महामारी ने किसानों को केले की खेती छोड़ने पर कर दिया था मजबूर
केले के किसानों को सर्वाधिक निराश करने वाला पौधे पर लगने वाला खतरनाक रोग पनामा विल्ट से निजात पाने में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने सफलता प्राप्त कर ली है। इस रोग पर तीन साल से शोध कर रहे कृषि वैज्ञानिकों की इस सफलता से केले के किसानों को काफी फायदा होगा, क्योंकि इस महामारी की तरह फैलने वाली कई जिलों में बहुतायत मात्रा होने वाली केले की खेती करने वाले किसान निराश हो चुके थे।
केंद्रीय लवणता मृदा लवणता क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र एवं केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, रहमान खेड़ा के वैज्ञानिकों ने इस रोग के प्रबंधन के लिए आईसीआर-फुसिकांट नामक प्रौद्योगिकी का विकास किया। इसके उपयोग से उत्तर प्रदेश और बिहार के सैकड़ों एकड़ रोग ग्रस्त खेतों में बीमारी को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया गया। विश्व में यह बीमारी बहुत सारे देशों में व्याप्त है और वहां इसकी रोकथाम रोकथाम के लिए कोई कारगर उपाय अभी तक उपलब्ध नहीं है। आमतौर पर इस बीमारी को एक खेत से दूसरे खेत तक न फैलने देने के लिए रखने वाली सावधानियों से ही किसानों को अवगत कराया जाता है।
केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, रहमानखेड़ा, लखनऊ के निदेशक शैलेन्द्र राजन ने बताया कि विदेशों में संघरोधी सिद्धांतों को ध्यान में रखकर किसान महामारी को अन्य क्षेत्रों में फैलने से रोकने के आंशिक रूप से सफल है परंतु भारतीय दिशाओं में किसानों द्वारा इन अनुशंसा को अपनाना कठिन है। इसका कारण मुख्य कम जानकारी एवं संसाधनों की कमी है, जिसके कारण वे केले जैसी अत्याधिक लाभ देने वाली फसल को छोड़कर दूसरी फसल को लगाने के लिए तैयार नहीं है। साथ ही साथ बीमारी के प्रबंधन के लिए छोटी-छोटी सावधानियों के बारे में उन्हें ना तो ज्ञान है ना ही वे इसे कार्य रूप में लाने में विश्वास रखते हैं।
जागरूकता कार्यक्रम किया शुरू:
गुरुवार को भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने महामारी वाले क्षेत्रों में जागरूकता कार्यक्रम प्रारंभ किया। जागरूकता के अतिरिक्त किसानों को आईसीआर- फुजिकांट भी प्रदान किया और इस दवाई के प्रयोग की विधि के बारे में विस्तार से बताया। इस कार्यक्रम के दौरान डॉ रामगोपाल ने किसानों को बताया कि कैसे बीमार पौधे को पहचाने और आईसीआर- फुजिकांट का सही विधि से प्रयोग करें। डॉक्टर दामोदरन ने इस बीमारी के विभिन्न पहलुओं से किसानों को अवगत कराया तथा किस प्रकार से वह इस बीमारी के प्रकोप हो जाने वावजूद भी अच्छी उपज ले सकते हैं पर अपने अनुभव साझा किए।
बीमारी को सामूहिक रूप से नियंत्रित की जा सकती है- डॉ. राजन
डॉ. राजन ने बताया कि यह बीमारी सामूहिक रूप से नियंत्रित की जा सकती है। अतः सभी किसानों को मिलकर सामुदायिक नियंत्रण कार्य योजना बनानी चाहिए। किसानों ने डॉ. दामोदरन से बहुत से ऐसे प्रश्न किए क्योंकि वे इस बीमारी से कई वर्षों से जूझ कर अच्छा अनुभव प्राप्त कर चुके हैं। वे कई कंपनियों की दवाइयों का इस्तेमाल करके निराशा के बाद आईसीआर- फुजिकांट के उपयोग की प्रयोग की सही विधि जानना चाहते हैं। बहुत सी कंपनियों ने यहां के किसानों को विभिन्न प्रकार के रसायन को प्रयोग में लाने के लिए उत्साहित किया जिस कारण उन्हें तो लाखों रुपये की आय हो गई परंतु किसान को इतना घाटा हुआ की वे अपनी लागत मूल्य भी नहीं निकाल पाए।
गडेरूआ में किया जागरूक:
बता दें कि इस कार्यक्रम का आयोजन गडेरुआ (सिसवा बाज़ार, महराजगंज) में किया गया और इसके आयोजन के लिए माटी फाउंडेशन ने किसानों में जागरूकता एवं संपर्क किया। माटी फाउंडेशन द्वारा आईसीआर- फुजिकांट टेक्नोलॉजी को कई एकड़ में प्रदर्शित किया गया और किसानों ने प्रदर्शन स्वयं देख कर अनुभव प्राप्त किया।







