आदिवासी बोलियां विलुप्ति के कगार पर

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पंकज चतुर्वेदी

बोलियां कैसे गुम हो जाती हैं? इसे समझने के लिए बस्तर पर्याप्त है। हिंसा-प्रतिहिंसा के बीच लेागों का पलायन हुआ और नए जगह बसने पर उनकी पारंपरिक बोली पहले कम होती हुई और फिर गुम हुई। एक बोली के लुप्त होने का अर्थ होता है उसके सदियों पुराने संस्कार, भोजन, कहानियां, खानपान सभी का गुम हो जाना। बारूद, बंदूक से बेहाल बस्तर में आंध्र प्रदेश से सटे सुकमा जिले में दोरला जनजाति की बड़ी संख्या है। उनकी बोली है दोरली। बोली के मामले में बड़ा विचित्र है बस्तर। वहां द्रविड़ परिवार की बोलियां भी है, आर्य कुल की भी और मुंडारी भी। उनके बीच इतना विभेद है कि एक इलाके का गोंडी बोलने वाला दूसरे इलाके की गोंडी को भी समझने में दिक्कत महसूस करता है। दोरली बोलने वाले वैसे ही बहुत कम हुआ करते थे, पिछली जनगणना में शायद बीस हजार। फिर खून खराबे का दौर चला, पुलिस व नक्सली दोनों तरफ से पिसने वाले आदिवासी पलायन कर आंध्र प्रदेश (अब तेलंगाना) के वारंगल जिले में चले गए। जब वे लौटे तो उनके बच्चों की दोरली में तेलुगू का घालमेल हो चुका था।

ब्रिटिश नृशास्त्री ग्रियर्सन की 1938 में लिखी गई पुस्तक ‘माड़िया गोंड्स ऑफ बस्तर’ की भूमिका में एक ऐसे व्यक्ति का उल्लेख है जो बस्तर की 36 बोलियों को समझता-बूझता था। जाहिर है कि आज से अस्सी साल पहले वहां कम से कम 36 बोलियां तो थी हीं। सभी जनजातियों की अपनी बोली, प्रत्येक हस्तशिल्प या कार्य करने वाले की अपनी बोली।

गोंडी का अर्थ कोई एक बोली मात्र से नहीं है। घोटुल मुरिया की अलग गोंडी तो दंडामी और अबूझमाड़िया की गोंडी में अलग किस्म के शब्द। उत्तरी गोंडी में अलग भेद। राज गोंडी में छत्तीसगढ़ी का प्रभाव ज्यादा है। इसका इस्तेमाल गोंड राजाओं द्वारा किया जाता था। 1961 की जनगणना में इसे बोलने वालों की संख्या करीब 12 हजार थी और आज यह घट कर 500 रह गई है। चूंकि बस्तर भाषा के आधार पर गठित तीन राज्यों महाराष्ट्र, ओड़िशा, तेलंगाना (तब आंध्र प्रदेश) से घिरा हुआ है, सो इसकी बोलियां इन राज्यों की भाषा से अछूती नहीं है।
बस्तर में बारूद की गंध ने पलायन, विस्थापन, प्रकृति संहार को तो आमंत्रित किया ही है, सबसे बड़ा संकट यहां की आदिवासी अस्मिता के बीज यानी बोलियों के समक्ष खड़ा हो गया है। एक तरफ बाजार का प्रवेश तो दूसरी ओर विस्थापन का दंश तो तीसरी तरफ आधुनिक शिक्षा का दबाव, देखते ही देखते कई बोलियां अतीत हो गईं, कई के व्याकरण गड़बड़ा गए और कई ने अपना मूल स्वरूप ही खो दिया।

