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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    संसद में संविधान का सम्मान

    By December 12, 2019Updated:December 12, 2019 Current Issues No Comments7 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री

    नरेंद्र मोदी सरकार ने दशकों से लंबित संवेदनशील समस्याओं के समाधान का संकल्प दिखाया है। उसके ऐसे कार्यो में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर प्रावधान भी शामिल हुआ। ऐसे सभी मसलों पर उसे विपक्ष के नकारात्मक हमले झेलने पड़े,लेकिन वह विचलित हुए बिना आगे बढ़ती रही। उंसकी इसी इच्छाशक्ति का परिणाम है कि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्ट्रार विधेयक दोनों सदनों से पारित हुआ। इसका विरोध करने वालों को निराशा हाँथ लगी। वह विधेयक को रोक भी नहीं सके, और उनकी वोटबैंक सियासत भी बेनकाब हो गई।

    कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने राष्ट्रीय नागरिकता विधयेक की मूल भावना को या तो समझने का प्रयास नहीं किया, या उन्होंने इसके मुकाबले वोटबैंक राजनीति को ही महत्व दिया। यही कारण था कि लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष विधेयक पर कोई भी तर्कसंगत विचार प्रस्तुत करने में विफल रहा। दोनों ही सदनों में वह संविधान,संविधान निर्माताओं, मुस्लिम, दलित आदि शब्द हो दोहराता रहा। राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर विधयेक के माध्यम से इनमें से किसी की भावना आहत ही नहीं होनी थी। विपक्ष के भाषण का पूर्वोत्तर भारत में प्रतिकूल प्रभाव हुआ। जबकि इससे भारतीय नागरिकों को संतुष्ट होने चाहिए था। इसके माध्यम से उनके संसाधनों पर अवैध घुसपैठियों की हिस्सेदारी पर नियंत्रण स्थापित होने का प्रावधान किया गया। था।

    विपक्ष ने कहा कि सरकार ने संविधान का उल्लंघन कर दिया है, संविधान निर्माताओं के अपमान किया है।
    विधेयक नहीं बल्कि विपक्ष की दलीलों से संविधान निर्माताओं के अपमान हुआ है। संविधान निर्माताओं ने यह मंशा कभी नहीं थी अवैध घुसपैठिये भारत को अपना ठिकाना बना लें, धीरे धीरे वह नागरिकता हासिल कर लें, मतदाता सूची में उनके नाम शामिल हो जाये, फिर वह चुनाव लड़े और विधि निर्माण और शासन में हिस्सेदारी करने लगे। विपक्ष को सोचना चाहिए था कि उनके तर्क न केवल संविधान की भावना के प्रतिकूल है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा भी उल्लंघन करने वाले है।

    संविधान निर्माता राष्ट्रीय एकता,अखंडता और सीमाओं की सुरक्षा को अत्यधिक महत्व देते थे। संविधान का अनुच्छेद तीन सौ बावन इसका प्रमाण है। इसमें आपात कालीन उपबन्ध किया गया। जब एकता अखंडता सुरक्षा संबन्धी चुनौती हो तो केंद्र सरकार इस अनुच्छेद का प्रयोग कर सकती है। इससे उसको असीमित अधिकार प्राप्त होते है। इसका निहितार्थ यह है कि एकता अखंडता सीमाओं की सुरक्षा से बढ़ कर कुछ भी नहीं है। भारत के पड़ोस में पाकिस्तान जैसे शत्रु मुल्क है। बंगलादेश में जब शेख हसीना की सरकार होती है, तब तो गनीमत। अन्य कोई सरकार होती है तो वह भारत के विरोध में कार्य करती है।

    इन पड़ोसियों पर विश्वास नहीं किया जा सकता। ये बड़े षड्यंत्र के तहत अवैध रूप से घुसपैठ करा सकते है। राष्ट्रीय संकट के समय ये आंतरिक संकट उतपन्न कर सकते है।

    इसलिए प्रत्येक देश अवैध घुसपैठियों के प्रति कठोर रुख रखते है। कई मुल्क ऐसे है जिनमें कोई अवैध ढंग से घुसपैठ कर ही नहीं सकता। दशकों पहले कांग्रेस और कम्युनिस्ट सरकारों के समय बड़ी संख्या में अवैध घुसपैठ को अंजाम दिया गया। वोटबैंक की सियासत में इसको रोकने की कौन कहे, इसे बढ़ावा दिया गया। आज यह पूर्वोत्तर ही नहीं पूरे देश के लिए समस्या बन गए है।

    लोकसभा में कांग्रेस के नेता राष्ट्रीय सुरक्षा पर नहीं बोले। उन्होंने इस बात पर कुछ नहीं कहा कि अवैध घुसपैठ राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति खतरा बन सकती है। ऐसा लगा कि उनका पूरा ध्यान वोटबैंक सियासत पर ही केंद्रित है। राज्यसभा में भी इसी प्रकार के विचार सुनने को मिले। कांग्रेस के नेता आनंद शर्मा अवैध घुसपैठ और राष्ट्रीय सुरक्षा पर मौन रहे। लेकिन राजनीति पर उतने ही मुखर थे। कहा कि इस बिल को लेकर जल्दबाजी क्यों हो रही है, संसदीय कमेटी के पास इसे भेजा जाता और तब लाया जाता। आनंद शर्मा इसे जल्दीबाजी बता रहे है, जबकि इस प्रकार का विधेयक कई दशक पहले आना चाहिए था। तब अवैध घुसपैठ की समस्या इतनी विकराल न हुई होती।

