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    समाज से मर्यादा का ह्रास, राम को फिर वनवास

    ShagunBy ShagunJuly 10, 2026 Current Issues No Comments8 Mins Read
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    Ranbir Kapoor Becomes 'Maryada Purushottam Ram'
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    rahul guptaराहुल कुमार गुप्ता

    आज जब मन विचारों के द्वंद्व में उलझा हुआ है तब विचारों के ज्वार की स्याही से शब्द कागज में अपनी राह बनाते स्वतः आगे बढ़ रहे हैं और आँखें नम हैं। यह आलेख अब केवल शब्दों का संग्रह नहीं रह गया बल्कि यह हमारे समय की उस नैतिक और आध्यात्मिक शून्यता पर एक गहरा घाव है, जिसे हम अक्सर धर्म के चमकीले आवरण से ढकने की कोशिश करते हैं। आज का समाज जिस मोड़ पर खड़ा है, वहाँ ईश्वर, आस्था और मर्यादा का बाज़ारीकरण हो चुका है। जब प्रतीक सत्य पर भारी पड़ने लगें, जब नारे हमारे विवेक की आवाज़ को दबाने लगें, और जब भव्यता के शोर में करुणा की धीमी पुकार खो जाए, तब समझ लेना चाहिए कि मर्यादा की हत्या हो चुकी है। यह हमारे अंतर्मन को झकझोरने का एक विनम्र प्रयास है, ताकि हम धर्म के वास्तविक स्वरूप को पहचान सकें।

    इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी दिव्य विचार या महापुरुष को राजनीतिक या सामाजिक सत्ता का साधन बनाया गया, तब-तब मूल तत्व पीछे छूट गया और केवल खोखले प्रतीक आगे रह गए।
    आज समाज में राम का नाम आस्था की जगह अधिकतर नारे और स्लोगन की तरह लिया जा रहा है, जबकि राम को नारे की तरह बोलने वाली भीड़, राम के आदर्शों और उनके चरित्र से अंजान है।

    मर्यादा पुरुषोत्तम राम का संपूर्ण जीवन त्याग, न्याय और समता का दस्तावेज़ है। राम जब अयोध्या से वन की ओर निकले, तो उनके पास न मुकुट था, न सिंहासन। फिर भी वे राम थे। वे शबरी की झोपड़ी में जाते हैं और उनके जूठे बेर खाते हैं, जो उस दौर के सामाजिक ताने-बाने और जातिगत ऊंच-नीच पर सबसे बड़ा प्रहार था। वे केवट को गले लगाते हैं, जो सत्ता के अहंकार के विपरीत एक राजा की निरहंकारिता का प्रतीक है। राम भरत की प्रतीक्षा में हैं और हनुमान की निष्ठा में हैं। वे हर उस आम इंसान के भीतर हैं, जो बिना किसी प्रचार या ढोल-नगाड़े के, किसी दूसरे के दुःख को देखकर पिघल जाता है और उसे अपना समझ लेता है।

    परंतु आज का वर्तमान परिदृश्य इसके ठीक उलट है। आज राम के नाम पर भव्य आयोजन, गगनचुंबी पोस्टर, डिजिटल प्रचार और गर्जना करते लाउडस्पीकर हैं। यह बदलाव त्रेतायुग के मर्यादित राम से आज के ‘ब्रांड’ तक का है। बाज़ार को मर्यादा नहीं चाहिए, उसे एक ऐसा नाम चाहिए जिसे सुनते ही भीड़ सोचने-समझने के बजाय केवल नारा लगाने लगे। धीरे-धीरे राम पीछे छूट गए और आगे मंच, माइक, कैमरे, कटआउट और जुलूस आ गए। इस शोर में राम की असली आवाज़ कहीं दब गई। किसी भी धर्म के पूजास्थलों/इबादतगाहों के भव्य निर्माण मात्र से ईश्वर खुश नहीं होता। ईश्वर तो तब खुश होता है जब लोगों का मन निर्मल होता है, पवित्र होता है। सुंदरकाण्ड में प्रभु श्री राम खुद ऐसा कहते हैं-“निर्मल मन जो, सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा”। क्या लाखों दीप जलाकर, हम हमारे भीतर का अँधेरा समाप्त कर पा रहे हैं? क्या बड़े-बड़े भंडारों का आयोजन कर हम वास्तव में गरीबों की भूख मिटा रहे हैं? क्या हम सच में लोड स्पीकरों के शोर में अपने हृदय में ईश्वर को स्थान देने में कामयाब हो रहे हैं? हम वास्तविक मार्ग से जाने कब के भटक चुके हैं।

