नई दिल्ली, 04 मार्च 2019: वक्त के साथ साथ डाकू ने भी अपने रियायत बदली है।एक दौर था। जब चंबल के जंगलों में डाकुओं का राज चलता था, वह खुद को बागी कहते थे, कुछ इसी तर्ज पर ‘सोन चिड़िया’ की भी कहानी उस दौर से होकर गुजरती है।इस फिल्म कि शुरुआत में देश में इमरजेंसी का ऐलान होता है और उसी दिन डाकू मान सिंह उर्फ दद्दा मनोज बाजपाई अपने साथियों लाखन सुशांत सिंह राजपूत, वकील सिंह रणवीर शौरी और दूसरों के साथ एक सुनार को लूटने पहुंचता है।
निर्देशक: अभिषेक चौबे
कलाकार: मनोज बाजपेयी, शुशांत राजपूत, रणवीर शौरी, भूमि पेडमेकर, आशुतोष राणा
उधर दरोगा वीरेंद्र गुर्जर आशुतोष राणा के नेतृत्व में पुलिस गांव को घेर लेती है। मानसिंह और कुछ दूसरे डाकू मारे जाते हैं। वकील और लाखन बाकी साथियों के साथ भागने में कामयाब हो जाते हैं। वकील नया सरदार चुना जाता है। रास्ते में उन्हें इंदुमति भूमि पेडमेंकर मिलती है, जो एक 12 साल की बच्ची ‘सोन चिड़िया’ खुशियां नाम की बच्ची को अस्पताल ले जा रही होती है। उस बच्ची के साथ इंदुमती के ससुर ने दुष्कर्म किया था, उसने अपने ससुर को मार दिया था, इसलिए उसके परिवार वाले उसके पीछे पड़े थे। लड़की की जाति को लेकर डाकुओं का गैंग दो भागों में बंट जाता है और लाखन उसे अस्पताल पहुंचाने के लिए वकील से विद्रोह कर देता है। यह फिल्म चंबल के डाकुओं की जिंदगी के बहाने उस दौर के जातीय संघर्ष को बड़े प्रभावी तरीके से पर्दे पर पेश करती है।
फिल्म की पटकथा बेहद रोचक ढंग से लिखी गयी है खासकर क्लाइमेक्स बेहद प्रभावी है। इस फिल्म में सभी कलाकारों बेहतरीन भूमिका निभाई है। फिल्म भले ही बैंडिट क्वीन और पान सिंह तोमर के स्तर तक नहीं पहुँच पायी है लेकिन अपनी शशक्त पटकथा के कारण खास प्रभाव छोड़ती है। एक बार लोगों को फिल्म जरूर देखना चाहिए।







