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    स्वच्छ पानी पर प्रदूषण का संकट

    By June 19, 2018 Hot issue No Comments6 Mins Read
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    जी क़े चक्रवर्ती

    सही मायनो में स्वच्छ जल, विशेष कर पीने के पानी का अभाव बहुत से कारणों से भारत ही क्या सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित कर रहा है। लेकिन असल में कहा जाये तो विशेष कर स्वच्छ जल का अभाव सम्पूर्ण विश्व के लिए एक बड़ी समस्या के रूप में उभर कर सामने आया है। इस बड़ी समस्या को अकेले या कुछ समूह कुछ देश के लोगों द्वारा इस समस्या का निदान नही निकाला जा सकता है। यह ऐसी समस्या है जिसका वैश्विक स्तर पर हम सभी लोगों द्वारा मिल कर करना पड़ेगा।

    आने वाले भविष्य में शुद्ध पानी पीने योग्य जल की समस्या को सुलझाने के लिए जल संरक्षण ही एक मात्र उपाय है। हमारे भारत के साथ ही साथ दुनिया के दूसरे देशों में शुद्ध पीने योग्य जल की भारी कमी है जिसके कारण लोगों को अपने दैनिक कार्यों को निपटाने के लिए आवश्यक पीने खाना बनाने के लिए एवं अपने रोजमर्रे के उपयोग के लिए आवश्यक पानी लाने के लिए बहुत लम्बी दूरी तय करनी पड़ती है तो दूसरी ओर, पर्याप्त जल वाले क्षेत्रों में अपने दैनिक जरुरतों से अधिक पानी लोग बर्बाद कर देते हैं। हम सभी लोगों को जल के महत्व और भविष्य में जल की कमी से संबंधित समस्याओं को समझना चाहिये और उसके लिए हमे सचेत रहने की बहुत आवश्यकता है कि अपने जीवन जीने के लिए उपयोगी जल को बर्बाद और प्रदूषित होने से कैसे बचाया जाय एवं समाज के लोगों के मध्य जल संरक्षण एवं जल संचय को प्रथमिकता के आधार पर बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है।

    जल प्रदूषण से अभिप्राय केवल पीने के जल मात्र से नही वल्कि उन जल श्रोतों जैसे- नदियों, झीलों, समुद्रों और भूजल के पानी के प्रदूषित होने से भी है जल प्रदूषण, इन जल निकायों के पादपों और जीवों को भी प्रभावित करता है और यह प्रभाव केवल उन जीवों या पादपों के लिए ही नही अपितु संपूर्ण जैविक तंत्र के लिए भी विनाशकारी सिद्ध होता है। जल प्रदूषण का मुख्य कारण मानव या जानवरों की जैविक या फिर औद्योगिक क्रियाओं के फलस्वरूप पैदा हुये प्रदूषकों को बिना किसी समुचित उपचार के सीधे जलाषयों में प्रभाहित कर देने से तो होता ही है। वहीं पर वर्षा के जल में हवा में उपस्थित गैसों एवं धूल के कर्णों के मिल जाने से उसका जल जहाँ पर भी एकत्र हो जाता है, वह जल दूसरे जल को भी प्रदूषित कर देता है।

    इसके अतिरिक्त ज्वालामुखी के गर्म लावों के जल में मिलने से भी जल प्रदूषित तो होता ही हैं साथ ही यह कई तरह के रोगों के जनक भी होते हैं। इस कारण इन्हें रोगजनक भी कहते हैं इसमें विषाणु, जीवाणु, कवक, परजीवी आदि आते हैं। यह मुख्यतः एक जगह जल के बहुत दिनों तक एकत्रित रहने पर होते हैं। इसके अलावा यह सड़े गले खाद्य पदार्थों में भी पैदा हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त कार्बनिक, अकार्बनिक जैसे पदार्थों के जिन्हें नदियों में नहीं होने चाहिए यह भी प्रदूषण फैलाने की श्रेणी में आते हैं। कपड़े या बर्तन की धुलाई या जानवरों के नहाने और मनुष्यों के साबुन से नहाने के बाद निकलने वाले साबुन पानी आदि जल में घुल जाने से वह भी जल को प्रदूषित करता है।

