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    ‘नीली चिड़िया’ के चक्रव्यूह को तोड़ते बुद्धिजीवी मूलनिवासी!

    By November 10, 2019 Current Issues No Comments7 Mins Read
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    भारत में भारतीयों के साथ ट्विटर का भेदभाव पूर्ण रवैये का आरोप, लागतार ट्रेंडिंग में बने हैशटैग


    वायरल इशू: राहुल कुमार गुप्त*


    मार्च 2006 को जन्मी एक ‘नीली चिड़िया’ ने विश्व के समस्त देशों के अधिकांश लोगों व वहाँ की समस्त संस्कृतियों ( कुछ आदिवासी संस्कृतियों को छोड़कर) को एक मंच पर लाते हुए दूरियाँ मिटाने का बेहतरीन कार्य किया। इसने एक मुक्त सामाजिक संजाल की संरचना किया जिसमें सभी अपनी अभिव्यक्ति कुछ सीमित शब्दों के साथ कर सकते हैं। अमेरिका में जन्मी इस ‘नीली चिड़िया’ ने दो साल में ही वहाँ के राष्ट्रपति चुनाव में अपने सामाजिक संजाल के चलते अपना लोहा मनवा लिया था। इसकी इसी मुक्त सामाजिक संजाल, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं दुनिया की समस्तता को एक मंच पर उतार देने से लगभग सभी राष्ट्रों के प्रमुख, संस्थाएं, लेखक, पत्रकार व बुद्धिजीवी वर्ग के अलावा शिक्षित वर्ग भी इस पर विश्वास करके जुड़ता गया और जिससे विश्व में इस ‘नीली चिड़िया’ ने एक बड़ा मुक्त सामाजिक संजाल निर्मित कर लिया। धीरे-धीरे इस मुक्त सामाजिक संजाल ने खुद को विकराल करते हुए राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सभी चेतनाओं का केंद्र बन गया।

    भारत में ‘नीली चिड़िया’ की उड़ान दर विश्व में अपना स्थान बनाती जा रही है। अप्रैल, 2019  में ट्विटर इंडिया के नये मैनेजिंग डायरेक्टर मनीष माहेश्वरी ने भी अपनी ज्वाइनिंग के समय यह कहा था कि भारत का फ्यूचर डिजिटल प्रथम है और दुनिया के सबसे ज्यादा यूथ के साथ यहाँ काफी संभावनाएं भी हैं। लेकिन यहाँ ‘नीली चिड़िया’ अपनी मूल भावना से विचलित होते हुए भारत के भेदभाव के मूल में पहुँच गयी। आरोप है कि अब ‘नीली चिड़िया’ यहाँ के ‘राजदरबार’ में मोहित हो गयी।

    कहा जा रहा है कि राजा की मेहरबानी पाने के लिये वो ‘ नीली चिड़िया’ उसके समर्थकों पर मेहरबानी के फूल बरसाने लगी और राजदरबार की कुछ नीतियों के विरोधियों को चोंच मारने लगी। नवंबर के प्रथम सप्ताह में चोंच मारने की कई घटनाएं भी सामने आयीं।

    सरकार की गलत नीतियों और किसी समुदाय व समाज के व्यक्तियों के साथ हो रहे गलत व्यवहार को अनदेखा करने का प्रतिरोध जीवित लोकतंत्र की धड़कनें हैं।

    पिछड़े समाज, मूल निवासी (आदिवासी, दलित और पिछड़े वर्ग) में सामाजिक चेतना के लिये अग्रसर रहने वालों की संख्या गिनी-चुनी है खासकर ‘ नीली चिड़िया’ की दुनिया में तो और। फिर भी इन गिने-चुने सामाजिक बुद्धिजीवियों के साथ जिस प्रकार भारत की ‘नीली चिड़िया’ का व्यवहार सामने आया है वो भारतीय समाज में पुनः एक बड़ी खाई उत्पन्न करने का कार्य कर रहा है। छुआछूत और भेदभाव वाले पाखंडी काल की पुनरावृत्ति करते हुए भारत की यह ‘नीली चिड़िया’ यहाँ के कुछ बुद्धिजीवी मूलनिवासियों के लिये चक्रव्यूह तैयार कर अपने निर्मित मंच में आने से उन्हें रोकने का कार्य किया।

