अब खेती किसानी क्या पूर्व काल की तरह होगी?

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जी के चक्रवर्ती
देश के किसानों भाइयों एवं सरकार का ध्यान अचानक पूर्व काल अर्थात आज से 50-60 दशकों पहले भारत मे की जाने वाली खेती और उसमें अपनाई जाने वाले तौर-तरीकों की ओर धीरे-धीरे उन्मुख होता नजर आ रहा हैं। वे पुनः अपने मूल की ओर’ वापसी करने की ओर कदम बढ़ा रहै हैं। उन्हें जिस सिद्धांत पर टिके रहने की जरूरत है उसके अनुसार वर्तमान सरकार जीरो बजट जैसी खेती करने की योजनाओं को इस वित्तीय वर्ष के आम बजट में घोषित किया था, जिसमे कुछ कृषि वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि इस तरह की खेतीयों में जिस तरह की पद्धति को अपनाने की योजना बनाई गई है उसके लिए हमारे पास न तो कोई प्रामाणिक आंकड़े मौजूद है और नही इसे वैज्ञानिक कसौटी पर कस कर देखा गया है।
ऐसी योजनाओं को बनाये जाने का एक कारण यह नजर आता है कि वर्ष 2022 तक देश के सभी किसानों की आय को दोगुनी करने जैसी अपने वायदे के दबावों में मौजूदा सरकार का आना स्वाभाविक है। इन योजनाओं के आधार का सिद्धांत इस बात पर आधारित है कि पौधों को प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से उगाने एवं उनके विकास के लिए आवश्यक नाइट्रोजन, कार्बन डाईऑक्साइड, प्रकाश एवं जल जैसे तत्व जो पौधे को प्रकृति से आसानी से उपलब्ध होते रहते है, हमे मात्र इसे हासिल करने का तौर-तरीका मालूम होना चाहिए। पौधों के लिए शेष दो प्रतिशत तक की पोषण जीवाणु को जड़ों के भीतर सक्रिय करने से मिल सकता है, इस तरह के जीवाणु गाय के मल-मूत्र, गुड़ एवं दालें इत्यादि के घोल के छिड़कावों से आसानी से प्राप्त किया जा सकता है।
आज के वैज्ञानिक युग मे जिस पद्धति को अपना कर गॉवों के किसान खेती कर रहे है उसमे रासायनिक खादों की महत्ता उपलब्धता अधिक होने के कारण अधिकांश किसान अपने-अपने खेतों में रसायनिक खादों का ही इस्तेमाल करते नजर आ रहे हैं।
हमारे वैज्ञानिकों का यह कहना है कि वायु मंडल में उपस्थित हवा में 78 प्रतिशत नाइट्रोजन होता  है, जिसे पौधे अवशोषित कर उसे एमिनो एसिड में बदलने के बाद भी अपने लिए भोजन तब तक नहीं बना पाते हैं जबतक कि उन्हें अमोनिया या यूरिया का सहारा न दिया जाए, यानीकि ऐसी इस्थिति में रासायनिक खादों का डालना परम् आवश्यक हो जाता है। रह गई बात जीरो बजट की खेती करने जैसी बातों की अवधारणों के जनक महाराष्ट्र के ‘सुभाष पालेकर’ को इसका श्रेय जाता है। उनके अनुसार जीरो बजट की खेती में सफल पैदावार की एक शर्त यह है कि इसमें प्रयुक्त होने वाले गोबर और गोमूत्र केवल काली कपिला गाय का ही होना चाहिए। क्या हमारे देश में खेती करने की नीतियां काली कपिला गाय के गोबर और गोमूत्र के वल पर बनाना एवं उसे सम्पूर्ण विश्व को बताना भारतीय नेतृत्व की तर्क-क्षमता एवं वैज्ञानिक सोच पर एक प्रश्न-चिन्ह खड़ा नही करता? ऐसे में इन योजनाओं को वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक पुष्टि के बिना ही घोषित कर देना कहाँ तक उचित होगा बल्कि इससे हमें नुकसान ही पहुंचेगा।
