गांधी स्मारक निधि ने कराया “ वैश्विक परिदृश्य में भारत व गांधी दृष्टि” विषय पर सेमिनार
उत्तर प्रदेश गांधी स्मारक निधि से संबद्ध गांधी स्वाध्याय संस्थान के तत्वावधान में गांधीभवन के पुस्तकालय सभागार में शुक्रवार को “वैश्विक परिदृश्य में भारत व गांधी दृष्टि” विषय पर गोष्ठी का आयोजन हुआ। गोष्ठी का विषय प्रवेश करते हुए पूर्व आईएएस विनोद शंकर चौबे ने कहा कि महात्मा गांधी का यह चिन्तन “मनुष्य की सार्थकता जानने में नहीं वरन करने में है” पर विश्व में प्रयोग हो रहा है ।
उन्होंने कहा आज भारत के शीर्ष नेतृत्व ने असम्भव से लग रहे संवैधानिक, मानवीय व कल्याणकारी कृत्यों को कर दिखाया है। कश्मीर का भारत में वास्तविक संविलियन, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्ला देश में अवर्णनीय अत्याचार झेल रहे हिन्दुओं आदि को भारत में शरण, इस्लामी आतंकवादियों का विनष्टीकरण, राष्ट्र की सुरक्षा को अभेद्य बनाना इसके कतिपय उदाहरण है। 24 व 25 फरवरी को विश्व के सर्वशक्तिशाली व विज्ञान के क्षेत्र में सर्वोंत्कृष्ट देश अमेरिका के राष्ट्रपति ने भारत भ्रमण का आरंभ महात्मा गांधी की तपस्थली अहमदाबाद और साबरमती आश्रम से किया, जहां चर्खा चलाकर बापू की स्मृति को श्रद्धापूर्वक नमन किया।
उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री की प्रशंसा करते हुए ऊर्जा, व्यापार, रक्षा उपकरण में सहयोग, पाकिस्तान की भूमि से आतंकवाद व अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के विरूद्ध सहयोग, रक्षा व सुरक्षा संबंधों पर बल, भारत-प्रशांत क्षेत्र में भारत, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, जापान की साक्षात्कार पहल बढ़ाना, जिससे आतंकवाद समाप्त हो व चीन की बेल्टरोड योजना के प्रतिकार के लिए पारदर्शी, समावेशी, आर्थिक-समाजिक रूप से उपयोगी व पर्यावरण हितैशी ब्लूडाट नेटवर्क का विकास, कच्चे तेल की भारत को आपूर्ति आदि में अमेरिका के मुक्तहस्त से अभूतपूर्व सहयोग का उल्लेख किया।
गोष्ठी के मुख्यवक्ता गांधी चिंतन के अध्येता बसंतलाल वर्मा ने कहा कि लगभग दो दशक पहले वैश्वीकरण या भूमंडलीकरण शब्द से हम अचम्भित हुए थे लेकिन आज शीर्ष से लेकर गांव तक यह किसी न किसी रूप में चर्चित और विस्तारित है। वैश्वीकरण की क्या प्रक्रिया है। यह हमें अभी पता नहीं है, लेकिन इससे जन, समाज और राज्य-शहर देहात को भी विभिन्न धरातलों पर प्रभावित किया है। तीसरी दुनिया के देशों के समक्ष आज भी यह प्रश्नचिह्न के रूप में है कि इसको किस रूप में अपनाया जाय। अपनाने के बाद इसे क्या-क्या चुनौतियां आ सकती है।
जनता की तरक्की, नेशन की तरक्की इस प्रणाली से होगी या नहीं, पता नहीं। देश के पारम्परिक ज्ञान प्रणाली व अनुभवों का आगे क्या होगा, ये बदल जाएंगे या समाप्त हो जाएंगे। सामाजिक ताने-बाने सभ्यता और संस्कृति व आर्थिक संशाधनों का स्वरूप कैसा हो जाएगा। गोष्ठी की अध्यक्षता गांधीवादी चिंतक डाक्र सोचन यादव ने किया। मुख्य रूप से संस्थान के सचिव लाल बहादुर राय भी मौजूद रहे। गोष्ठी में सर्वेश कुमार गुप्ता, बलिराम वर्मा, संजीव श्रीवास्तव आदि ने अपने-अपने विचार रखे।






