आनंद बक्शी आखिर क्यों नहीं गए नुसरत ख़ान से मिलने ?

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वीर विनोद छाबड़ा

कई महीने पहले सोनी टीवी पर उन दिनों चल रहे इंडियन आइडियल में एक मज़ेदार और भावुक किस्सा सुना था. शेयर कर रहा हूँ. एक फिल्म के लिए आनंद बक्शी और नुसरत फ़तेह अली ख़ान दोनों ही अनुबंधित किये गए. दोनों ही दुनिया भर में मशहूर. बक्शी जी के लिखे एक गाने के लिए नुसरत साहब को धुन बनानी थी. नुसरत साहब ने बक्शी जी को फोन किया, गाना लिख कर ले आएं, डिस्कशन भी हो जाएगा और मिलना भी. बक्शी जी को जाने क्यों लगा कि नुसरत हुक़्म दे रहे हैं. फिर बक्शी जी बहुत सीनियर भी थे, मुल्क में उनका बहुत नाम था. उन्हें बुरा लगा. गाना लिखकर भिजवा दिया.

नुसरत साहब ने गाना देखा और फोन पर बक्शी जी को मशविरा दिया कि मीटर पर गाना फिट नहीं बैठ रहा, थोड़ी तरमीम कर दें. साथ ही मिलने को भी कहा. बक्शी जी को तौहीन महसूस हुई, सरहद पार से आये हैं, मगर ईगो बहुत है. उन्हें ख़ुद मिलने आना चाहिए. उन्होंने थोड़ी तरमीम करके गाना भिजवा दिया. नुसरत साहब को फिर थोड़ी कमी महसूस हुई.

उन्होंने बक्शी जी से फोन पर बात की और मिलने को कहा. लेकिन बक्शी जी नुसरत साहब से मिलने नहीं गए. गाना तरमीम करके भिजवा दिया. और ये सिलसिला कई बार चला. आख़िरकार नुसरत साहब से रहा नहीं गया. खुद ही जाकर बक्शी जी से मिलने का फ़ैसला किया.

नुसरत साहब का जिस्म बहुत भारी भरकम और चौड़ा था. कम से कम चार आदमी चाहिए थे उन्हें उठाने के लिए. वो जैसे-तैसे बक्शी जी के घर पहुंचे. बक्शी जी एक अपार्टमेंट में चौथी या पांचवीं मंज़िल पर रहते थे. मगर भारी-भरकम जिस्म वाले नुसरत साहब के लिए लिफ़्ट भी तंग पड़ गयी. तब उनके साथियों ने उन्हें बारास्ता सीढ़ी ऊपर ले जाने की क़वायद की. मगर उसमें भी दिक्कत आयी. तब बक्शी जी से गुज़ारिश की गयी कि नुसरत साहब को ऊपर आने में तकलीफ़ है, यहीं नीचे आकर कर गाना डिसकस कर लें तो बड़ी मेहरबानी होगी. बक्शी जी नीचे उतरे. वो नुसरत साहब को देख कर हैरान रह गए.

उन्होंने नुसरत साहब के इतने भारी-भरकम जिस्म की कभी कल्पना भी नहीं की थी. दरअसल, वो उन्हें पहली मर्तबा देख रहे थे. अब उनकी समझ में आया कि नुसरत उन्हें अपने बंगले पर मिलने के लिए क्यों बुला रहे थे. बक्शी जी बहुत शर्मिंदा हुए. उन्होंने तुरंत फ़ैसला किया कि नुसरत साहब के बंगले पर ही चलते हैं. उस दिन के बाद से जब भी नुसरत साहब ने बुलाया, बक्शी जी तुरंत उनके बंगले पहुंचे. वो फ़िल्म ‘कच्चे धागे’ (1999) थी, मगर गाना मुझे याद नहीं आ रहा है।

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