    इसके विरोध में बहुजन समर्थकों और सामाजिक न्याय के झंडाबरदारों ने पिछले कुछ दिनों से इनसे जुड़े विषयों पर ट्वीट कर सोशल मीडिया के इस प्लेटफार्म पर उन्हें ट्रेंड होने के लिए मजबूर कर दिया।
    पिछले मंगलवार को #TwitterHatesSCSTOBCMuslims का हैशटैग ट्रेंडिंग में टॉप पर था। तो सोमवार को #JaiBheemJaiMandalJaiBirsa ट्रेंड कर रहा था। इस हैशटैग को दलित, ओबीसी और आदिवासियों के गठजोड़ के तौर पर पेश किया गया था। जिसमें बहुजन नायकों में शुमार बीआर आंबेडकर, बीपी मंडल और बिरसा मुंडा की तिकड़ी शामिल थी। इसके अलावा इस बीच #CasteistTwitter, #JaiBhimTwitter और #SackManishMaheswari ##Mandal_का_बाप_कमंडल समेत ढेर सारे दूसरे हैशटैगों को शनिवार के बाद अलग-अलग मौकों पर ट्रेंड कराया गया।

    मामले की शुरुआत कुछ इस तरह से हुई जब 2 नवंबर को पत्रकार और सामाजिक न्याय के अगुआ और एकेडमीशियन दिलीप मंडल के एकाउंट को ट्विटर ने एकाएक बंद कर दिया।

    उसका कहना था कि मंडल ने ट्विटर के मानकों का उल्लंघन किया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार और इसके बारे में पूछे जाने पर मंडल ने ‘दि हिंदू’ को बताया कि “इस साल के मार्च महीने में मैंने ‘बहुजन एजेंडा’ नाम की एक बुकलेट के बारे में ट्वीट किया था। जिसमें लेखक के संपर्क का भी पूरा विवरण था। लेकिन ट्विटर ने इसे अपने नियमों का उल्लंघन करार दिया। और उसी के साथ मेरे एकाउंट पर पाबंदी लगा दी।” इसके साथ ही सामाजिक न्याय के कार्यकर्ताओं ने #restoreDilipMandal के हैशटैग के साथ ट्विटर पर अभियान शुरू कर दिया। और जब यह ट्रेंड करने लगा तो ट्विटर ने मंडल के एकाउंट को फिर से बहाल कर उनके एकाउंट को ब्लू टिक दे दी।
    इसी तरह का विरोध सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट संजय हेगड़े के एकाउंट पर भी पाबंदी के बाद सामने आया था। जिनका एकाउंट पिछले हफ्ते दो दिनों के भीतर दो बार बंद किया गया था। और वह भी एक ऐसी पोस्ट के लिए जिसे सामान्य तौर पर गलत नहीं माना जा सकता है।

    कुछ यही कहानी दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रतन लाल के साथ भी दोहरायी गयी। जिसमें ट्विटर ने उनके एकाउंट को भी नियमों का उल्लंघन बता कर बंद कर दिया। प्रोफेसर रतन लाल का कहना था कि उन्हें किसी ने जान से मारने की धमकी दी थी। और जिस फोन नंबर से वह धमकी आयी थी उसके खिलाफ एफआईआर लिखाने के बाद उसके नंबर को उन्होंने ट्विटर की एक पोस्ट के साथ शेयर कर दिया था।

    ट्विटर को यही बात नागवार लगी। और उसने रतन लाल के हैंडल पर पाबंदी लगा दी। फिर क्या? फिर तो #RestoreProfRatanlal के हैशटैग के साथ ट्विटर पर ट्वीट्स की बाढ़ आ गयी। और नतीजा यह हुआ कि यह भी ट्रेंड करने लगा। आखिर में ट्विटर को उनके हैंडल को भी बहाल करना पड़ा। लेकिन ट्विटर ने अभी रतन लाल को ब्लू टिक नही दिया।