    क्या वास्तव में ईश्वर को पत्थरों के ऊंचे शिखर, सोने के गुंबद या अरबों के दानपात्र चाहिए? दुनिया के तमाम बड़े धर्मग्रंथ इस बात का खंडन करते हैं। ईश्वर मनुष्य से भव्यता नहीं, बल्कि पवित्र आचरण और मानवता की सेवा मांगता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि ईश्वर सभी मनुष्यों के हृदय में निवास करता है। जब ईश्वर हर जीव के भीतर है, तो किसी मनुष्य का अपमान करके, किसी लाचार को सताकर या समाज में नफ़रत फैलाकर की गई पूजा कभी भी ईश्वर तक नहीं पहुँच सकती। इसी तरह, इस्लाम में भी सबसे बड़ा धर्म मानवता की सेवा को माना गया है। एक प्रसिद्ध हदीस के अनुसार, पैगंबर मुहम्मद ने कहा था कि वह व्यक्ति सच्चा आस्तिक नहीं हो सकता, जो खुद पेट भरकर सो जाए और उसका पड़ोसी भूखा रहे। यहाँ पड़ोसी का कोई धर्म नहीं पूछा गया, केवल उसकी भूख देखी गई। बाइबिल में ईसा मसीह सिखाते हैं कि किसी बीमार, कैदी या भूखे की सेवा करना ही साक्षात ईश्वर की सेवा है। सिख धर्म में गुरु नानक देव जी का स्पष्ट संदेश था कि सत्य सबसे ऊपर है, लेकिन सत्य से भी ऊपर व्यक्ति का सच्चा आचरण और चरित्र है।ram jai jai ram

    जब सभी धर्मग्रंथ चीख-चीखकर कह रहे हैं कि ईश्वर मनुष्य के भीतर है, तो फिर बाहर यह कैसा कोलाहल है? हकीकत यह है कि आज दानपात्र बड़े होते जा रहे हैं और हमारे दिल छोटे। झंडे ऊँचे होते जा रहे हैं और हमारे विचार बौने। जयघोष गूँज रहे हैं और आपसी संवाद मर रहा है। आज के दौर में सबसे बड़ा संकट यह है कि असहमति को अपराध मान लिया गया है। यदि आप स्थापित व्यवस्था या शोर मचाती भीड़ से एक तार्किक प्रश्न पूछ लें, तो आपकी निष्ठा पर सवाल उठा दिया जाता है कि तुम राम/ईश्वर के साथ हो या नहीं? यह प्रश्न ही बुनियादी तौर पर गलत है। राम के सब हैं और सब के ही वो राम हैं, वो किसी की निजी संपत्ति नहीं वो पूरे ब्रह्मांड के हैं।

    राम तो वन में भी राम थे, राजमहल में भी राम थे और सबसे अधिक राम तब थे, जब उनके पास न सिंहासन था, न मुकुट।

    कबीरदास ने सदियों पहले आगाह किया था कि पोथी पढ़-पढ़कर दुनिया थक गई, लेकिन कोई पंडित नहीं बन पाया; जो प्रेम के ढाई अक्षर पढ़ लेता है, वही सच्चा ज्ञानी है। आज जब नारे तर्क पर भारी पड़ने लगे हैं, तो समाज में संवाद मर रहा है। जहाँ संवाद मर जाता है, वहाँ मानवता दम तोड़ देती है। जब ईश्वर के नाम पर मनुष्य छोटा होने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि धर्म नहीं, बल्कि हमारा अहंकार बढ़ा है। हम ईश्वर की रक्षा के नाम पर लड़ रहे हैं, जबकि सत्य यह है कि संपूर्ण ब्रह्मांड को संभालने वाले ईश्वर को हमारी रक्षा की आवश्यकता नहीं है। मर्यादा कभी पत्थरों से नहीं बनती, वह मनुष्यों के आचरण से बनती है। मंदिर शिखरों से नहीं, विश्वास से ऊँचे होते हैं और विश्वास कभी डर में नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र मन में जन्म लेता है। जब प्रश्न पूछना अपराध बन जाए, तो समझ लेना चाहिए कि उत्तर कमज़ोर पड़ चुके हैं।