    मिट्टी का तेल, पेट्रोल आदि जैसे पदार्थों के रिसाव से समुद्री जल के प्रदूषित होने का सबसे बड़े कारणों में से एक है। पेट्रोल का आयात-निर्यात समुद्री मार्गों से ही किया जाता है। इन जहाजों में से कई बार रिसाव होने से तैलीय पदार्थ पानी मे मील जाता है या किसी भी कारण वश समुद्री जहाज के दुर्घटना ग्रस्त होकर डूबने जाने से समुद्री जल में तेल के फैलाव से जल प्रदूषित हो जाता है।

    कई बड़े कारखाने में वस्तुओं को गलाने हेतु उन्हें उच्च ताप पर गर्म करना पड़ता जिसके अवशेषों के साथ कई ऐसे पदार्थ होते हैं, जिन्हें कारखाने में उपयोग नहीं किया जा सकता है। उसे कहीं और डालने के स्थान पर नदी में डाल दिए जाने से नदी का पानी प्रदूषित हो जाता है। इसके ऊष्मा के कारण कई जलीय जीवों जैसे मछलीयों के अलावा कुछ अन्य जीवों जिनके द्वारा नदियों के इन कचरों को खाकर जल को साफ रखने का कार्य करते हैं ऐसे ऊष्मीय जल में ऑक्सीजन के न घुल पाने के कारण कई जलीय जीवों का नाश हो जाता है, इसके अतिरिक्त नदियों समुद्रों के पानी को सबसे अधिक नुकसान कपड़ा, कागज, उर्वरकों चीनी मिलों एवं रसायनीक पदार्थ को तैयार करने वाली फैक्ट्रियों से निकलने वाले हानिकारक रसायनों को उपचार संयत्र से प्रक्रिया किये बिना ही जल में प्रभावित कर देने से जल सबसे अधिक प्रदूषित होते हैं फैक्ट्रियों से गर्म लावों के रूप में निकलने वाले अवशिष्ट जैसे तापीय या ऊष्मीय वस्तुओं के एवं बहुत ठंडे जल को पानी में प्रवाहित करने से भारी मात्रा में नदियों के जल में प्रदूषण फैल रहा है।

    हमारे यहां जल की उपलब्धता एवं मांग के अनुरूप संपूर्ण जल के 97.25 प्रतिशत हिस्सा महासागरों में विद्यमान है जो खारा होने के कारण पीने योग्य नहीं है। पेयजल 2.75 प्रतिशत सतही एवं भूमिगत जल के रूप में हमे प्राप्त होता है। इस जल के मीठे होने से पीने तथा अन्य कार्यों के लिये भी उपयुक्त होता है। एक अनुमान के अनुसार पृथ्वी पर कुल 8.4 घन किलोमीटर स्वच्छ जल विशेषतः ग्लेशियरों, नदियों, झीलों, झरनों, तालाबों, जलाशयों में सतही तथा धरातल के भूगर्भ में भूमिगत जल के रूप में पाया जाता है। यूएन द्वारा सम्पूर्ण दुनिया की आबादी पर प्रकाशीत एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की आबादी 2100 तक लगभग 11.2 अरब हो जाएगी।

    अभी दुनिया की कुल आबादी लगभग 7.6 अरब हैं और मौजूदा समय मे पानी की वार्षिक खपत 1093 अरब घनमीटर है वर्ष 2000 के समाप्त होते होते पानी की खपत 50 प्रतिशत और अधिक होने लगेगी। जल की अनुमानित वार्षिक मांग, वर्तमान समय मे 605 अरब घनमीटर से बढ़कर वर्ष 2050 में 1447 अरब घनमीटर तक हो सकती है। भारत में जल प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण शहरीकरण और उसकी अनियंत्रित दर है। पिछले एक दशक में शहरीकरण की दर में बहुत तेज गति के साथ बृद्धि हो रही है या हम ऐसा भी कह सकते हैं कि इस शहरीकरण बृद्धि ने देश के जल स्त्रोतों पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। इसकी वजह से लंबी अवधि के लिए कई पर्यावरणीय समस्याएं पैदा हो गई हैं। इनमें जल आपूर्ति की कमी, पानी के प्रदूषित होने और उसके संग्रहण जैसे पहलू प्रमुख हैं। इस संबंध में प्रदूषित पानी का निपटान एवं उसकी शुद्धि करण करना एक बहुत बड़ा मुद्दा है। नदियों के आस-पास कई शहर एवं कस्बे हैं, जिसने इन समस्याओं को बढ़ाने में कोई कसर नही छोड़ी है ऐसे अवस्था मे भविष्य में हमे पानी से मुख्यतः शुद्ध पेय जल के अभाव से सम्पूर्ण मानव जाति संकट में आ सकती है।

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