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    क्या चीन से युद्ध होगा?

    By August 24, 2017Updated:August 24, 2017 ब्लॉग No Comments7 Mins Read
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    ‘अमेरिका और इजरायल के साथ भारत के बढ़ते रक्षा संबंधों से बौखलाये चीन ने सिक्किम सीमा के निकट डोकलम में अपनी सेना तैनात कर जो विवाद पैदा किया है,उससे दोनों देशों के बीच युद्ध की स्थिति पैदा हो गयी है। भारतीय सेना भी उसके सामने डटी है। दरअसल चीन भूटान की सीमा पर स्थित युद्ध के नजरिये से महत्वपूर्ण इस इलाके पर कब्जा करना चाहता है,ताकि भारत को घेर सके। लेकिन भारत ने न सिर्फ उसके सामने झुकने से इंकार कर दिया है,बल्कि उसे मुंहतोड़ जबाव देने की कह कर उसके कदम ठिठका दिये हैं।’


    उदय यादव

    सीमा विवाद को लेकर भारत और चीन के बीच अक्सर तनातनी होती रहती है, मगर इस बार सिक्किम क्षेत्र की सीमा पर विवाद खतरनाक स्थिति में पहुंच गया है। चीन की सेना इस बीच सीमा पर दो बार युद्धाभ्यास कर चुकी है। उसने भारत में रह रहे अपने नागरिकों को भी सावधान रहने के निर्देश जारी किये हैं। चीन रोज सैन्य कार्रवाई की धमकी दे रहा हैे।उसने यहां तक कह दिया है कि चीन अपनी सम्प्रभुता की रक्षा के लिए कियी भी सीमा तक जा सकता है। भारतीय सेना डोकलाम में डटी हुई हैं। मंगलवार को गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने ने दो टूक कह दिया है कि भारत चीन की विस्तारवादी नीति के आगे नही झुकेगा और भारत इस विवाद का शांतिपूर्ण हल चाहता है। डोकलाम के विवाद पर दुनिया भारत के साथ खड़ी है। इसी बीच अमेरिका के बाद जापान ने भी डोकलम में भारत की स्थिति का समर्थन किया है। भारत और चीन दोनों के कड़े रुख से अब यह प्रश्न तेजी से उठने लगा है कि क्या दोनों देश युद्ध की तरफ बढ़ रहे हैं? संभावना यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सितंबर के पहले हफ्ते में बीजिंग ब्रिक्स सम्मेलन में भाग लेने जायेंगे,जहां चीनी राष्टपति से मुलाकात में इस विाद का कोई हल निकल सकता है।

    चीन से इस ताजा विवाद की शुरूआत जून महीने के मध्य में हुई थी, जब भारत ने डोकलाम इलाके में चीन के सड़क बनाने का विरोध किया था। भारत की चिंता यह है कि अगर चीन यह सड़क बना लेता है तो उसकी सेना भारत के बीस किलामीटर चैड़े काॅरीडोर ‘चिकन्स नेक’ के नजदीक पहुंच जायेगी,। यह गलियारा पूर्वोत्तर के राज्यों को भारत के मुख्य भाग से जोड़ता है।इसलिए इस मुद्दे पर कड़ा रुख अख्तियार करना भारत के लिए जरूरी था।

    वैसे चीन लम्बे समय से सिक्किम सीमा पर विवाद की स्थिति पैदा करता रहा है। उसकी सेना अक्सर भारतीय सीमा में घुस आती है। इस बार प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिकी यात्रा के समय उसने यह विवाद शुरू किया। भारत और अमेरिका के बढ़ते सम्बंधों से जिनपिंग परेशान हैं। पिछली बार 2014 में चीन के राष्ट्रªपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा के दौरान लद्दाख के चुमार इलाके में चीनी सेना की घुसपैठ का विवाद लम्बा खिचा था। इसी तरह 1986 में अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर विवाद काफी लम्बा चला था। उस समय राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। लेकिन जब भारत नही झुका तो चीन ने राजीव गांधी को चीन आने का निमंत्रण दिया। राजीव गांधी की चीन यात्रा के दौरान मामला शांत हो गया। मगर इस बार चीन के इरादे खतरनाक लग रहे है। चीनी सेना भूटान को डरा-धमका कर डोकलाम इलाके पर कब्जा करना चाहती है। तीन सौ वर्ग किलोमीटर का यह इलाका चीन की चुंबा घाटी से सटा हुआ है और सिक्किम के नाथुला दर्रे के नजदीक है। दरअसल भूटान के साथ भी चीन सीमा विवाद है। अभी तक दोनों देशों की सीमा तय नही हूई है। लेकिन डोकलम क्षेत्र सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।