    वास्तव में, राम किसी चुनाव का वादा नहीं हैं, न ही वे किसी भाषण की पंक्ति या प्रचार की रणनीति हैं। राम उस क्षण का नाम हैं जब अपार शक्ति होते हुए भी मनुष्य न्याय का रास्ता चुनता है। राम तब प्रकट होते हैं जब प्रतिशोध संभव होते हुए भी मनुष्य क्षमा चुनता है। जब सारे अधिकार हाथ में हों, फिर भी मनुष्य मर्यादा न छोड़े, वही राम हैं। और शायद यही सबसे कठिन है। क्योंकि पत्थरों का मंदिर बनाना आसान है, लेकिन अपने भीतर मर्यादा का निर्माण करना बहुत कठिन है। नारे लिखना आसान है, पर अपने चरित्र को वैसा सुंदर लिखना कठिन है। जय-जयकार करना बहुत आसान है, लेकिन राम जैसा आचरण करना बेहद कठिन है।

    इसलिए आज सबसे बड़ा संकट राम का नहीं है, संकट मर्यादा का है। जिस दिन मर्यादा बिकने लगे, समझ लेना चाहिए कि बाज़ार बहुत बड़ा हो गया है और राम फिर एक बार मानवीय समाज छोड़कर वन की ओर लौट गए हैं। आज बाज़ार बहुत बड़ा हो चुका है, धर्म का बाज़ार, राजनीति का बाज़ार, भावनाओं का बाज़ार। इस बाज़ार में हर चीज़ बिकाऊ है। यदि आज भी हम नहीं जागे, यदि हमने अपने आचरण में करुणा, प्रेम और न्याय को स्थान नहीं दिया, तो इन भव्य महलों, इन कंक्रीट के जंगलों में केवल हमारे अहंकार की गूँज सुनाई देगी। राम तो उस शोर-शराबे और पाखंड को छोड़कर चुपचाप किसी शांत कोने में चले जाएंगे, जहाँ कोई माइक नहीं होगा, बस शबरी के आँसू होंगे और केवट का निश्छल प्रेम होगा। आखिर में हम अपनी आत्मा से पूछें कि क्या हम राम को सचमुच अपने भीतर रोकना चाहते हैं, या उन्हें फिर से वन भेजने की तैयारी कर रहे हैं?

    त्रेतायुग में तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी को मात्र 14 वर्ष का वनवास हुआ था और कारण मात्र मां कैकई का अपने सगे पुत्र भरत को राजा बनाने की चाह थी। जब की पूरा कौशल प्रदेश राम के आदर्शों के कारण राम को अपने हृदय में बसाये हुए था। 14 वर्ष वनवास के बाद राम केवल इसलिए वापस आए कि त्रेता युग के लोगों ने उन्हें अपने हृदय में बसा उनके आदर्शों को आत्मसात किया, उनके इंतजार में लोग अपनी सुध-बुध भी खो बैठे थे। और श्री राम के प्रति इसी अथाह प्रेम के चलते ही त्रेता के भाग्य में रामराज्य साकार हुआ था। जब तक राम के प्रति प्रेम, और उनके आदर्शों को हमारा समाज आत्मसात नहीं करेगा, तब तक भयमुक्त समाज और रामराज्य की परिकल्पना मात्र कल्पना बन कर ही रह जाएगी।

    आज जब समाज में मर्यादा का ह्रास अपनी तीव्रतम गति से हो रहा है, जहां मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी के आदर्शों से अब समाज को लेना देना नहीं रह गया, राम कुछ निर्मल हृदयों को छोड़ कब के वनवास में चले गए। केवल डीजे, लाउड स्पीकरों की गूंज, मंदिरों के निर्माण से और भीड़ के नारों मात्र से राम को अब वापस नहीं बुला सकते। राम को समाज में वापस आने के लिए निर्मल भाव चाहिए, उन्हें अपने आदर्श चाहिए।

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