जी क़े चक्रवर्ती
किसी भी देश को अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए सेना जैसे बल की आवश्यकता होती है ठीक उसी तरह उसके आंतरिक मामलों में चोरी, डकैती, भस्टाचार और समाज मे फैलने वाले अनेको अनैतिक कार्यो को रोकने के लिए एक बल के रूप में पुलिस कार्य करती है। हमारे देश मे कुल मिलाकर छह तरह की पुलिस है, जिसमें डंडाधारी पुलिस से सशस्त्र पुलिस तक एवं सेना की पुलिस से लेकर औद्योगिक पुलिस तक है। इसके अलावा भारत और तिब्बत की सीमा पर रखवाली करने के लिए “तिब्बत सीमा पुलिस” जिसका काम भारतीय सेना जैसा काम करने वाली एक पुलिस बल है। पुलिस (Police) का हिंदी में अर्थ आरक्षी होता है।भारत देश की पुलिस संविधान के नियम-कानून की पालन करवाने एवं कानूनी व्यवस्था को समाज मे चुस्त-दुरुस्त बनाये रखने के लिए इसका उपयोग होता है। ऐसी स्थिति में इस बल के भ्रस्टाचार, गलत आचरणों एवं समाज के साधारण आम व्यक्तियों से किये गये व्यवहारों के कारण पुलिस की छवि अत्यंत खराब होने से समाज की आम जनता पुलिस सहायता लेने के लिए उसके पास तक जाने तक यहां तक की बात भी करने से कतराती हैं।
भारत मे सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद इस घटना को ब्रिटिश संसद ने गम्भीरता से लेते हुये ईस्टइंडिया कम्पनी के हाथों से भारत का शासन छीन लिया गया था। सन 1858 में एक चार्टर द्वारा भारत के राज्यों का अधिग्रहण कर लिया गया और महारानी विक्टोरिया ने भारतीय क्षेत्र में रहने वाले लोगों को ब्रिटिश प्रजा घोषित कर दिया। भारत का शासन अंग्रेजी कानून के अनुसार चले इसलिये सन 1860 में I.P.C, Cr.P.C और पुलिस एक्ट लागू किये गये जिनके अनुसार सिविल, दीवानी और आपराधिक मामलों की सुनवाई एवं सजा आदि का प्रावधान किया गया।
जनता के द्वारा सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन आदि के विरोध जैसी स्थितियों को दबाने के लिये पुलिस बल के प्रयोग को छूट दी गई और पुलिस का उपयोग सरकार और अंग्रेजों के हितों की रक्षा के लिए किया जाता था। सन 1947 में आजादी के बाद शासन संस्थान जिसमे राजनेता एवं सरकारी तंत्र की रक्षा करने में पुलिस पुराने नियम कानून तौर तरीके का उपयोग हमारे नेताओं को अपने लिए हितकर लगा इसलिये पुलिस कानून (Act) के पुराने प्रवधान आज तक देश मे लागू हैं। देश के आजादी के उपरान्त भी पुलिस सरकार एवं राजनैतिक नेताओं के प्रति जवाबदेह बनी हुई है।
इस विभाग के विशेष कर पुलिस अधिकारी जैसे लोगों के अपने निहित स्वार्थों के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों व राजनेताओं से अपनी निकटता बढ़ा कर अपने सम्बन्ध प्रगाढ़ कर लेते हैं । वास्तव में अधिकतर राजनेता सांसद अपने क्षेत्र में उनके इशारों पर काम करने वाले थाना अध्यक्षों की नियुक्त करवाने की जुगत में लगे रहते हैं। वास्तव में वे चाहते हैं कि प्रदेश की पुलिस उनकी मुठ्ठी में रहे, इन्ही कारणों से पुलिस के अधिकारी भी राजनेताओं का संरक्षण पाने के लिए हमेशा लालायित रहते हैं। ऐसी अवस्था में पुलिस समाज के आम साधारण लोगों के हितों की रक्षा करने में कहाँ तक सफल होगी यह बात आसानी से समझी जा सकती है। अक्सर यह देखने मे आता है कि किसी राजनेता के कहने पर पीड़ित व्यक्तियों के FIR तक दर्ज करने में पुलिस हीलाहवाली करती रहती हैं। इसके ताजे उदाहरण स्वरूप देश के उत्तर प्रदेश राज्य के उन्नाव जिले के सांसद कुलदीप सिंह सेंगर द्वारा किये गये कृत्यों में पुलिस से गठजोड़ होने की बात सबके सामने निकल कर आई है।