    वैसे यह वास्तविक रूप से भूटान का इलाका है। इसीलिए भूटान के राजनयिक ने सबसे पहले चीन से इसका विरोध जताया था। मगर चीन नही माना। चूंकि भूटान की सुरक्षा की जिम्मेदारी भारत की है और भारत की सुरक्षा के नजरिये से भी यह जगह बेहद महत्वपूण है। इसलिए फिर भारत ने विरोध जताया। चीन भारत और भूटान के रिश्तों से भी नाराज है। वह भूटान को भारत से अलग करना चाहता है। उसका आरोप है कि भारत ने भूटान की मदद के बहाने इस मामले में दखल दिया है और उसका यह कदम अंतर्राष्ट्रªीय कानून का उल्लंघन है। इसीलिए चीन भारतीय सेना को पीछे हटने के लिए कह रहा है। दूसरी ओर, भारत ने साफ कर दिया है कि जब तक चीनी सेना पीछे नही हटती ,तब तक भारतीय सेना के पीछे हटने का सवाल ही पैदा नही होता। अगर चीन यहां कब्जा जमा लेता है ,तो उसकी सेना भारत के मुकाबले मजबूत स्थिति में हो जायेगी। युद्ध के हालात में चीन की भारत में घुसपैठ आसान हो जायेगी। इसीलिए दोनों देशों की सेनाएं वहां डटी हुई हैं। इसीलिए भारत इस विवाद का कूटनीतिक हल निकालने के प्रयास में जुटा है। भारत के रक्षा सलाहकार अजीत डोभाल 26 जुलाई को ब्रिक्स देशों की बैठक में भाग लेन बीजिंग और चीनी अधिकारियों से बात भी की, मगर हल नही निकला। इसके बाद लद्दाख इलाके में भी भारतीय और चीनी सैनिकों में पत्थरबाजी हुई। भारतीय सैनिकों ने मुंहतोड़ जवाब दिया।

    दरअसल चीन का रवैया शुरू से विस्तारवादी रहा है। वह जिस देश को भी कमजोर देखता है, उसी की जमीन पर कब्जा कर लेता है। वह अपने पड़ोसियों जापान, फिलीपींस, वियतनाम, म्यांमार और सिंगापुर के साथ ऐसा ही व्यवहार कर रहा है। हालांकि उसे वियतनाम में मुंह की खानी पड़ी थी। उसने जब वियतनाम पर हमला किया तो वियतनाम का पलटवार नहीं झेल पाया और भाग खड़ा हुआ। अब वह विश्व महाशक्ति बनने की राह पर है। चीन को अब यह एहसास कराने का समय आ गया है कि अब बहुत हो चुका, तुम्हें यह रवैया बदलना होगा। सच यह है कि अगर सिक्किम और भूटान में भारत की सैन्य उपस्थिति बनी रहती है,तो चीन जहां सिलीगुड़ी कतई बढ़ नहीं पायेगा, वही चीनी सेना को भारत की भारी विनाशक गोलाबारी का सामना करना पड़ेगा।

    सच्चाई यह है कि चीन भारत से कई कारणों से नाराज है। भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते सामरिक रिश्ते इसकी एक बड़ी वजह हैं। अभी प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिकी यात्रा से इन रिश्तों को बेहद मजबूती मिली है। मोदी का जिस तरह अमेरिकी राष्ट्रªपति डोनाल्ड ट्रंप ने जोरदार स्वागत किया और अपना मजबूत दोस्त बताया, उससे चीन और पाकिस्तान दोनों परेशान हैं। अमेरिका से भारत का सैन्य समझौते ने दोनों की नीेद उड़ा दी है। दूसरी ओर, अमेरिका ने पाकिस्तान पर दबाव बढ़ा दिया है। उसे पाकिस्तान को आतंकियों को पनाह देने वाला देश घोषित कर दिया है और उसको दी जाने वाली सहायता राशि में भारी कटौती कर दी है। चीन ने अपने महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट ‘वन बेल्ट,वन रोड’ के लिए 46 देशों का सम्मेलन किया था,जिसका भारत ने बहिष्कार किया था। इससे चीन बौखलाया हुआ है। चीन इस पुराने सिल्क रूट का आधुनिकीकरण करके समुद्री और मैदानी भागों का इस्तेमाल करना चाहता है,जिसके जरिये वह एशिया में पश्चिमी देशों का दबदबा खत्म हो जायेगा। दरअसल चीनी मानते हैं कि विश्व व्यापार पर दबदबे के लिए सिर्फ वित और

    मैन्यूफेक्चरिंग पर ही नियंत्रण पर्याप्त नही है,इसके साथ ही उन रास्तों पर भी नियंत्रण जरूरी है, जिनसे व्यापार होता है। चीन पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से इसी परियोजना के तहत रोड बना रहा है। लेकिन उसका बढ़ता दबदबा भारतीय हितों के खिलाफ है, इसलिए भारत ने इसका बहिष्कार किया था। भारत इसके जबाव में ईरान और रूस के साथ मिल कर बहुपक्षीय परिवहन कार्यक्रम अंतर्राष्ट्रªीय परिवहन काॅरीडोर यानी आईएनएसटीसी पर काम कर रहा है।

    वर्तमान परिस्थितियों में युद्ध न भारत के हित में है और न चीन के। युद्ध होने पर भारत का विकास भी बहुत पीछे चला जायेगा,जबकि विश्व महाशक्ति बनने का सपना देख रहा चीन भी सपने से कोसों पीछे खिसक जायेगा, क्यों कि अब भारत और चीन दोनों ही देश 1962 वाली स्थिति से काफी आगे निकल गये हैं। इस बात को दोनों देश जानते भी हैं। ऐसी स्थिति में भारत को विवाद सुलझाने के लिए उच्च राजनतिक स्तर पर संवाद कायम करने का प्रयास करना चाहिए। दूसरे चीन को पाकिस्तान के अलावा दुनिया के किसी देश का समर्थन नही मिल रहा। जबकि भारत को अमेरिका और आस्टेलिया के बाद जापान ने भी समर्थन दिया है। इसलिए चीन सैन्य कार्रवाई की हिम्मत नही जुटा पा रहा। इसके साथ भारत को भूटान वाले इलाके में सड़क निर्माण का इरादा विवाद सुलझने तक छोड़ देना चाहिए।

    (लेखक जाने- माने वरिष्ठ पत्रकार हैं)

    # India Vs China #uday yadav

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