एक खेत से उखाड़कर दूसरे खेत में रोपे गए धान के वे पौधे जो रोपने के बाद पीले पड़ गए थे, अब उनमें धीरे-धीरे हरियाली लौट रही है। वे फिर से मुस्कुराने लगे हैं।
सावन अगर सही मायनों में आए तो मुस्कान ही लेकर आता है। सही मायनों में आना क्या होता है? जैसे जनकपुर की फूलों भरी बागिका में राम का आगमन हुआ था, जैसे शिशुपाल से विवाह की बात तय होने से उदास रुक्मिणी के पास कृष्ण पहुँचे थे, जैसे युगों तक अदृश्य रहने के बाद कैलाश पर महादेव प्रकट हो जाते हैं, जैसे अशोक वाटिका में खोई-खोई बैठी माता सीता की गोद में प्रभु की अंगूठी आई थी, या जैसे कई पीढ़ियों की तपस्या के बाद धरती पर माता गंगा अवतरित हुईं- ठीक वैसे ही जब पौधों की पत्तियों पर बारिश की ठंडी बूँदें गिरती हैं तो प्रकृति कृष्ण के महारास में नाचती किसी गोपिका की तरह थिरक उठती है और कह उठती है देखो “सावन आ गया रे!”
यह जिंदगी ऐसे ही कब हमें एक जगह से दूसरी जगह खींच ले जाती है, पता ही नहीं चलता।
हाँ, धान के पौधों पर भी सावन कुछ इसी तरह आता है। बुजुर्गों ने इन बीचड़ों की तुलना बेटियों से की थी। जैसे विवाह के बाद एक आँगन छोड़कर अपरिचित आँगन में पहुँची बेटियाँ कुछ समय के लिए मुरझा जाती हैं – न परिचय, न अपनापन, न रीति-रिवाजों की जानकारी, न लोगों के स्वभाव का अंदाजा, और ऊपर से अजनबी जगह का स्वाभाविक डर। फिर कैसे न मुरझाएँ? लेकिन बात वही है – धीरे-धीरे पौधे जड़ जमा ही लेते हैं, और धीरे-धीरे लड़कियाँ भी उस अपरिचित आँगन को अपना बना ही लेती हैं। अगर खाद-पानी देने को देवर-ननद जैसे साथी मिल जाएँ तो जड़ें और भी जल्दी फैल जाती हैं।
अब बस इतना ही कि सावन अगर आपकी ओर भी बढ़े तो पूरे मन से मिल लीजिएगा। दो पैसे की नौकरी के लिए लाखों का सावन छोड़ देना समझदारी नहीं है।







