- हिंदी मासिक पत्रिका ‘दृष्टांत’ ने योगी सरकार के मंत्री के खिलाफ छापी थी खबर
- पत्रिका के संपादक अनूप गुप्ता ने कहा, उन्हें जान का खतरा
राहुल कुमार गुप्त
हमारे देश के अघोषित चौथे स्तम्भ (पत्रकारिता) का लगभग 98% व्यवसायीकरण हुए लगभग डेढ़ से दो दशक हो रहे हैं। अब एक-दो फीसदी ही देश में मिशनरी पत्रकारिता शेष है। बस यही भ्रष्टाचार के खिलाफ, गलत के खिलाफ सजग योद्धा के रूप में इस अपराजेय अव्यवस्था से जंग लड़ने की ठाने हुए है। वो ऐसा खुद के लिये नहीं करते, देश व समाज को स्वस्थ और खुशहाल बनाये रखने के लिये अपनी ज़िंदगी से भी समझौता कर लेते हैं। जिस तरह से देश की सुरक्षा के लिये सीमा में लगे जवान अपनी परवाह किये बगैर देश के लिये सर्वस्व न्यौछावर करने से भी नहीं चूकते बस उसी भाँति सच्ची पत्रकारिता के प्रति समर्पित पत्रकार भी अपना जीवन दाँव पे लगा कर अव्यवस्था के खिलाफ जंग लड़ता है और अपने देश व समाज के कई तरह के नासूरों को देश के समक्ष लाता है ताकि कानून व न्याय रूपी चिकित्सक उसका सही से ईलाज कर सकें। किन्तु यह काम इतना आसान नहीं है, इसमें उस सच्चे पत्रकार की जान जाने का भय और परिवार की हानि का भय सदा बना रहता है। क्यूँकि भ्रष्टाचार और अपराध के ‘वायरस’ उस वास्तविक संक्रमित वायरस से भी ज्यादा खतरनाक होते हैं। विश्व प्रेस फ्रीडम इंडेक्स यह इंगित करता है कि भारत में सच्चे पत्रकार बहुत सुरक्षित नहीं है। व्यवसायिक पत्रकारों का क्या कहना उनकी तो चहुँओर चाँदी ही रहती है। क्योंकि वो देशहित से ज्यादा स्वहित पर जोर देते हैं।
इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में घोषित आपातकाल ने कलम और विचारों को कुंद कर दिया था, जेल की सलाखें भी सजा दी गयीं थीं। किन्तु मोरार जी के सत्ता संभालने के बाद चौथे स्तम्भ को कुछ स्वतंत्र करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से मजबूती भी दी गयी। मिशनरी पत्रकार अपना काम स्वतंत्र रूप से कर सकें इसके लिये संविधान में कोई अलग से अनुच्छेद नहीं जोड़े गये। बस सामान्य नागरिक के अभिव्यक्ति की आजादी के मूल अधिकार की तरह ही पत्रकारों के पास अधिकार हैं। बस ये अधिकारों के प्रति जागरुक और निडर है तथा जनता का अधिकांश हिस्सा अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं है जिससे वास्तविक लोकतंत्र का व्यवहारिक रूप में अभाव देखने को भी मिल जाता है। देश में कई जगह कुछ वर्षों में पत्रकारों की हत्या व उन पर हमले के मामले बढ़े ही हैं। ऐसे में स्वस्थ और खुशहाल देश की कल्पना भी संभव नहीं हैं। क्योंकि कई मामलों में ये भी समाज की गंदगी साफ करने वाले अपमार्जक की तरह ही हैं। जब समाज में यही अपमार्जक ही नहीं रहेंगे तो आप अनुमान लगा सकते हैं कि सिर्फ गंदगी ही बचेगी जो समाज में रहने वालों का जीना मुश्किल कर देगी।

उत्तर प्रदेश के लखनऊ में कुछ गिने-चुने चेहरे ही हैं जो मिशनरी पत्रकारिता के अग्निपथ पर चल रहे हैं, प्रभातरंजन दीन, अनूप गुप्ता, निशीथ राय, योगेंद्र विश्वकर्मा, श्यामल त्रिपाठी,नवेद शिकोह, रंजीत सिंह आदि और कुछ नाम हैं जो सिद्धांतों से समझौता नहीं करते। खोजी पत्रकारिता से संबंधित दृष्टांत मैगजीन ( हिंदी मासिक) अपने आप में एक मिसाल है बिना किसी भय के शासन-प्रशासन के हर गलत कामों का सामना कलम द्वारा किया है। इस मैगजीन के संपादक अनूप गुप्ता को इसका कई बार खामियाजा भी भुगतना पड़ा। शासन-प्रशासन के प्रकोप का शिकार बनना पड़ा। कई अज्ञात हमले भी हुए। इन सबकी दर इस सरकार में ज्यादा बढ़ गयी। जानलेवा हमला, धमकियाँ मिलना आम हो गया। क्योंकि यह वही योद्धा है जिसने शासन के मंत्रियों व अधिकारियों के खिलाफ उनकी काली करतूतें बिना भय के छापीं हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री सतीश महाना से संबंधित खबर छापने पर प्रदेश सरकार ने एसआईटी जांच करवाने के निर्देश दे दिए। इस एसआईटी जांच को लेकर दृष्टांत के संपादक अनूप गुप्ता ने उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से उन्हें प्रताडि़त करने की कार्रवाई मानते हुए लखनऊ हाई कोर्ट में याचिका दायर की।
इस मामले में चार मार्च 2020 को माननीय न्यायमूर्ति रीतू राज अवस्थी और विकास कुंवर श्रीवास्तव की दो सदस्यीय बेंच ने सुनवाई की। सुनवाई के दौरान दृष्टांत पत्रिका के तरफ से वकील सी बी पाण्डेय ने कहा कि एसआईटी के संदर्भ में 16 जून 2007 को जारी हुए सरकारी आदेश में एसआईटी जांच की स्पष्ट व्याख्या की गई है। मौजूदा मामले में एसआईटी जांच का कोई कारण नहीं बनता है। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार से हिन्दी मासिक पत्रिका दृष्टांत के संबंध में एसआईटी जांच गठित करने के संदर्भ में जवाब मांगा है।
यह एक तरह से प्रदेश सरकार की तरफ से अघोषित इमरजेंसी का ऐलान ही तो है।
पत्रकारों की खबरों के पीछे एसआईटी लगाने का ये अजीबोगरीब फैसला, अघोषित तानाशाही की ओर ही इंगित करती है! अन्य सरकारों में भी उनके गलत कामों के खिलाफ पत्रकार बाखूबी कलम चलाते थे तब इतनी पाबंदियाँ उन पर रोपी नहीं गयीं। पूर्ववर्ती सपा सरकार के कुछ मंत्रियों के खिलाफ मैंने भी कुछ खबरें लिखी पर तब कोई इस तरह की ईर्ष्यापूर्ण कार्रवाई नहीं थी।
लखनऊ में अब धीमी गति से ही सही तमाम पत्रकार बंधु अनूप गुप्ता के पक्ष में लामबंद होते दिख रहे हैं।
तानाशाही रवैये के खिलाफ सबको एकजुट होना भी चाहिये। आपके कलम और विचार जब स्वतंत्र होंगे तभी स्वस्थ लोकतंत्र का वातावरण तैयार हो सकता है।