1960 के दशक तक यहां कोई 36 बोलियां थीं। वर्ष 1910 यानी आज से 107 साल पहले का भूमकाल विद्रोह शायद ही किसी को याद हो जब बस्तर की सबसे ज्यादा बहादुर समङो जाने वाली धुरबा जनजाति ने अपनी संस्कृति की रक्षा के सवाल पर अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाए थे। उस विद्रोह को अंग्रेजों ने इस निर्ममता से कुचला कि शौर्य का प्रतीक माने जाने वाले धुरबा आदिवासियों का जल-जंगल-जमीन का हक समाप्त हो गया। आज धुारबा शहरों में मजदूर बन कर रहा गया है और धुरबी बोली इलाके की संकटग्रस्त बोली बन गई है। दरभ, छिंदगढ़ के अलावा सीमा से सटे कोई 80 गांवों में धुरबा लोग बचे हैं। लेकिन उनकी पारंपरिक बोली अस्तित्व का संकट ङोल रही है। बस्तर की बोलयां तीन परिवार में बंटी हैं- आर्यन, द्रविड़ और मुंडारी। मुंडारी समुदाय की बोली गदबा लगभग विलुप्त हो गई है। आर्य कुल की बोली में सबसे ज्यादा प्रचलन हल्बी का है। उसके बाद भतरी। नोताकानी, मिरगानी, चंडारी जैसी बोलियां खड़ी हिंदी और हल्बी के प्रचलन में पहले घुली-मिलीं, फिर उन्हीं में समा गई।

कुल मिला कर देखें तो आज बस्तर के शहर-कस्बों में हल्बी और भतरी ही बची है। जबकि दुर्गम आंचलिक क्षेत्रों में गोंडी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। असल में बस्तर में बोलियों पर संकट का प्रारंभ हुआ, आधुनिक विकास की अवधारणा के साथ। बस्तर में बाहरी यानी नेपाली से लेकर मैथिल और बुंदेली से लेकर गुजराती तक सदियों से बसते रहे और वहां की लोक संस्कृति में ‘तर’ कर बस्तरिया बनते रहे। हां, इन लेागांे ने कभी लोक जीवन में घुसपैठ या उनके इलाकों में दखल का प्रयास नहीं किया। वैश्वीकरण के चलते अधिक से अधिक प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की प्रवृत्ति ने आदिवासियों और सरकार के बीच टकराव उत्पन्न किया और उसके गर्भ से नक्सली उपजे।

आज भी हजारों आदिवासी कैंप यानी सुरक्षा बलों द्वारा स्थापित कालोनियों में रहते हैं। एक तो उनमें मिश्रित जनसंख्या होती है और दूसरा ऐसे आवास उनकी पुश्तैनी प्रकृति के साथ जीवन की नीति के अनुरूप होते नहीं हैं। पहले उनका भोजन बदलता है, फिर रहन-सहन और फिर बोली बदल जाती है। जो भी आदिवासी ऐसे पलायन कर कस्बों में जाते हैं, वे अपने दैनिक व्यवहार और कामकाज के लिए स्थानीय बोली अपना लेते हैं। उनके पारंपरिक नाम बदल जाते हैं, खानपान बदल जाता है।

यहां बोलियों के लुप्त होने को लेकर समाज की सुप्तता की बानगी है। विडंबना है कि जो लोग भी पलायन कर शहर आ रहे हैं उनके लिए भाषा का सवाल महज रोजगार की प्राप्ति का जरिया है और इस तरह वे सहजता से अपने सांस्कृतिक अस्तित्व की पहचान, अपनी पारंपरिक बोली को बिसरा देते हैं। एक बोली की मौत का अर्थ होता है उससे संबद्ध संस्कृति, लोक व्यवहार, अस्मिता और पहचान, मुहावरे, कथाएं-मिथक आदि का सदा के लिए लुप्त हो जाना। हजारों-लाखों सालों में विकसित हुई एक बोली-भाषा के विलुप्त होते ही एक विरासत, उसके शब्द, उसकी अभिव्यक्ति, खेती, जंगल, इलाज और उसकी तकनीकों का समृद्ध ज्ञान भी दफन हो जाता है।

विगत चार दशकों में ही बस्तर ने ऐसी कई संस्कृतियों को बोली के रास्ते बिसरा दिया। आज जरूरत है कि तत्काल बस्तर में बोलियों का एक संग्रहालय बनाया जाए, जिसमें गुम हो चुकी या संकटग्रस्त बोलियों को ऑडियो, वीडियो और मुद्रित स्वरूप में संरक्षित किया जाए। इसके साथ ही स्थानीय बोलियों में साहित्य लेखन और पठन को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष योजनाएं जिला व राज्य स्तर पर तैयार की जाए। यह भी दुखद है कि नई पीढ़ी में इन बोलियों को लेकर हीन भावना भी आती जा रही है। जाहिर है कि बोलियों का आत्मसम्मान उनको बोलने वाली जनजातियों की अस्मिता का प्रश्न है।

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