आज वर्तमान समय मे पुलिस कार्य प्रणाली की व्यापक स्तर पर जांच-पड़ताल अवश्य होनी चाहिए और पुलिस जैसी है वैसी क्यों बनी है, इस प्रश्न पर देश के जगरुख एवं जिम्मेदार लोगों को गहराई से चिन्तन-मनन कारना चाहिए। अभी कुछ वर्ष पहले प्रकाश सिंह द्वारा पुलिस सुधार के लिए लंबी लड़ाई लड़ते हुए कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका पर दीये गये अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2006 में पुलिस सुधार के लिए केंद्र व प्रदेश सरकारों को विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किये हैं।
कोर्ट ने केंद्र एवं सभी राज्यों को यह आदेश दिया कि वे कहीं भी कार्यकारी DGP (डायरेक्टर जरनल ऑफ पुलिस) (कहीं-कहीं कमिश्नर ऑफ पुलिस भी कहते हैं ) की नियुक्त नहीं करेंगे। इसके विपरीत कदम उठाना सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन होगा इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य में इस पद के रिक्त होने से तीन महीने पूर्व संघ लोक सेवा आयोग ( UPSC) को उच्च कोटि के IPS अफसरों की सूची भेजेंगे। और आयोग उनमे से अधिकारियों के नाम चुन कर उसकी सूची राज्य को भेजेगी फिर राज्य उसी अफसर को DGP बनाएंगे जिसका कार्यकाल दो साल से अधिक का समय शेष होगा। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान AG के वेणुगोपाल ने कोर्ट को बताया कि ज्यादातर राज्य में रिटायर होने की कगार पर पहुंचे अफसरों को कार्यकारी DGP के पद पर नियुक्त कर देते हैं और फिर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देकर उन्हें नियमित DGP बना देते हैं, जिसके कारण उस अफसर को दो वर्षों का अधिक कार्यकाल मिल जाता हैं। इस तरह से वह अधिकारी राज्य के मंत्री के कृपा पात्र बन जाते हैं।
देश के केवल तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना एवं कर्नाटक जैसे पांच राज्यों ने ही वर्ष 2006 के सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के अनुसार अपने राज्य में DGP के पद पर अधिकारी को नियुक्ति करने के लिए “संघ लोक सेवा ” UPSC से अनुमति ली है, जबकि देश के बाकी 25 राज्यों ने येसा नहीं किया। कार्यकारी DGP नियुक्त नहीं करेंगे फिर भी येसा कदम उठाना सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का सरासर उल्लंघन है। इस आदेश के अनुपालन में कोर्ट ने कहा कि राज्य कोर्ट के आदेशों का दुरुपयोग कर रहे हैं।
सामान्यत: ‘पुलिस व्यवस्था’ से तात्पर्य ऐसी व्यवस्था से है जिससे अपराधियों को सजा मिले और समाज के निर्दोष व्यक्तियों को न्याय मिल सके। लेकिन वर्तमान समय में पुलिस अपना उत्कृष्ट स्वरूप को खो चुकी है। जिसके अनेको कारण हैं। इसीलिए पुलिस प्रणाली में बदलाव किये जाने की चर्चएं थोड़े-थोड़े समय अन्तरालों पर लगातार उठती रहती है।
आखिरकार हमारे देश की जनता के अनुरूप, आकांक्षाओं और पुलिस की कारगुजारी में इतना बड़ा अन्तर क्यों है?
