डॉ दिलीप अग्निहोत्री
विपक्ष के औपचारिक गठबन्धन से पहले अपना अपना महत्व दिखाने का प्रयास चल रहा है। असम में घुसपैठियों के मसले पर तृणमूल मुखिया ममता बनर्जी नई दिल्ली आ गई थी। यह अन्य दलों के ऊपर अपनी अहमियत दिखाने का उनका प्रयास था। लेकिन सफल नहीं हुआ। क्योकि मुद्दे में कोई दम नहीं थी। इसके अलावा अन्य दलों ने उनकी चाल समझ ली थी। धीरे धीरे लोग किनारा करने लगे। ममता बनर्जी वापस कोलकाता चली गई। इसके बाद मोर्चा संभालने राजद उत्ताधिकारी तेजस्वी यादव आ गए। उन्होंने नई दिल्ली के जंतर मंतर में मुज्जफरपुर घटना के विरोध में धरना प्रदर्शन आयोजित किया था।इसमें कोई संदेह नहीं मुज्जफरपुर की घटना विभत्स थी। यह राक्षसी कृत्य था। दोषी को कठोरतम सजा मिलनी चाहिए। राज्य सरकार की सिफारिश पर इसकी सीबीआई जांच चल रही है। ऐसे में इस पर सियासत की भी एक मर्यादा होनी चाहिए थी। तेजश्वी यादव ने धरने के पहले कहा था कि यह राजनीति से ऊपर होगा। उन्होंने अपील में मानवतावादी दृष्टिकोण दिखाया था। लेकिन ऐसा हो नहीं सका। यहां यहाँ मौजूद सभी नेता एक दूसरे से बढ़त बनाते हुए दिखाई दिए।
मुजफ्फरपुर कांड पर बिहार की नीतीश सरकार के खिलाफ शनिवार को राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर समूचा विपक्ष एकजुट दिखाई दिया। आरजेडी नेता तेजस्वी यादव के धरने के समर्थन में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, लेफ्ट के नेता डी. राजा, सीताराम येचुरी, तृणमूल के दिनेश त्रिवेदी शरद यादव, संजय सिंह, जीतनराम मांझी का भाषण हुआ। इनकी नजर पीड़ितों के प्रति नहीं आगामी आम चुनाव पर थी। प्रयास था कि गठबन्धन का सन्देश भी चला जाये। धरने को राजनीति से ऊपर रखने की बात भृमित करने वाली थी।
मुजफ्फरपुर में बेसहारा लड़कियों के लिए बने आश्रय गृह में चौतीस नाबालिग लड़कियों से रेप का मामला सामने आया। इसमें तीन बच्चियों की मौत की बात भी कही जा रही है। इस बालिका गृह का संचालन ब्रजेश ठाकुर है। घटना में कितने लोग शामिल थे, सीबीआई इसकी जांच कर रही है।
यह संवेदनशील घटना ऐसी नहीं थी, जिस पर महागठबंधन की रूपरेखा का प्रदर्शन किया जाता। शायद यही सोच कर अनेक विपक्षी पार्टियों के प्रमुख नेता इसमें शामिल नहीं हुए । राहुल गांधी की बात अलग है। वह तो जेएनयू के उत्पात में भी चले जाते है। इसमें पूरा फोकस बिहार की चुनावी रणनीति तक सीमित था। तेजस्वी यादव और राहुल गांधी ने जम कर राजनीतिक भाषण दिए। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर खूब हमले हुए। भाजपा यहां गठबन्धन में शामिल है, इस पर भड़ास निकाली गई। यहाँ तक गनीमत थी। लेकिन राहुल गांधी यहां भी अपने अंदाज में बोले। कोई सीमा नही, कोई आधार नही, वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को घसीट लाये। कहा कि एक तरफ भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ है, तो दूसरी तरफ पूरा हिंदुस्तान खड़ा है। यह आगे भी पूरे देश को दिखाई देगा। पिछले चार वर्षों में जो कुछ भी हुआ है वह किसी को भी अच्छा नहीं लगा। देश में अजीब सा माहौल हो गया है। जो भी कमजोर, दबा हुआ है चाहे वह महिला हो, छोटा दुकानदार हो या दलित सबपर आक्रमण हो रहा है। हम देश के लोगों को बताना चाहते हैं कि हम देश के कमजोर लोगों के साथ खड़े हैं।राजनीति से ऊपर रहने के नाम पर बुलाये गए इस धरना प्रदर्शन में चुनावी अस्त्र चलाये गए। सरकार व सत्तारूढ़ पार्टी, गठबन्धन तक यह सब सीमित रहता तब भी गनीमत थी। लेकिन इसमें देश की प्रतिष्ठा का भी नेताओं ने ध्यान नहीं दिया। राष्ट्रीय राजधानी में विदेशी मीडिया की भी मौजूदगी में बताया जा रहा था कि पूरे देश में ऐसा हो रहा है। ऐसी राजनीति से बचने की आवश्यकता है। ऐसी बातों से इन नेताओं ने अपनी ही मर्यादा कम की है। पता नही किस दिव्यदृष्टि से इन्हें पता चला कि एक तरफ संघ और भाजपा है, दूसरी तरफ पूरा देश है। यदि ऐसा है तो गठबन्धन के लिए इतनी हायतौबा क्यों है।