    आदिवासियों के हित में बुलंद आवाज उठाने वाले हंसराज मीणा को भी ‘नीली चिड़िया’ ने चक्रव्यूह में कैद किया लेकिन हैश टैग की बाढ़ आने पर उन्हें ट्विटर हैंडल वापस कर मुक्त कर दिया गया,
    इसी बीच बहुजन कार्यकर्ताओं ने ट्विटर के इंडिया हेड मनीष माहेश्वरी के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। दिलीप मंडल ने अपने एक ट्वीट में साफ-साफ लिखा कि “मनीष माहेश्वरी, एमडी, ट्विटर इंडिया. जिस पोस्ट पर आपको एतराज था, वो तो नहीं हटेगा. लेकिन मैं वचन देता हूं कि आपको हटाने के लिए और आपको अंबानी की नौकरी में वापस भेजने के लिए मैं पूरी ईमानदारी से कोशिश करूंगा. एकाउंट वापस करने के लिए शुक्रिया। @manishm345 आपका, प्रोफेसर मंडल”। और इसी के बाद #SackManishMaheshwari के हैशटैग से ट्वीट शुरू हो गए। अभी यह प्लेटफार्म की ट्रेंडिंग में नंबर तीन पर ही पहुंचा था कि अचानक यह हैशटैग की ट्रेंडिंग सूची से गायब हो गया।

    ‘दि वायर’ के साथ बातचीत में ट्विटर के प्रवक्ता ने हैशटैग के ट्रेंडिंग सूची से गायब होने के मसले पर कुछ भी बोलने से इंकार कर दिया। हालांकि उसका कहना था कि ऐसा कोई हैशटैग जो लोगों की भावनाओं को चोट पहुंचाता हो या फिर किसी तरह का विभाजन पैदा करता हो तो उसे हटा दिया जाता है।

    प्रोफेसर दिलीप मंडल ने मनीष माहेश्वरी को ट्वीट कर कहा कि देश में लाखों ब्लू टिक एकाउंट हैं. लेकिन मैं SC-ST-OBC के 100 बुद्धिजीवियों, लेखकों, पत्रकारों, प्रोफेसरों, चिंतकों को नहीं जानता जिनको ट्विटर ने ब्लूट टिक देकर वेरिफाइ किया है। क्या आप इन समुदायों के वेरिफाइड एकाउंट के बारे में बताएंगे, जो नेता नहीं हैं।

    बहुजन समर्थकों का कहना है कि ब्लू टिक देने के मामले में ट्विटर भेदभाव करता है। उनका आरोप है कि यह बिल्कुल जातिवादी नजरिये से किया जाता है। दिलीप मंडल ने इस सिलसिले में कई उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर आजाद (हालांकि इस विवाद के बाद उन्हें ट्विटर ने ब्लू टिक दे दिया है), प्रकाश आंबेडकर, हंसराज मीना समेत ढेर सारे ऐसे लोग हैं जिनकी फालोइंग लाखों में है। लेकिन ट्विटर ने उनको ब्लू टिक नहीं दिया है। जबकि दूसरी तरफ केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के बेटे जय शाह के ट्विटर पर फालोवरों की संख्या महज 27 है लेकिन उन्हें ब्लू टिक मिला हुआ है। मंडल ने इस पूरे प्रकरण को ‘नीला जनेऊ’ करार दिया है।

    मंडल ने ट्विटर से अपनी पूरी व्यवस्था को पारदर्शी बनाने की मांग की है। और उनका कहना है कि ब्लू टिक देने के मामले में किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। उसके लिए ट्विटर को अपने मानदंड तय करने चाहिए और उनको जो भी पूरा करता हो उसे ब्लू टिक दे देनी चाहिए।

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