जिनके प्रमुख कारणों में से पहले कारण तो यही है कि पुलिस समाज के लोगों के साथ एक अपराधियों जैसा व्यवहार करती है । उसकी यह भूमिका कई बार अतिरेकपूर्ण हो जाने से इसका गलत प्रभाव लोगों में पड़ता है। जिससे व्यक्ति पुलिस से डरी हुई होती है मौजूदा समय मे पुलिस की विकृत छवि का दूसरा सबसे प्रमुख कारण सामाजिक एवं प्रसाशनिक पहलू दोनों ही समान रूप से जिम्मेदार है।
नेताओं को पुलिस की आवश्यकता पड़ने पर वे उनके काम आये यह सुविधाजनक लगता है और पुलिस अपने राजनैतिक आकाओं को खुश रखती हैं कियूंकि वह उनके प्रति जबावदेह है और उनके स्थानांतरण, नियुक्ति एवं पदोन्नति जैसे प्रशासनिक व्यवस्थाएं सत्तासीन नेताओं के हाथ मे होने से पुलिस खुलकर जनता के हित मे काम नही कर पाती है। यह गठजोड़ समाज के लिए बहुत घातक सिद्ध हो रहा है। जिसके कारण भष्टाचार से लेकर अनैतिक क्रियाकलापें शासन, प्रशासन एवं समाज मे व्याप्त हैं जो न्याय की भावनाओं के विपरीत हैं।
भष्ट्राचार ऊपर से शुरू हो कर निचले स्तर तक पहुंचती है। यदि पुलिस के प्रमुख पद पर या क्षेत्रीय स्तर के अधिकारी यदि नेताओं के दबाव में रहेंगे या उनके कृपापात्र होंगे तो निश्चित रूप से इसका असर पूरे विभाग पर पड़ना तय है। हमारे देश की अनुशासित पुलिस सरकारी शक्तियां प्राप्त ऐसा सगठन है, जिसे समाज में कानूनी व्यवस्था बनाये रखने का कर्तव्य के साथ ही साथ शांति बनाये रखने के लिए उसे उसी अनुपात में पर्याप्त अधिकार मील हुये हैं।
भारतीय पुलिस एक्ट पैदल चलने वाली पुलिस के लिए एक सौ चौबीस साल पहले बनाया गया था और आज जब पुलिस की दुनिया में जिप्सी कारों, पेजरों, मोबाइल फोनों और वायरलैस सेटों से संपन्न हो चुकी है, लेकिन उसका कानून अब भी सवा सौ साल पुराना है।
बहुत दूर जाने की आवश्यकता नही है दिल्ली जैसे देश की राजधानी तक के कई थानों मे आज भी पुलिस रिपोर्ट उर्दू में लिखी जाती है और जब वह देवनागरी में लिखी जाती है उस समय उसमें उर्दू के तमाम अप्रचलित शब्द होते हैं जिनके अर्थ सिवा लिखने वाले के अतिरिक्त कोई और नहीं जान-समझ पता है।
पुलिस का चूंकि कोर्ट से ही मतलब और वास्ता पड़ता है, आज वर्तमान समय तक ऐसे कई शब्दों का प्रयोग आपके सामने भी आये होंगे, जो शायद ही आपके समझ मे आता हो। जैसे- जिरह, मुल्तवी, इस्तगासा, जिरह, तलवी इत्यादि । वर्ष 1860 में बनी आईपीसी (indian penal code) की भाषा आज भी प्रयोग हो रहे है जबकि वर्तमान समय मे दुनिया भले ही 4जी के जमाने में जी रही हो, लेकिन भारत का पुलिस महकमा अभी भी एक सौ पचास वर्षों से इन शब्दों और तौर-तरीकों के साथ चल रहा है, जो किसी जमाने में हिन्दुस्तान की आम भाषा और जुबान हुआ करती थी।
कोर्ट एवं पुलिस अभी भी अपराध को उर्दू में गुनाहे किताब लिखती है। संदेशवाहक को प्यादा लिखा जाता है।
इन सभी कारणों से हमारे यहां न्याय का शासन नही स्थापित हो पाता है। दुनिया के अन्य स्वतंत्र देशों की तरह भारत देश की पुलिस सरकारी राजनेताओं के प्रति जबावदेह न होकर जनता के प्रति जबावदेह होना चाहिये। लोकतंत्र में जनता ही मालिक है और जिस सरकारी खजाने से पुलिस को वेतन दिया जाता है वह रुपये देश के जनता के गाढी कमाई के ही रुपये हैं।