    इसी के साथ पाकिस्तान व बांग्लादेश में प्रताड़ित हिन्दू, बौद्ध,सिख आदि को भी न्याय मिल जाता। इनके लिए तो भारत के अलावा दुनिया में कोई स्थान ही नहीं है। लेकिन विपक्षी सदस्य इनके लिए चिंतित दिखाई नहीं दिए। विरोधियों ने इस बिल को संवैधानिक, नैतिक आधार पर गलत बताया, प्रस्तावना के खिलाफ कहा। संविधान में कहीं भी अवैध घुसपैठ के प्रति आंख बंद रखने की बात नहीं कही गई। इसके विपरीत राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है। पूर्वोत्तर, पश्चिम बंगाल की पूर्व सरकारों ने अवैध घुसपैठ को बढ़ावा देकर संविधान की भावना का उल्लंघन किया था। नरेंद्र मोदी सरकार अवैध घुसपैठ को रोकने का प्रयास कर रही है। यही संविधान का सम्मान है।

    इसी प्रकार कांग्रेस के नेता ने इस बिल को प्रस्तावना के खिलाफ बताया। प्रस्तावना हम लोग शब्द से शुरू है, यह हम लोग भारत के नागरिक है। इसमें अवैध घुसपैठी शामिल नहीं है। यह सही है कि संविधान सभा में नागरिकता पर व्यापक चर्चा हुई थी। यह भी सही है कि भारत के संविधान में किसी के साथ भेदभाव नहीं हुआ। बंटवारे के बाद जो लोग यहां पर आए उन्हें सम्मान मिला है। पाकिस्तान से आए दो नेता प्रधानमंत्री भी बने हैं। लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि पाकिस्तान व बांग्लादेश से पिछले कुछ दशकों में जिस प्रकार घुसपैठ हुई है, उस पर नए सिरे से विचार की आवश्यकता था। नरेंद्र मोदी सरकार ने यही किया। इसी आधार पर राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर विधेयक लाया गया।
    अमित शाह ने ठीक कहा कि भारत के मुसलमान भारतीय नागरिक थे। वह अब भी नागरिक हैं और आगे भी भारत के नागरिक रहेंगे। बिल के बारे में गलत सूचना फैलाई गई कि यह विधेयक भारतीय मुसलमानों के खिलाफ है। उन्नीस सौ पच्चासी में असम समझौता हुआ। राज्य की स्वदेशी संस्कृति की रक्षा के लिए खंड छह में प्रावधान है।

    शाह ने कहा कि इसकी निगरानी के लिए समिति के माध्यम से एनडीए सरकार असम के अधिकारों की रक्षा करेगी। ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन कमेटी का हिस्सा है। यह विधेयक मिजोरम में लागू नहीं होगा। भारत दुनिया भर के मुस्लिम प्रवासियों को नागरिकता नहीं दे सकता। उत्पीड़न का सामना करने वाले तीन देशों के अल्पसंख्यकों के उद्देश्य से यह विधेयक लाया गया है। भारत को पाकिस्तान व बांग्लादेश की नजर से नहीं देखा जा सकता। वहां अल्पसंख्यको का अस्तित्व दांव पर लगा है। धार्मिक अल्पसंख्यक या तो मारे गए या वह शरण लेने के लिए भागकर भारत आ गए। ऐसे लोगों के साथ मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता थी।

    सरकार ने नागरिकता रजिस्टर विधेयक के माध्यम से यही किया है। कांग्रेस और कुछ क्षेत्रीय दलों के बीच जैसे वोटबैंक की प्रतिष्पर्धा चल रही थी। ये लोग अपने को दूसरे के मुकाबले मुसलमानों का हितैषी साबित करना चाहते थे। संसद की बहस का इन्होंने इसी रूप में उपयोग किया। जबकि इस बिल में भारत के मुस्लिम नागरिकों का भी हित जुड़ा था। इनको मिलने वाले लाभ व सुविधाओं में अवैध घुसपैठी दखल देने लगे थे। कपिल सिब्बल,पी चिदम्बरम सहित कांग्रेस के अन्य नेताओं ने इस पूरी चर्चा को वोटबैंक की सियासत की तरफ मोड़ने का प्रयास किया। उन्हें जिन्ना का द्विराष्ट्रवाद याद आ रहा था। लेकिन इन्होंने इस बात का जबाब नहीं दिया कि किसी देश में अवैध घुसपैठियों की संख्या जब बेतहाशा बढ़ती है, तो उसका दुष्परिणाम क्या होता है।

    यह बात कई दशक पहले जाहिर हो गई थी कि अवैध घुसपैठ के कारण धीरे धीरे असम अनेक जिलों में मूल भारतीय ही अल्पमत हो जाएंगे। इससे बड़ा खतरा यह होगा कि ये विदेशी घुसपैठी विधायिका व कार्यपालिका का हिस्सा बनने लगेंगे। अमित शाह ने विपक्ष की साम्प्रदायिक सोच पर निशाना लगाया। उन्होंने अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश के संविधान के प्रावधान का उल्लेख किया। इसमें इन देशों को इस्लामिक देश कहा गया। ये इस्लामी मुल्क है। इनको मुसलमान पीड़ित या शरणार्थी नहीं है। उत्पीड़ित हिन्दू, बौद्ध, सिख है। इसलिए इनको नागरिकता देने की बात कही गई। अनुच्छेद चौदह में समानता की बात कही गई, लेकिन शरणार्थी व अवैध घुसपैठ को समान नहीं माना जा सकता।

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