे खींचना शुरू कर दिया है वहीं उसने यह संकेत भी देदिया कि विपक्षियों में केवल आरएसएस समर्थित को छोड़ कर कोई भी चेहरा उसे स्वीकार होगा।

लोकसभा में तेलुगु देशम के अविश्वास प्रस्ताव पर राहुल गांधी अपने भाषण में एक नहीं दो कदम आगे बढ़ाते हुए दिखे जरूर लेकिन उसके बाद उन्होंने अपने कदम वापस खींच लिए। भाजपा की ओर से राहुल की आलोचना तो विपक्ष की स्वाभाविक प्रतिक्रिया कहलायेगी, लेकिन स्वमं कांग्रेस के ही सहयोगी दल और कांग्रेस के भीतर ही राहुल के खिलाफ आवाजें उठती हुई दिखायी देने लगी। यदि हम बीते कुछ दिनों के घटनाक्रम पर ध्यान दें तो पिछले 20 जुलाई को अविश्वास प्रस्ताव आया और 126 के मुकाबले 325 के बहुमत वह गिर गया। वहीं पर अगले ही दिन कोलकाता में ममता ने इस बात को लेकर हुंकार भरते हुये उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में आने का संकेत दे डाला। उन्होंने इस बात घोषणा करते हुऐ कहा कि वे 19 जनवरी को कोलकाता में पचास लाख लोगों की रैली निकलने वाली हैं जिसमे सोनिया गांधी सहित सभी विपक्षी नेताओं को आमंत्रित भी करेंगी। ममता की इस पहल से कांग्रेस पार्टी चौकन्ना होते हुये उसने अगले ही दिन कांग्रेस कार्यसमति की बैठक बुला ली। जिसमे यह फैसला हुआ कि आगामी वर्ष 2019 में होने वाले चुनाव में राहुल गांधी ही उनके पार्टी की ओर से पीएम पद के उम्मीदवार होंगे।
इस तरह तमाम कोशिशों के बावजूद आगामी लोकसभा चुनाव में मोदी और राहुल के मध्य मुकाबला होना तय सी बात है।
देश मे आगामी वर्ष में होने वाले चुनाव में प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल होने जा रही तीसरी उम्मीदवार मायावती अपने राजनीतिक अस्तित्व को बनाये रखने के लिए जूझती हुई दिखायी दे रहीं हैं। वर्ष 2012 में सत्ता से बाहर रहने और वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में एक भी सीट न मिलने के बाद वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में केवल 19 सीटें आने से पार्टी के अंदर खलवली मची हुई थी लेकिन उत्तर प्रदेश में सपा से गठबंधन कर और उपचुनाव में उसका समर्थन करके उन्होंने पार्टी के अंदरूनी उलझनों जैसी बातों को रोक दिया। उनके द्वारा गठबंधन करने वाली बात से जहां उनका तात्कालिक लक्ष्य पूरा हो गया इसीलिए कैराना एवं नूरपुर चुनाव में हुई जीत पर उन्होंने किसी भी प्रकार का बयान नही देने और अखिलेश यादव से न मिलने के बावजूद मायावती देश भर में गठबंधन के लिए तैयार होने का संकेत पहले ही दें चुकी हैं। लेकिन यहां यह प्रश्न उठता है कि क्या दूसरे भी इसके लिए तैयार हैं?
देश के आगामी प्रधानमंत्री पद के इन तीन दावेदारों में राजनीतिक एवं प्रशासनिक अनुभवों में यह दिनों ही महिला नेताएं सबसे आगे हैं। बसपा की मायावती पार्टी कार्यकर्ती के स्तर से निकल कर आयीं हैं वहीं पर देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री भी रह चुकी हैं। ऐसे राजनीतिक माहौल में जब सभी को दलित वोटों की आवश्यकता है, वह स्वमं दलित वर्ग की हैं। वहीं दूसरी ओर ममता बनर्जी मौजूदा वक्त में देश की एकमात्र नेता ऐसे हैं जो बिना किसी राजनीतिक गुरु के यहां तक पहुंचने में कामियाब हुई हैैं और वह लगातार सात वर्षों से पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री पद संभाले हुये हैं। वहीं पर यदि हम राहुल गांधी की बात करें तो वे वर्तमान समय मे जो कुछ भी हैं अपने पारिवारिक विरासत के कारण ही हैं। उन्हें न तो अपने जीवन काल में राजनीतिक संघर्ष करना पड़ा और नही उन्हें किसी भी तरह के प्रशासनिक एवं राजनीतिक अनुभव है।
चुनावी राजनीति गणित में अभी वे अनभिज्ञय नेता है किसी भी नेता की सबसे बड़ी कावलियत उसके वोट हासिल करने क्षमता से किया जाता है। ममता बनर्जी एवं मायावती दोनो नेता यह साबित कर चुकी हैैं कि वे इसमे पूरी तरह से सक्षम है। यह जाहिर सी बात है कि मोदी के लिए इन दोनो राष्ट्रीय पहचान रखने वाले नेताओं की अपेक्षा राहुल गांधी के खिलाफ लड़ना सबसे आसान साबित होगा।
राहुल गांधी के प्रधानमंत्री पद के लिए पार्टी का एक तरफा फैसला विपक्षी गठबंधन के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा साबित हो सकता है। राहुल गांधी के चुनावी मैदान में उतरने से भाजपा पार्टी मोदी को अनायास ही वंशवाद और भ्रष्टाचार जैसे चुनावी मुद्दे मिल जाएंगे। केंद्र से संप्रग सरकार को गए आज चार साल हो गए हैं, लेकिन भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस की विश्वसनीयता आज वर्तमान समय तक संदिग्ध बनी हुई है।
आगामी लोकसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी के सामने बहुत बड़ी चुनौती यह है कि सभी विपक्षी दलों को एक छत्र के नीचे लाना, लेकिन उनकी उम्मीदवारी की घोषणा जैसी बातों पर देश के सभी दलों की चुप्पी इस ओर संकेत है कि उन्हें राहुल का नेतृत्व कतई स्वीकार नहीं है।
मायावती को उत्तर प्रदेश का मतदाता पिछले तीन चुनावों में नकार चुकी है ऐसी अवस्था मे क्या देश उन्हें प्रधानमंत्री पद के एक दावेदार के रूप में स्वीकार कर पायेगा? रह गई बात तीनों दावेदारों की जिसमे से ममता बनर्जी एकमात्र ऐसी नेता हैं जिनकी मजबूत पकड़ अपने प्रदेश के मतदाताओं पर बनी हुई है लेकिन वहीं पर पश्चिम बंगाल के बाहर उनकी पार्टी का भी कोई जनाधार नहीं है।
वहीं पर जब हम राहुल गांधी की बात करें तो यह बताने की कोई आवश्यकता नहीं है कि जिस प्रदेश से वे और सोनिया गांधी लोकसभा में हैं यानी उत्तर प्रदेश की विधानसभा में कांग्रेस के महज सात ही विधायक हैं। जब ये तीनों नेता मोदी के सामने चुनावी मैदान में होंगे तो देश के मतदाता को यह तय करना पड़ेगा कि क्या वह मोदी के स्थान पर इनमें से किसी नेता के हाथों देश की बागडोर सौंपना पसंद करेंगे?
खैर जो भी हो यह तो आने वाला भविष्य ही तय करेगा कि किसके हाथों में देश की बागडोर होगी?







