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    Home»Featured

    बच्चों को जीतना ही नहीं, हार का सामना भी करना सिखाएं!

    By March 2, 2019 Featured No Comments4 Mins Read
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    गला काट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे बेहद सफल हों और इस आपाधापी में यह भूल जाते हैं कि उनकी भी कुछ क्षमताएं हैं। इस क्रम में हम बच्चे को हार का सामना करना सिखा ही नहीं पाते। वहीं बच्चे भी अपने को बेहतर मानते हुए हार का सामना नहीं कर पाते और ऐसे में जब उन्हें हार का सामना करना पड़ता है तो वह उसे स्वीकार नहीं कर पाते, फिर चाहे वह पढ़ाई हो या कोई खेल का मैदान। वहीं इसकी जगह हमें बच्चों को यह भी समझाना चाहिये की हारने से ज्यादा जरूरी है, खेल में भाग लेना।

    अगर हम पीछे रह जाते हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि हम हिम्मत हारकर बैठ जाएं। इन हालातों में बच्चों को हार-जीत से परे होकर स्पर्धा में हिस्सा लेने के बारे में समझाना चाहिए, क्योंकि हम अपने बच्चों को विफल होते नहीं देखना चाहते और न ही उनके भविष्य के साथ किसी तरह का खिलवाड़ होते देखना चाहते हैं। बच्चों को यह बात समझ में आए, इसके लिए जरूरी है कि हम उनके साथ ढेर सारा समय बिताएं और उन्हें ही प्राथमिकता दें। उन्हें खूब सारा प्यार देकर और प्रोत्साहन भरे शब्दों का इस्तेमाल करके राहत दें। अपने बच्चों को हार से उबारने और उससे पार पाने के लिए हमें उन्हें कुछ खास बातें जरूर बतानी चाहिए।

    उन्हें बताएं हर समय नहीं मिलती जीत:
    उन्हें सबसे पहले यह समझाएं कि हर समय जीत जरूरी नहीं है। इसकी शुरुआत स्कूल में ही हो जाती है, जब वे खेलों में हिस्सा लेते हैं। उन्हें यह बताएं कि हर समय हर व्यक्ति जीत नहीं सकता साथ ही यह भी समझना जरूरी है कि वे जो कर रहे हैं, उसमें अपना बेहतर देने की कोशिश करें। जितने गर्व के साथ से वे जीत को सिर-माथे पर लेते हैं, उतने ही खुश होकर हार को भी स्वीकार करें।

    हार स्वीकार करें:
    उन्हें अपनी हार स्वीकार करना सिखाएं जबकि आमतौर पर देखा गया है कि जब बच्चे किसी चीज में पिछड़ जाते हैं तो वे दूसरों को अपनी हार के लिए जिम्मेदार बताते हैं। इस दौरान यह याद रखना जरूरी है कि हार को स्वीकार करने से ही सफलता हासिल होती है। दूसरे को जिम्मेदार बताने से कुछ हासिल नहीं होता।

    किसी से तुलना न करें:
    कई चीजें हमारे बस में नहीं होती। संभव है कि आपका बच्चा खेल में अच्छा हो और पढ़ाई में औसत। इस बात को आपको भी स्वीकार करना चाहिए और बच्चे को भी समझाइए। हां, यह जरूर है कि आधारभूत पढ़ाई सबके लिए जरूरी है। आपको यह सोचकर खुश होना चाहिए कि वह किसी क्षेत्र में तो चैंपियन है। उन्हें उस रास्ते पर चलने में मदद कीजिए, जहां उनकी सफलता छिपी है।

    हार पर दें सांत्वना और अगली जीत के लिए साहस बढ़ाएं:
    उनसे बात करें कि हारने के बाद उन्हें कैसा महसूस हो रहा है। यह महत्वपूर्ण है कि आपका बच्चा अपने एहसास आपसे बांटे। इस तरह से आपको यह पता चलेगा कि उन्हें कितना दुख पहुंचा है और आप किस तरह से उन्हें सांत्वना दे सकती हैं और यह समझा सकती हैं कि कभी-कभी हारना भी बुरा नहीं है। अपना यह एहसास बांटने से उन्हें जीवन के अन्य क्षेत्रों के लिए भी तैयार होने में मदद मिलेगी।

    असफलता से ही सफलता की राह:
    उन्हें समझाएं कि हार सफलता की सीढ़ी पर चढ़ने का रास्ता भी हो सकता है। यदि वे बैठकर यह सोचने में लग जाएंगे कि वे कैसे हार गए तो इसका कोई सकारात्मक परिणाम हाथ नहीं आएगा। इसकी बजाय यदि वे अगली बार के लिए तैयारी करेंगे तो सफलता जरुर मिलेगी ।

    गले लगाएं:
    सबसे बड़ी बात, जब भी आपका बच्चा दुखी हो, उसे गले लगाएं। हमें गले लगाने की जरूरत हर उम्र में पड़ती है। तो आपका बच्चा चाहे पांच साल का हो या पंद्रह का, उसे गले जरूर लगाएं। याद रखें कि आप जितना देंगी, उतना ही आपको वापस मिलेगा। सोचकर देखिए, क्या आपको उस समय अच्छा नहीं लगेगा, जब आप दुखी हों और आपका बच्चे आगे बढ़कर आपको गले लगा ले।

    तैयार करें जीत की राह :
    यह सच है कि जीतने की भी कला होती है। जीतने की योजना भी बनाई जानी चाहिए और उसके बाद उसी के अनुसार काम करना चाहिए। बच्चे की जीतने की इस योजना में आप उसकी मदद कर सकती हैं। पढ़ाई के लिए दिनचर्या बनाने में उसकी मदद करें, पढ़ने में उसकी मदद करें। परीक्षा के समय जब वह देर रात तक जागता है तो उसे चाय या कॉफी बनाकर दें। कहने का तात्पर्य है कि किसी की जीत के लिए सिर्फ उसकी अपनी काबिलियत नहीं, दूसरों की मदद भी जरूरी है।

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