मौजूदा सरकार का प्रथम पांच वषों के कार्यकाल या दूसरे काल खंड के पिछले सौ से ज्यादा दिनों की गणना करें तो प्रति हफ्ते एक योजना, या विचार-संदेश देश को अपने सबसे लोकप्रिय नेता से मिलता रहा है। किसी भी देश, जिसमें नवीन विचार उत्पन्न न हों, वह धीरे-धीरे जड़वत होता चला जाता है। हमारे मौजूदा सरकार को यह अवश्य ज्ञात है कि किसानों की आय में बृद्धि न होने के प्रमुख कारणों में उनके खेतो में उत्पादन होने वाले फसलों के उत्पादन क्षमता की बृद्धि न कर पाना है। जबकि दूसरी तरफ भारत में जहां-जहां अनाज का उत्पादन बढ़ा है, वहां पर जमीन की उर्वराशक्ति लगातार क्षीण होती चली जा रही है।
farming
जिसके मूल कारणों में से एक कारण खेती करने के लिए उपलब्ध जमीन पर हमारे देश की बड़ी जनसंख्या का दबाव होने से किसानों द्वारा रासायनिक खादों का उपयोग अत्यधिक करना एवं जल श्रोतों का अविवेकपूर्ण उपयोग करना तो है ही इसके साथ ही साथ उनके द्वारा उत्पादित माल के लिए समुचित बाजार की व्यवस्था का न होना भी जिम्मेदार है। इस कारण मौजूदा सरकार अब हमारे देश मे पूर्व काल मे किये जाने वाली खेती यानी कि देशी बीज, देशी खाद पर आधारित परंपरागत खेती की ओर उन्मुख होने का इरादा रखती है।
जिसका संकेत सरकार द्वारा अभी हाल ही में जारी आर्थिक सर्वेक्षण को पढ़ने एवं प्रधानमंत्री मोदी के हाल के तमाम भाषणों में यह बात स्पष्ट नजर आता है। धरती पर उत्पन्न होने वाली फसलें हमारे प्रकृति से ही जन्म लेती है, अत: पृथ्वी के भूमि के लिए हमारा मानक स्वयं प्रकृति के पारिस्थितिकी अवस्था के अनुरुप ही होना चाहिए। अचानक इस तरह से भारतीय खेती-किसानी एवं परंपरागत खेती करने के तौर-तरीको में कुछ इस तरह के बदलाव किये जाने वाली बातें करना ठीक इसतरह की है जैसे ‘रामायण कालीन पुष्पक विमान’, एवं  ‘हाथी मस्तक को भगवान गणेश के शरीर में प्रत्यारोपित किये जाने वाली जैसी बात होगी, जबकि जीरो बजट खेती के प्रति ऐसी आशंकाये व्यक्त करने वाले ऐसे वैज्ञानिक नही तो वामपंथी विचारधारा वाले नेता हैं और न वे ‘देश-विरोधी ताकतें बल्कि इनमे से कई वैज्ञानिक तो मौजूदा समय में ही कृषि विभाग के महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत रह चुके हैं।
कृषि जैसे मूलभूत एवं भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हड्डी समान होने से भारतीय कृषि में व्यापक परिवर्तन करने से पहले व्यापक चर्चा करने के पश्यचात ही देश में ‘जीरो बजट’ वाली खेती जैसी योजनाओं को जमीनी स्वरूप देने की दिशा में आगे बढ़ना उचित होगा  चाहिए नही तो मौजूदा समय मे किजाने वाली खेती-किसानी एवं उत्पादित फसलों पर अत्यंत बुरा प्रभाओं पड़ सकता है। ऐसे बदलाव से पहले सभी पहलुओं पर गौर करना बहुत आवश्यक है।

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